विश्लेषण

16-17 अप्रैल 2026: जब संसद में महिला आरक्षण बिल फिर गिरा, और कांग्रेस-सपा-डीएमके-INDIA गठबंधन जिम्मेदार बने

संसद के इतिहास में 16 और 17 अप्रैल 2026 की तारीख एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई. जिस महिला आरक्षण बिल का देश की आधी आबादी तीन दशक से इंतजार कर रही थी, वह इन दो दिनों में लोकसभा और राज्यसभा में बहस के बाद भी लागू नहीं हो सका. तकनीकी रूप से बिल 2023 में पास हो चुका था, लेकिन उसे जमीन पर उतारने के लिए जरूरी ‘परिसीमन संशोधन विधेयक’ और ‘जनगणना आधार संशोधन विधेयक’ 16 अप्रैल को लोकसभा और 17 अप्रैल को राज्यसभा में गिर गए. इन दोनों दिनों की कार्यवाही ने साफ कर दिया कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके और पूरे INDIA गठबंधन ने मिलकर महिला आरक्षण को फिर एक बार रोक दिया.

लोकसभा में हंगामे की पटकथा

16 अप्रैल की सुबह 11 बजे जैसे ही लोकसभा की कार्यवाही शुरू हुई, सरकार ने ‘परिसीमन संशोधन विधेयक 2026’ पेश किया. इस संशोधन का मकसद था कि महिला आरक्षण को 2011 की जनगणना के आधार पर लागू किया जाए, ताकि 2029 के चुनाव से पहले 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो सकें.

लेकिन कांग्रेस संसदीय दल के नेता ने तुरंत खड़े होकर कहा कि बिना जातिगत जनगणना के कोई भी परिसीमन स्वीकार नहीं होगा. समाजवादी पार्टी के सांसद वेल में आ गए और ‘कोटा में कोटा दो’ के नारे लगाने लगे. डीएमके सांसदों ने ‘दक्षिण के साथ अन्याय बंद करो’ के पोस्टर लहराए.

सरकार की तरफ से गृह मंत्री ने बार-बार दोहराया कि ‘प्रो-राटा’ परिसीमन में तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक – किसी भी राज्य की एक भी सीट नहीं घटेगी. कुल सीटें 543 से बढ़ाकर 816 की जाएंगी, ताकि किसी मौजूदा पुरुष सांसद की सीट न जाए. मगर INDIA गठबंधन के सभी घटक दलों ने एक साथ वॉकआउट की रणनीति अपनाई.

वोटिंग का खेल: जब सांसदों ने बटन ही नहीं दबाया

दोपहर 2 बजे जब वोटिंग का समय आया, कांग्रेस ने व्हिप जारी करके अपने सांसदों को अनुपस्थित रहने का आदेश दिया. समाजवादी पार्टी के 37 सांसद सदन में थे, लेकिन वोटिंग के दौरान बटन ही नहीं दबाया. डीएमके के 22 सांसदों ने ‘नोटा’ का बटन दबा दिया.

नतीजा: संशोधन विधेयक 202 के मुकाबले 241 वोट से गिर गया. अगर कांग्रेस के 98, सपा के 37 और डीएमके के 22 सांसद पक्ष में वोट देते, तो बिल आराम से पास हो जाता.

राज्यसभा में वही स्क्रिप्ट: 17 अप्रैल 2026

17 अप्रैल को राज्यसभा में ‘जनगणना आधार संशोधन विधेयक’ लाया गया. इसका उद्देश्य था कि महिला आरक्षण को 2027 की प्रस्तावित जनगणना से डीलिंक करके 2011 के आंकड़ों पर लागू किया जाए.

यहाँ भी INDIA गठबंधन की रणनीति साफ थी. कांग्रेस के राज्यसभा नेता ने बहस शुरू करते ही कहा कि ‘यह बिल संघीय ढांचे पर हमला है’. डीएमके ने कहा कि ‘बिना राज्य सरकारों की सहमति के परिसीमन नहीं हो सकता’. समाजवादी पार्टी ने फिर ‘पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए अलग कोटा’ की मांग रख दी.

टीएमसी, आरजेडी, एनसीपी-एसपी समेत INDIA के सभी दलों ने एक सुर में संशोधन की मांगें रखीं. कुल 23 संशोधन प्रस्ताव आए. सभापति ने जब कहा कि संशोधनों पर अलग से चर्चा के लिए बिल को प्रवर समिति भेजना पड़ेगा, तो सरकार ने कहा कि इससे 2029 का डेडलाइन निकल जाएगा.

पर्चियां फटीं, धरना दिया, बिना वोटिंग के ही खत्म हुआ सत्र

वोटिंग के समय कांग्रेस और डीएमके ने सदन से वॉकआउट कर दिया. समाजवादी पार्टी के सदस्यों ने वोटिंग के दौरान पर्चियां फाड़ीं और चेयर के सामने धरना दे दिया. सदन 4 बार स्थगित हुआ. आखिरकार रात 8 बजे बिना वोटिंग के ही सत्रावसान कर दिया गया. नियम के मुताबिक सत्र खत्म होने के साथ बिल लैप्स हो गया.

चारों दलों की भूमिका: डॉ शालिनी अली की नजर में तथ्य और घटनाक्रम

1. कांग्रेस की दोहरी नीति

2023 में बिल का समर्थन करने वाली कांग्रेस ने 16 और 17 अप्रैल को सदन में ऐसी शर्तें रखीं जो पूरी करना 2026 में संभव ही नहीं था. जातिगत जनगणना की मांग नई नहीं है, लेकिन उसे महिला आरक्षण से जोड़ना सीधे-सीधे बिल को टालने की चाल थी. लोकसभा में व्हिप जारी करके सांसदों को अनुपस्थित रखना और राज्यसभा से वॉकआउट करना यह साबित करता है कि समर्थन केवल कागजी था.

2. समाजवादी पार्टी का पुराना अड़ंगा

सपा ने 1998 में भी बिल की कॉपी फाड़ी थी, 2010 में भी विरोध किया था, और 2026 में फिर वही किया. ‘कोटा में कोटा’ की मांग संवैधानिक रूप से टिकती नहीं है क्योंकि धर्म आधारित आरक्षण नहीं दिया जा सकता. सपा यह जानती है. मगर उसने जानबूझकर ऐसी मांग रखी जिससे बिल कभी पास न हो. 16 अप्रैल को वोट न देना और 17 अप्रैल को सदन में पर्चियां फाड़ना – दोनों दिन सपा ने बिल को गिराने में सीधी भूमिका निभाई.

3. डीएमके का क्षेत्रीय कार्ड

डीएमके ने दोनों दिन ‘दक्षिण की सीटें घट जाएंगी’ का डर दिखाया. जबकि सरकार का ‘प्रो-राटा’ फॉर्मूला साफ कहता है कि तमिलनाडु की 39 सीटें घटने के बजाय बढ़कर 42 हो जाएंगी. डीएमके ने आंकड़े जानते हुए भी गलत नैरेटिव चलाया. राज्यसभा में ‘राज्यों की सहमति’ की शर्त रखना भी टालने की रणनीति थी, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत परिसीमन केंद्र का विषय है.

4. INDIA गठबंधन की सामूहिक जिम्मेदारी

कांग्रेस, सपा, डीएमके अकेले नहीं थे. 16 अप्रैल को लोकसभा में आरजेडी, एनसीपी-एसपी, शिवसेना-यूबीटी, टीएमसी सभी ने वोटिंग से पहले वॉकआउट किया. 17 अप्रैल को राज्यसभा में जेएमएम, आप, सीपीएम ने मिलकर 23 संशोधन दिए. अगर गठबंधन चाहता तो संशोधन वापस लेकर बिल पास करवा सकता था. मगर गठबंधन की प्राथमिकता महिला आरक्षण नहीं, बल्कि सरकार को घेरना थी.

नतीजा: फिर इंतजार – आधी आबादी का सपना टला

16 और 17 अप्रैल की घटनाओं के बाद यह तय हो गया कि 2029 के लोकसभा चुनाव में भी 33 प्रतिशत महिला सांसदों का सपना पूरा नहीं होगा. सरकार ने साफ कहा कि बिना परिसीमन के बिल लागू नहीं हो सकता, और परिसीमन के लिए विपक्ष का साथ जरूरी है.

कांग्रेस ने 1996 से 2014 तक बिल को लटकाया. समाजवादी पार्टी ने हर बार सदन में हंगामा किया. डीएमके ने समर्थन के नाम पर हमेशा नई शर्तें जोड़ीं. 2026 में तीनों ने मिलकर INDIA गठबंधन के बैनर तले वही इतिहास दोहरा दिया.

महिला आरक्षण बिल का गिरना किसी तकनीकी पेंच की वजह से नहीं हुआ. यह गिरा क्योंकि कांग्रेस ने वोट नहीं दिया, सपा ने सदन नहीं चलने दिया, डीएमके ने झूठा डर फैलाया, और INDIA गठबंधन ने इन तीनों का साथ दिया. 16 और 17 अप्रैल 2026 की संसद की कार्यवाही इसका दस्तावेज है.

आधी आबादी के सवाल – और जवाब किसके पास?

आधी आबादी अब भी पूछ रही है: जब समर्थन था तो वोट क्यों नहीं दिया? जब चिंता थी तो समाधान क्यों नहीं निकाला? जवाब कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके और INDIA गठबंधन के पास है.

– डॉ शालिनी अली, समाजसेविका के आलेख पर आधारित समाचार विश्लेषण

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-भारत एक्सप्रेस

Dr. Khalid Raza Khan

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