अजब-गजब

जब कोर्ट में पेश हुआ ‘छोटू’ कुत्ता, मिली थी फांसी की सजा! वकील ने मुफ्त में लड़ा केस और बचाई जान

Purnia Dog Death Sentence Case: हर शहर की अपनी कोई न कोई ऐसी कहानी होती है, जो वक्त बीतने के बाद भी उसकी पहचान का हिस्सा बनी रहती है. बिहार के पूर्णिया से जुड़ी एक ऐसी ही अनोखी कहानी आज भी लोगों को हैरान करती है. करीब दो दशक पहले यहां एक आवारा कुत्ता कानूनी लड़ाई का हिस्सा बन गया था. मामला इतना असामान्य था कि इसकी चर्चा देश ही नहीं, विदेशों तक में हुई थी. खास बात यह थी कि कुत्ते को अदालत की ओर से गोली मारने या फांसी देने तक का आदेश दिया गया था.

2003 में सामने आया था अनोखा मामला

आपको बता दें कि यह मामला साल 2003 का है. पूर्णिया के वरिष्ठ अधिवक्ता दिलीप कुमार दीपक ने बताया कि साल 2003 में ‘छोटू’ नाम के एक आवारा कुत्ते ने जगदीश दास नाम के व्यक्ति को काट लिया था. इसके बाद मामला तत्कालीन एसडीओ जितेंद्र प्रसाद की अदालत तक पहुंचा. बताया जाता है कि सुनवाई के दौरान अदालत की ओर से कुत्ते को गोली मारने या फांसी देने का आदेश दिया गया. उस दौर में यह फैसला बेहद असामान्य माना गया और देखते ही देखते मामला चर्चा का विषय बन गया.

वकील ने क्यों मुफ्त में लड़ा केस?

इस कहानी में दिलचस्प मोड़ तब आया, जब अधिवक्ता दिलीप कुमार दीपक ने इस मामले को मुफ्त में लड़ने का फैसला किया. इसके पीछे एक व्यक्तिगत वजह भी बताई जाती है. अधिवक्ता के अनुसार, उनके जीवन में कभी एक कुत्ते से जुड़ी ऐसी घटना हुई थी, जिसने उनकी जान बचाई थी. इसी वजह से वह कुत्ते के प्रति भावनात्मक जुड़ाव महसूस करते थे. जब उन्हें छोटू के मामले के बारे में पता चला तो उन्होंने बिना फीस लिए उसकी ओर से कानूनी लड़ाई लड़ने का निर्णय लिया.

अदालत में छोटू ने खुद दी थी गवाही

मामले की सुनवाई के दौरान कुत्ते को अदालत में पेश किए जाने की बात सामने आती है. अधिवक्ता के मुताबिक, अदालत में उसकी प्रथम दृष्टया जांच की गई. इसी दौरान छोटू ने कथित तौर पर अपने दोनों पैर उठाकर अपने शरीर पर मौजूद चोटों को दिखाया. कुत्ते के इस व्यवहार ने वहां मौजूद लोगों का ध्यान खींचा. बताया जाता है कि अदालत ने उसकी स्थिति और व्यवहार को देखते हुए पहले दिए गए आदेश पर पुनर्विचार किया. इसके बाद कुत्ते को दी गई मौत की सजा टाल दी गई और उसे राहत मिली.

गरीब महिला का सहारा था छोटू

छोटू सिर्फ एक आवारा कुत्ता नहीं था. बताया जाता है कि वह राजकुमारी देवी नाम की एक गरीब और अकेली महिला के साथ रहता था. उनके लिए छोटू परिवार के सदस्य की तरह था. स्थानीय स्तर पर यह भी बताया गया कि घर में किसी अनजान व्यक्ति के प्रवेश या किसी खतरे की स्थिति में छोटू उनकी सुरक्षा के लिए आगे आ जाता था. यही वजह थी कि अधिवक्ता दिलीप कुमार दीपक ने उसकी जान बचाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने का फैसला किया.

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पशु अधिकार कार्यकर्ता भी आए आगे

मामला जब सार्वजनिक चर्चा में आया तो पशु अधिकार कार्यकर्ताओं तक भी इसकी जानकारी पहुंची. बताया जाता है कि मेनका गांधी समेत कई पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने भी मामले में रुचि दिखाई और कुत्ते को बचाने की कोशिशों का समर्थन किया.

इस पूरे घटनाक्रम ने पूर्णिया के इस मामले को बेहद चर्चित बना दिया. आज भी ‘छोटू’ का यह किस्सा इसलिए याद किया जाता है क्योंकि इसमें अदालत, एक आवारा कुत्ता, एक गरीब महिला और उसकी मदद के लिए आगे आए वकील की ऐसी कहानी जुड़ी है, जो सामान्य कानूनी मामलों से बिल्कुल अलग नजर आती है.

Swati Pandey

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