राजकमल प्रकाशन के 81वें स्थापना दिवस पर शनिवार शाम आयोजित ‘सहयात्रा उत्सव’ में समकालीन साहित्य और समाज से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों पर विचार-विमर्श हुआ. इस अवसर पर ‘भविष्य के स्वर’ विचार-पर्व के छठे अध्याय में पांच युवा वक्ताओं कलाकार उन्नति चौधरी, शोधार्थी-अध्येता पंकज कुमार, कवि पराग पावन, कथाकार-आलोचक शहनाज़ रहमान और पत्रकार सोनल पटेरिया ने व्याख्यान दिया.
इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित इस कार्यक्रम में लोकतंत्र को अधिक समावेशी बनाने की जरूरत, उर्दू अदब की भूली-बिसरी महिला आवाज़ों की पुनर्पहचान, ‘डायन’ जैसी हिंसक और घातक अवधारणाओं की पड़ताल और बदलती तकनीक के दौर में कविता के रूपांतरण जैसे मुद्दे प्रमुख रूप से केंद्र में रहे. वक्ताओं ने कहा कि साहित्य केवल सृजन नहीं, समाज से संवाद भी है; और संवाद तभी सार्थक होता है जब उसमें हाशिये की आवाज़ें, नई दृष्टि और महत्वपूर्ण प्रश्न शामिल हों.
‘भविष्य के स्वर’ में शहनाज़ रहमान ने ‘महिला उर्दू अदीबों की गुमशुदा आवाज़ें’ विषय पर अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया. उन्होंने कहा कि हमारे समाज और अदब में औरत की आवाज़ को अक्सर सुना नहीं गया. उसके जज़्बात और उसकी रचनात्मकता को मर्दाना नज़रिए से आंका गया. इसी वजह से उर्दू की कई अहम महिला कलमकार इतिहास के हाशिये पर चली गईं. अब ज़रूरत है कि उन्हें सिर्फ़ ‘ख़वातीन अदब’ तक सीमित न रखा जाए. उन्हें उर्दू की मुख्य धारा और पूरी अदबी परम्परा का हिस्सा माना जाए.
उन्नति चौधरी ने ‘कहां से आती है मेरी कला’ विषय पर अपना वक्तव्य में कहा, मैं ठीक-ठीक नहीं बता सकती कि मेरी कला कहां से आती है. वह किसी एक क्षण में पैदा नहीं होती. जैसे ईंटें अचानक कमरा नहीं बन जातीं, वैसे ही एक रेखा अचानक चित्र नहीं बनती. बनने की इस प्रक्रिया में कुछ अधूरे पल होते हैं, कुछ ठहराव, कुछ दोहराव. मैं शब्दों से डरती थी, इसलिए हाथों ने रास्ता चुना. ड्रॉ करना मेरे लिए एक सुरक्षित जगह बन गई, जहां अर्थ तुरंत नहीं मांगा जाता. मैं संकेतों के सहारे आगे बढ़ती रही. और धीरे-धीरे समझा कि कला समझ लेने से नहीं, करते रहने से बनती है. यहीं से आती है मेरी कला.
सोनल पटेरिया ने ‘डायन प्रथा : सूचना और सच्चाई’ विषय पर केन्द्रित अपने वक्तव्य में कहा, डायन कोई अलौकिक शक्ति नहीं है. यह समाज द्वारा थोपी गई एक हिंसक पहचान है. इसका शिकार अधिकतर गरीब, दलित और आदिवासी महिलाएँ होती हैं. बीमारी, शराब से हुई मौत या निजी झगड़े का दोष भी उन पर डाल दिया जाता है. ओझा और भीड़ के सामने उनकी आवाज़ दबा दी जाती है. यह एक ओर अन्धविश्वास और साजिश का, तो दूसरी ओर कानून और स्वास्थ्य व्यवस्था की विफलता का मसला हैं.
पंकज कुमार ने ‘वैश्वीकरण, सामाजिक न्याय और अतिपिछड़ा वर्ग’ विषय पर बोलते हुए कहा, 1990 के बाद देश में वैश्वीकरण और सामाजिक न्याय की राजनीति साथ-साथ चली. लेकिन इनका लाभ सभी पिछड़े समुदायों तक बराबर नहीं पहुंचा. कुछ प्रभावशाली जातियां आगे बढ़ीं, जबकि कारीगर और अतिपिछड़े समुदाय पीछे रह गए. आज ये समुदाय केवल प्रतिनिधित्व नहीं, बल्कि समान अवसर, सम्मानजनक जीवन और नीतिगत हिस्सेदारी की मांग कर रहे हैं. लोकतंत्र को वास्तविक अर्थों में समावेशी बनाना है तो नीतियों और राजनीतिक हिस्सेदारी पर नए सिरे से विचार करना होगा.
पराग पावन ने ‘कविता का कल’ विषय पर अपना वक्तव्य देते हुए कहा, इक्कीसवीं सदी की कविता पढ़े जाने से अधिक सुने जाने की कविता बनने जा रही है. तकनीक ने हमारी आंख और कान दोनों को गहराई से प्रभावित किया है. कविता का रिश्ता इन दोनों से है, इसलिए उसकी भाषा और रूप बदलना तय है. सोशल मीडिया के शोर में सच्ची कविता की पहचान आसान नहीं होगी. कल की कविता वही होगी जो अनुभवों के एकदम बीच खड़ी होकर, जोखिम उठाते हुए, मनुष्य की जटिल सच्चाइयों का ईमानदार आख्यान रचे.
‘भविष्य के स्वर’ विचार-पर्व के छठे अध्याय की प्रस्तावना रखते हुए राजकमल प्रकाशन के प्रबन्ध निदेशक अशोक महेश्वरी ने कहा, 2019 से ‘भविष्य के स्वर’ के माध्यम से हम गंभीर और संभावनाशील युवा प्रतिभाओं को मंच दे रहे हैं. पिछले पांच अध्यायों में इस मंच से हमने जिन 28 युवा प्रतिभाओं को सुना, उन्होंने समय के साथ अपनी क्षमता सिद्ध की है. आज पाँच और नई प्रतिभाएं हमारे सामने हैं. हम यह दावा नहीं करते कि हमारे द्वारा चुने गए नाम ही पूरी युवा रचनात्मकता का प्रतिनिधित्व करते हैं, लेकिन इतना जरूर कहेंगे कि वे उन महत्वपूर्ण आवाज़ों में शामिल हैं जो अपने क्षेत्र में गंभीर और उल्लेखनीय काम कर रही हैं. यह देखकर व्यक्तिगत रूप से संतोष होता है कि इस मंच से जुड़े अधिकांश युवाओं ने आगे चलकर अपनी पहचान मजबूत की है.
अपने सम्बोधन में अशोक महेश्वरी ने कहा, राजकमल के 60वें स्थापना वर्ष पर सहयात्रा उत्सव की शुरुआत इसी सोच के साथ की गई थी कि इसे एक उत्सव की तरह मनाया जाए. यह ऐसा अवसर हो जहां अनौपचारिक माहौल में किताबों, हिन्दी समाज और साहित्य के भविष्य से जुड़े सवालों पर खुलकर बातचीत की जा सके. यह उत्सव हमें अपनी जिम्मेदारियों का अहसास कराता है और पाठकों-लेखकों का साथ हमारे संकल्पों को शक्ति देता है.
अपने संबोधन में आगे उन्होंने प्रकाशन की प्राथमिकताओं को स्पष्ट करते हुए कहा, हमारा विश्वास है कि प्रकाशन केवल बाजार से तय नहीं होता. ऐसी किताबों को भी जगह मिलनी चाहिए जिनका स्थायी साहित्यिक और सामाजिक महत्व हो. राजकमल की यात्रा एक समावेशी और प्रगतिशील समाज के सपने से जुड़ी है, और हम उसी दिशा में निरन्तर काम कर रहे हैं.
राजकमल प्रकाशन ने 2019 में अपने स्थापना दिवस के अवसर पर ‘भविष्य के स्वर’ विचार-पर्व की शुरुआत की थी. इस शृंखला का उद्देश्य नई पीढ़ी की दृष्टि से समय की आहट को समझना और समकालीन समाज तथा साहित्य के ज्वलंत प्रश्नों पर संवाद का मंच तैयार करना रहा है. पिछले पांच अध्यायों में 28 युवा वक्ता अपने विचार रख चुके हैं. 2026 का आयोजन इस शृंखला का छठा अध्याय है. इस विचार-पर्व के अंतर्गत विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों से आने वाले उन युवाओं को आमंत्रित किया जाता है जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में गंभीर और उल्लेखनीय संभावनाएं जगाई है. ‘भविष्य के स्वर’ का उद्देश्य साहित्य, कला, संस्कृति और सामाजिक चिंतन के क्षेत्र में उभर रही नई दृष्टियों, अनुभवों और हस्तक्षेपों को व्यापक पाठक-समुदाय तक पहुंचाना है.
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-भारत एक्सप्रेस
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