विश्लेषण

क्या समुद्र में घिर चुका है चीन? QUAD और SAGAR के चक्रव्यूह में कैसे फंसा बीजिंग का ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’

भारतीय महासागर (Indian Ocean) विश्व का तीसरा सबसे बड़ा महासागर है, लेकिन भारत (भारत) के लिए यह मात्र जलराशि नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक समृद्धि और भू-राजनीतिक वर्चस्व का केंद्र है. चीन की बढ़ती महत्वाकांक्षा के बीच यह महासागर भारत का सबसे मजबूत रणनीतिक ट्रंप कार्ड साबित हो सकता है. भौगोलिक स्थिति, नौसैनिक क्षमता और क्षेत्रीय साझेदारियों के कारण भारत यहां प्राकृतिक रूप से मजबूत है, लेकिन अब इसे सक्रिय रूप से खेलने का समय आ गया है.

भौगोलिक श्रेष्ठता: भारत का प्राकृतिक लाभ

भारत हिंद महासागर के बीचों-बीच स्थित है. अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के बीच फैला भारतीय प्रायद्वीप इस महासागर को दो भागों में विभाजित करता है. भारत की 7,500 किलोमीटर से अधिक लंबी तटररेखा, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह और लक्षद्वीप जैसे सामरिक द्वीप इस क्षेत्र में अपार नियंत्रण प्रदान करते हैं.

दुनिया का लगभग 80% समुद्री तेल व्यापार और ऊर्जा संसाधन इसी महासागर से होकर गुजरते हैं. भारत का 95% विदेशी व्यापार और ऊर्जा आयात इसी मार्ग पर निर्भर है. वहीं चीन के लिए मलक्का जलडमरूमध्य (Malacca Strait) के रास्ते 80% से अधिक ऊर्जा आयात इसी महासागर से होता है. यानी दोनों देशों की आर्थिक सुरक्षा यहां बंधी है, लेकिन भारत की स्थिति कहीं अधिक मजबूत है क्योंकि वह ‘रेजिडेंट पावर’ (स्थानीय शक्ति) है, जबकि चीन ‘एक्स्ट्रा-रीजनल’ (बाहरी) शक्ति.

चीन की चुनौती: स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स और विस्तार

चीन अपनी ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति के तहत पाकिस्तान (ग्वादर), श्रीलंका (हम्बनटोटा), बांग्लादेश, म्यांमार, जिबूती और अन्य जगहों पर बंदरगाह और बुनियादी ढांचा बना रहा है. यह ‘ऋण जाल कूटनीति’ (Debt-Trap Diplomacy) के जरिए सैन्य उपयोग के लिए द्वंद्वात्मक सुविधाएं तैयार कर रहा है. हाल के वर्षों में चीनी नौसेना (PLAN) ने हिंद महासागर में अपनी मौजूदगी तेजी से बढ़ाई है. पनडुब्बियां, युद्धपोत और अनुसंधान जहाज नियमित रूप से यहां गश्त कर रहे हैं.

यह भारत के लिए प्रत्यक्ष खतरा है क्योंकि:

  • चीन की बढ़ती मौजूदगी भारत की समुद्री रेखाओं (SLOCs) को प्रभावित कर सकती है.
  • द्वीप राष्ट्रों (मालदीव, श्रीलंका, सेशेल्स आदि) पर प्रभाव बढ़ाकर भारत को घेरने की कोशिश.
  • भविष्य में युद्ध की स्थिति में चीन की ऊर्जा आपूर्ति बाधित करने की भारत की क्षमता को कमजोर करना.

भारत का जवाब: SAGAR, QUAD और द्वीप विकास

भारत ने इस चुनौती का मुकाबला करने के लिए कई कदम उठाए हैं:

  • SAGAR (Security and Growth for All in the Region): पड़ोसी देशों के साथ समुद्री सुरक्षा, आर्थिक विकास और क्षमता निर्माण पर जोर.
  • अंडमान-निकोबार कमांड: इन द्वीपों को मजबूत बनाकर मलक्का जलडमरूमध्य के निकट निगरानी बढ़ाई जा रही है. INS कोहासा जैसी नई नौसैनिक अड्डों का विकास.
  • QUAD (भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया): मालाबार अभ्यास के माध्यम से समुद्री सहयोग, पनडुब्बी रोधी युद्ध (ASW) क्षमता और ‘Ports of the Future’ जैसी पहलें चीन के BRI के विकल्प के रूप में उभर रही हैं.
  • द्वीप विकास: मॉरीशस (अगालेगा), सेशेल्स आदि में लॉजिस्टिक सुविधाएं.

भारतीय नौसेना एशिया की सबसे अनुभवी और सक्रिय नौसेनाओं में से एक है, जिसमें मजबूत पनडुब्बी रोधी क्षमता और क्षेत्रीय जागरूकता है.

अब समय है ट्रंप कार्ड खेलने का

भारत को निम्नलिखित रणनीतियां अपनानी चाहिए:

  1. नौसैनिक विस्तार: तीसरा विमानवाहक पोत, अधिक पनडुब्बियां, ड्रोन और स्वदेशी तकनीक पर तेजी से निवेश.
  2. क्षेत्रीय साझेदारियां: IOR में छोटे-छोटे द्वीप राष्ट्रों और अफ्रीकी देशों के साथ मजबूत संबंध, बुनियादी ढांचा सहायता और प्रशिक्षण.
  3. QUAD को मजबूत करना: इसे पूर्ण सैन्य गठबंधन न बनाते हुए भी व्यावहारिक समुद्री सहयोग बढ़ाना.
  4. आर्थिक और कूटनीतिक दबाव: BRI के विकल्प के रूप में भारत-प्रधान परियोजनाएं, जैसे IMEC (India-Middle East-Europe Economic Corridor).
  5. तकनीकी श्रेष्ठता: सैटेलाइट निगरानी, साइबर और AI आधारित समुद्री जागरूकता प्रणाली.

हिंद महासागर भारत का प्राकृतिक अखाड़ा है. यहां चीन के मुकाबले भारत की भौगोलिक, सांस्कृतिक और नौसैनिक श्रेष्ठता है. अगर भारत अब सक्रिय रूप से अपनी क्षमताओं का उपयोग करता है. आक्रामक रक्षा नीति, मजबूत साझेदारियां और घरेलू क्षमता निर्माण के साथ तो यह न केवल चीन की महत्वाकांक्षा को रोकेगा, बल्कि 21वीं सदी में भारत को वैश्विक महाशक्ति के रूप में स्थापित करेगा.

समय आ गया है कि भारतीय महासागर में भारत की ध्वजवाहिनी लहराए, और ‘समुद्र विजय’ का मंत्र साकार हो.

भारत को अब रक्षात्मक मुद्रा छोड़कर क्षेत्रीय नेतृत्व की भूमिका निभानी होगी. यह सिर्फ सुरक्षा का सवाल नहीं, बल्कि भविष्य की समृद्धि और संप्रभुता का है.

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-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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