प्रियंका गांधी और राहुल गांधी (फोटो- @INCindia)
कुछ हफ़्तों पहले सोशल मीडिया पर प्रियंका गांधी का एक अंग्रेजी वीडियो जारी हुआ। उसमें उन्होंने अपने भाई राहुल गांधी के व्यक्तित्व के बारे में काफ़ी कुछ कहा। उनके इस वक्तव्य से राहुल गांधी के व्यक्तित्व की अनेक उन बातों का पता चला जिनकी चर्चा कभी एकतरफ़ा हो चुके मीडिया ने नहीं की। इन दिनों जब राहुल की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ काफ़ी चर्चा में हैं, तो पाठकों के साथ इस वीडियो का ज़िक्र करना उचित होगा।
प्रियंका गांधी अपने भाई को अपना सबसे करीबी मित्र बताते हुए अपने बचपन को याद करती हैं। किस तरह उनका बचपन दर्दनाक हादसों और हिंसा का साक्षी रहा। इन दोनों ने अपनी दादी, इंदिरा गांधी को दूसरी माँ के रूप में पाया। 1984 में इंदिरा जी की हत्या के समय राहुल की उम्र मात्र 14 साल की थी। वे कहती हैं कि चार जनों के एक छोटे परिवार के पारस्परिक स्नेह ने ही उनको सभी कठिनाइयों का सामना करने की ताक़त दी।
1991 में जब राजीव गांधी की हत्या हुई तो राहुल विदेश में पढ़ रहे थे। इस निर्मम हत्या कांड ने बहन भाई को झकझोर कर रख दिया था। उस कठिन समय में भी राहुल ने प्रियंका से कहा कि “उनके मन में किसी तरह का गुस्सा नहीं है।” राहुल को अक्सर उनके मुक्त विचारों के लिये विपक्ष से निंदा का सामना करना पड़ता है। उनके साहस का मज़ाक़ उड़ाया जाता रहा। इसके बावजूद वे कभी भी क्रोधित नहीं हुए और न ही अपने अंदर किसी के प्रति घृणा को उत्पन्न होने दिया।
विपक्ष द्वारा हर रोज़ उन्हें पप्पू कहकर अपमानित किया जाता रहा, उनकी पढ़ाई लिखाई पर सवाल उठाए गये। सवाल भी उन लोगों ने उठाए जिनके बड़े-बड़े नेता भी अपने पढ़े लिखे होने का सही प्रमाण आज तक नहीं दे पाये।
प्रियंका कहती हैं, “बावजूद इस सबके राहुल ने सूझबूझ और हिम्मत दिखा कर विपक्षी नेताओं को गले लगाने का साहस भी दिखाया। बहुत कम लोग जानते हैं कि राहुल ने धार्मिक किताबें भी पढ़ी हैं। फिर वो चाहे हिंदू, इस्लाम, बौद्ध या ईसाई धर्म की किताबें हों। राहुल ने वेद, शैव और उपनिषदों को जानने का भी प्रयास किया है।”
अपने निजी जीवन में वे एक साधारण व्यक्तित्व वाले आम इंसान हैं। प्रियंका याद करते हुए बताती हैं कि “एक दिन जब वे उनके घर गईं तो वे अपनी अलमारी की सफ़ाई कर रहे थे। प्रियंका के पूछने पर राहुल ने बताया कि वे अपने सामान को केवल दस वस्तुओं में सिमेट रहे हैं। वे बताती हैं तब से राहुल के पास न तो उन दस वस्तुओं से अधिक कुछ है न ही उससे अधिक रखने कि इच्छा है।” किसी ने कभी राहुल गांधी को महँगे कपड़े या चश्मे पहने नहीं देखा होगा।
राहुल जापानी आत्मरक्षा ‘आइकीडो’ में ‘ब्लैक बेल्ट’ हासिल कर चुके हैं। साथ ही वे अपने पिता की ही तरह एक योग्य पायलट भी हैं। कम लोगों को पता होगा कि राहुल गांधी प्रशिक्षक स्तर के गोताखोर होने के नाते एक साँस में 75 मीटर गहराई तक समुद्र में छलाँग लगा सकते हैं। उनकी शारीरिक क्षमता का अनुमान इससे ही लगाया जा सकता है कि वे भारत तिब्बत सीमा पुलिस द्वारा आयोजित पर्वतारोहण के कार्यक्रम में भी भाग ले चुके हैं।
सामाजिक आंदोलनों व विभिन्न संस्कृति के लोगों को समझने की नीयत से राहुल दुनिया के कई देशों में यात्रा कर चुके हैं। प्रियंका गांधी के अनुसार “राहुल को अपने सहयोगियों व समर्थकों के लिए सामाजिक न्याय, सच्चाई व समानता बहुत महत्व रखती है। वे लोकतंत्र में पूरा विश्वास रखते हैं। वे अभिव्यक्ति की आज़ादी, धर्म, भाषा व संस्कृति की आज़ादी में भी पूरा विश्वास रखते हैं। उनका मानना है कि इस राष्ट्र के वास्तविक स्वरूप की स्थापना जनता द्वारा और जनता के लिए ही हुई।”
प्रियंका के इस वीडियो को देख कर राहुल गांधी के बारे में बहुत कुछ ऐसा पता चला जो शायद देश के ज़्यादातर लोगों को पता नहीं होगा। सोचा क्यों इसे व्हाट्सएप पर अपने साढ़े सात हज़ार संपर्कों को भी भेजा जाए। इस पर बहुत सारी रोचक प्रतिक्रियाएँ आईं। अधिकतर लोगों का कहना था कि राहुल गांधी अपने पिता की तरह एक साफ़ दिल इंसान हैं। उनके व्यक्तित्व में झूठ बोलने या अपने बारे में बढ़-चढ़ कर दिखावा करने की प्रवृत्ति नहीं है। पर इन टिप्पणीयों के साथ ही कई टिप्पणियाँ ऐसी भी आईं जिन में कहा गया कि राहुल गांधी एक अच्छे इंसान तो हैं पर कुशल राजनेता नहीं हैं। कुछ की राय यह थी कि राहुल गांधी को नाहक राजनीति में धकेला जा रहा है। प्रश्न है कि देश की राजनीति में सत्ताधारी भाजपा को मिलाकर कितने नेता ऐसे हैं जिनका व्यक्तित्व राहुल गांधी के निकट भी हो। बहुत से अपराधी, बलात्कारी, माफ़ियाओं और कम पढ़े लिखे लोगों को चुनने वाली इस देश की जनता के लिए क्या राहुल गांधी इतने बेकार हैं कि उन्हें राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए? लोकतंत्र में अगर समाज विरोधियों की भूमिका है, तो राहुल गांधी जैसे व्यक्ति की क्यों नहीं हो सकती?
दिन-रात एक ही दल और उसके नेता की चारण भाटों की तरह प्रशंसा और गुणगान करने वाला मीडिया आज राहुल गांधी की इतनी सफल ‘भारत जोड़ो यात्रा’ पर कोई विस्तृत रिपोर्टिंग नहीं कर रहा। पर यही मीडिया पिछले कुछ वर्षों से राहुल गांधी को ‘पप्पू’ सिद्ध करने में कोई मौक़ा नहीं छोड़ रहा। जबकि ये तथाकथित ‘पप्पू’ हर दिन, हर मोड़ पर बड़ी बेबाक़ी से मीडिया का सामना करता आ रहा है। जो हिम्मत पिछले बरसों में इस देश के कई बड़े नेता एक बार भी नहीं दिखा पाए। अगर उनमें सच्चाई और नैतिक बल है तो वे प्रेस से इतना डरते क्यों हैं? ‘भारत जोड़ो यात्रा’ की समाप्ति के बाद राहुल गांधी राजनीति में क्या हासिल कर पाएँगे ये तो भगवान या इस देश के मतदाता ही जानते हैं। पर इस लंबी यात्रा में चल कर और आम जनता से घुलमिल कर राहुल गांधी ने वो प्राप्त किया है जो भारत के सैंकड़ों वर्षों के इतिहास में किसी ने प्राप्त नहीं किया। क्योंकि उन्होंने ऐसी हिम्मत ही नहीं दिखाई। इस देश की राजनीति में कभी भी विपक्ष का सत्ता पक्ष द्वारा इतना अपमान नहीं किया गया जितना पिछले आठ वर्षों में सार्वजनिक मंचों से किया गया है। अगर ऐसी अपमानजनक टिप्पणियां करने वाले नेताओं और दल के दामन बेदाग़ होते तो उनकी बात का असर पड़ता। पर असर नहीं पड़ा तभी तो ब्लैकमेलिंग के हमले सह कर भी विपक्ष सीना तान कर खड़ा है। यूँ राजनीति में दूध का धुला तो कोई नहीं होता।
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