नेपाल में कुत्ते के साथ बर्बरता के बाद वैश्विक कानूनों पर चर्चा
Animal Cruelty Legal Explainer: नेपाल से एक ऐसी रूह कंपा देने वाली तस्वीर सामने आई, जिसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया. एक महिला पालतू कुत्ते को उफनती नदी के तेज बहाव में फेंक देती है. इस बर्बरता के बाद नेपाल पुलिस आरोपी बिमला देवी रोकाया को गिरफ्तार जरूर किया, लेकिन इस घटना ने दुनिया भर में बेजुबानों की सुरक्षा और उनके कानूनी अधिकारों पर एक बहुत बड़ी बहस छेड़ दी है. इस घटना के बाद से लैटिन अमेरिकी देश ब्राजील के कानून की चर्चा हो रही है जिसमें 5 साल की सजा का प्रावधान है. सावल भी उठ रहे हैं की क्या भारत में ऐसा संभव है? क्या नेपाल में ऐसे मामलों को रोकने के लिए कोई कानून है?
ब्राजील ने अपने सैसॉं कानून के जरिए दुनिया को दिखाया है कि जानवरों पर होने वाले अत्याचार से कैसे निपटा जाता है. इसके तहत कुत्तों और बिल्लियों पर जुल्म ढाने वालों को सीधे 2 से 5 साल तक की गैर-जमानती जेल होती है. हाल ही में वहां की एक अदालत ने 6 कुत्तों की हत्या करने वाले दरिंदे को 7 साल, 9 महीने और 10 दिन की सख्त कैद सुनाई है.
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या भारत में जानवरों के खिलाफ ऐसी दरिंदगी करने वालों को इतनी कड़ी सजा मिलना संभव है? क्या हमारा कानून बेजुबानों को सुरक्षा देने में सक्षम है या फिर कानूनी खामियों के चलते अपराधी बच निकलते हैं? भारत नेपाल और ब्राजील में कौन से कानून हैं? आइये विस्तार से नेपाल की घटना की कानूनी स्थिति, ब्राजील के सख्त मॉडल, भारत के कानूनों की जमीनी हकीकत, अदालती पेंडेंसी, गाय और कुत्ते-बिल्ली के कानूनों में अंतर की पड़ताल करते हैं. साथ ही समझते हैं कि भारत में यह कितना संभव है.
नेपाल में हुई इस घटना के बाद बझांग जिला पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी महिला को गिरफ्तार कर लिया. महिला ने दावा किया कि कुत्ते ने किसी को काट लिया था, हालांकि वीडियो में कुत्ता पूरी तरह शांत और जिंदगी के लिए जंग लड़ता नजर आ रहा है.
नेपाल में पशु क्रूरता के मामले मुलुकी अपराध संहिता, 2074 (2017/2018) (Muluki Criminal Code 2074 animal cruelty) के तहत आते हैं. इसमें तीन दफा आती हैं जिसमें अलग-अलग तरह के मामलों के लिए अलग-अलग सजा के प्रावधान हैं. हालांकि, इनकी जमीनी हकीकत कुछ अलग ही है.
पहली, दफा 290 (सामान्य पशु क्रूरता): किसी भी पशु-पक्षी को पीटना, भूख-प्यास से तड़पाना या यातना देना अपराध है. लेकिन इसमें सजा केवल 3 महीने तक की कैद या 5,000 नेपाली रुपये का जुर्माना (या दोनों) है. अपराध की शिकायत 3 महीने के भीतर करनी होती है.
दूसरी, दफा 289 (गाय और बैल की सुरक्षा): गाय नेपाल का राष्ट्रीय पशु है. जानबूझकर गाय-बैल की हत्या पर 3 साल तक की जेल और गंभीर चोट पहुंचाने पर 6 महीने की जेल का प्रावधान है.
तीसरी, दफा 291 व 117: सार्वजनिक स्थानों पर वध करने पर 1 महीने की कैद और पालतू जानवरों को लावारिस (छाडा) छोड़ने पर 3 महीने की जेल या 5,000 नेपाली रुपये जुर्माने का प्रावधान है.
इन कानूनों की जमीनी हकीकत की बात करें तो किसी भी मामले में ऐसी सजा नहीं हुई जो नजीर पेश करें. हाल के वर्षों में खोतांग जिला अदालत ने कुत्ते की हत्या पर एक हफ्ते की जेल और काठमांडू अदालत ने भी सजाएं सुनाई हैं, लेकिन अधिकतम 3 महीने की सीमित सजा के कारण अपराधी आसानी से छूट जाते हैं, जिससे वहां अब सख्त कानून की मांग उठ रही है.
सितंबर 2020 से एक संघीय कानून (Federal Law No. 14,064) लागू है. इसे वहां के लोग आम बोलचला में “सैसॉं कानून” कहा जाता है. इसके नाम के पूछे भी पशु प्रेम है. वहां के मिनस गेरैस प्रांत में ‘सैसॉं’ नाम के एक पिटबुल कुत्ते के साथ भारी क्रूरता हुई थी. उसके पिछले दोनों पैर एक क्रूर व्यक्ति ने दरांती से काट दिए थे. पूरे देश में हुए भारी जन-आक्रोश के बाद सरकार को यह कानून बनाना पड़ा. इसी कारण कानून का नाम भी उसी के नाम से पड़ा.
ब्राजील का कानून पालतू जानवरों को केवल संपत्ति या वस्तु मानने के बजाय संवेदनशील जीव मानता है. यहां के कानून के अनुसार, कुत्ते-बिल्ली के साथ दुर्व्यवहार, मारपीट या अंग-भंग करने पर 2 से 5 साल की सख्त जेल और भारी जुर्माना लगता है. यदि जानवर की मौत हो जाती है, तो सजा एक-तिहाई (1/3) और बढ़ जाती है. साथ ही दोषी पर जीवनभर कोई भी जानवर पालने पर रोक लगा दी जाती है.
इतना ही नहीं यह अपराध गैर-जमानती है, यानी थाने से बेल नहीं मिलती. वहां भारत और नेपाल की तरह हाल नहीं है. कानून के लागू होने की नजीर भी मिलती है. बेलो होरिज़ोंटे में 5 कुत्तों को भूखा रखने पर सैसॉं कानून के तहत पहली गिरफ्तारी हुई थी. वहीं, रियो ग्रांडे दो सुल की अदालत ने 6 कुत्तों को जान से मारने वाले को 7 साल, 9 महीने और 10 दिन की ऐतिहासिक जेल की सजा सुनाई.
भारत में कुत्ते, बिल्ली और अन्य पशुओं पर क्रूरता रोकने के लिए मुख्य रूप से दो कानून एक साथ लागू होते हैं. दोनों को लेकर कानूनी उलझन भी है. हालांकि, पुलिस को आजादी भी है कि मामले को देखते हुए दोनों धाराओं में मामला दर्ज हो सकता है. इसके बाद भी भारत में कोई भी ऐसी नजीर नहीं मिलती जिसकी चर्चा की जा सके.
पहला, पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960: इसका अधिनियम को PCA Act भी कहा जाता है. इसकी धारा 11 के तहत ऐसे मामलों को देखा जा सकता है. लेकिन, यह हास्यास्पद है कि इसमें जुर्माना 10 से 100 रुपये और जेल अधिकतम 3 महीने की है.
दूसरा, भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 325: BNS की धार 325 ने पुरानी IPC की धारा 428 और 429 की जगह ली है. इसके तहत किसी जानवर को जान से मारना, जहर देना, अपंग या विकलांग करना संज्ञेय अपराध है. इसमें 5 साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं. इसमें जानवर की मौद्रिक कीमत की पुरानी शर्त हटा दी गई है.
पुलिस FIR में दोनों धाराओं को जोड़ती है. यदि मामला केवल बांधकर रखने या उपेक्षा का है, तो PCA Act की धारा 11 लगती है. लेकिन यदि किसी ने लाठी से पीटकर मार डाला, नदी में फेंक दिया या जहर दे दिया, तो पुलिस PCA Act (क्रूरता के लिए) और BNS 325 (जान लेने/अपंग करने के लिए) दोनों लगाती है, जिससे 5 साल की सजा का रास्ता खुलता है. इसके बाद भी ऐसे मामलों में जमीनी हकीकत एकदम अलग है. हालांकि, भारत में अन्य जानवरों के लिए गाय और गौवंश की सुरक्षा ज्यादा पुख्ता है क्योंकि, यह राज्य सूची का विषय है.
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB Animal Cruelty Data India) द्वारा मई 2026 में पहली बार जारी किए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, देश में पशु क्रूरता के सालाना लगभग 9,039 मामले दर्ज हो रहे हैं. मेट्रो शहरों में कनविक्शन रेट 93.8% तक है, लेकिन अदालतों में मुकदमों के लंबित (पेंडिंग) रहने की दर 82% से अधिक है. ऐसे में सवाल उठता है कि कानून में 5 साल की सजा लिखे होने के बावजूद भारत में दोषियों का जेल जाना बेहद दुर्लभ क्यों है? तो इसका उत्तर है..
भारत में गाय और गौवंश की सुरक्षा को लेकर कानून पूरी तरह अलग और बेहद सख्त हैं क्योंकि यह राज्य सूची का विषय है. यूपी, गुजरात, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में गौवंश हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध है. इन राज्यों के विशिष्ट गोसंरक्षण कानूनों के तहत 7 से 10 साल तक की कठोर जेल, लाखों का जुर्माना और यह अपराध पूरी तरह गैर-जमानती है.
हालांकि, असम और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में केवल 14 साल से अधिक उम्र या अक्षम मवेशियों को ‘फिटनेस सर्टिफिकेट’ मिलने पर ही वध की अनुमति है, जिस पर 2026 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने सख्त निगरानी के आदेश दिए. वहीं पूर्वोत्तर राज्यों, केरल और गोवा में स्थानीय खान-पान के आधार पर प्रतिबंध नहीं है. इसमें मामले में प्रतिबंध की याचिका भी मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट खारिज कर चुका है.
सैद्धांतिक रूप से, नई भारतीय न्याय संहिता (BNS 325) के तहत भारत में 5 साल की जेल संभव है. लेकिन व्यावहारिक रूप से, जब तक दो बड़े कानूनी सुधार नहीं होते, तब तक ब्राजील जैसी मिसाल कायम करना नामुमकिन रहेगा.
| देश | कानून | सामान्य सजा | गंभीरता पर सजा | जमानत | जानवर पालना |
| नेपाल | मुलुकी अपराध संहिता, 2074 (दफा 290 व 289) | 3 महीने तक की कैद या ₹5,000 (NPR) जुर्माना | गाय-बैल पर 3 साल तक जेल; अन्य पशुओं पर सीमित सजा | जमानती (Bailable) | कोई प्रावधान नहीं |
| ब्राजील | सैसॉं कानून 2020 (Federal Law 14,064) | 2 से 5 साल तक की सख्त जेल (Reclusão) व भारी जुर्माना | मौत होने पर सजा 1/3 बढ़ जाती है (7+ साल तक की जेल हुई है) | गैर-जमानती (Non-Bailable) | पूर्ण प्रतिबंध |
| भारत | PCA Act 1960 (Sec 11) & BNS 2023 (Sec 325) | ₹10 से ₹50 जुर्माना (PCA Act) या 3 महीने तक जेल | BNS 325 के तहत 5 साल तक की जेल या जुर्माना या दोनों | BNS 325 जमानती (Bailable) है | स्पष्ट कानूनी रोक नहीं |
नेपाल के बेजुबान कुत्ते की चीख केवल एक देश की सीमा तक सीमित नहीं है. यह इंसानियत के जमीर पर एक तमाचा है. ब्राजील ने यह साबित किया है कि अगर इच्छाशक्ति हो तो ‘सैसॉं कानून’ जैसे फौलादी नियमों से समाज में खौफ पैदा हो सकता है. भारत में संस्कृति और परंपरा के स्तर पर जीवों पर दया का भाव सर्वोपरि रहा है, लेकिन आज के दौर में सिर्फ नैतिक उपदेशों से काम नहीं चलेगा. जब तक भारत अपने कमजोर कानूनों की मरम्मत करके जुल्म ढाने वालों के लिए सख्त नहीं बनेगा कानून की किताबों में लिखी 5 साल की सजा केवल कागजी शेर ही बनी रहेगी.
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