सांकेतिक तस्वीर.
डेलॉयट इंडिया ने मंगलवार (21 जनवरी) को अनुमान जताया कि चालू वित्त वर्ष में भारत की जीडीपी 6.5-6.8 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी और कहा कि भारत को उभरते वैश्विक परिदृश्य के अनुरूप ढलना होगा और सतत वृद्धि के लिए अपनी घरेलू ताकत का उपयोग करना होगा.
अपनी आर्थिक परिदृश्य रिपोर्ट में Deloitte India ने यह भी कहा कि देश को वैश्विक अनिश्चितताओं से अलग हटकर अपनी घरेलू क्षमता का दोहन करने की जरूरत है.
वैश्विक और घरेलू चुनौतियों के बावजूद, भारत वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में आगे बढ़ रहा है, जैसा कि उच्च मूल्य वाले विनिर्माण निर्यातों, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी एवं उपकरणों के क्षेत्र में, की बढ़ती हिस्सेदारी से स्पष्ट होता है.
डेलॉयट इंडिया ने अपने नवीनतम आर्थिक परिदृश्य में वित्त वर्ष 2024-25 के लिए अपने वार्षिक जीडीपी वृद्धि अनुमान को संशोधित कर 6.5-6.8 प्रतिशत कर दिया है, जबकि अगले वर्ष 6.7-7.3 प्रतिशत की उम्मीद है. यह समायोजन सतर्क आशावाद की आवश्यकता को दर्शाता है क्योंकि अर्थव्यवस्था बढ़ती वैश्विक व्यापार और निवेश अनिश्चितताओं से निपट रही है. अक्टूबर में अपनी आर्थिक परिदृश्य रिपोर्ट में डेलॉयट इंडिया ने चालू वित्त वर्ष के लिए देश की आर्थिक वृद्धि दर 7-7.2 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया था.
इसमें कहा गया है, “भारत को उभरते वैश्विक परिदृश्य के साथ तालमेल बिठाना होगा और सतत विकास को गति देने के लिए अपनी घरेलू ताकत का उपयोग करना होगा. ऐसा करने का एक तरीका वैश्विक अनिश्चितताओं से आर्थिक अलगाव और भारत की अप्रयुक्त क्षमता का उपयोग करना होगा. कुछ संकेतक जो कुछ क्षेत्रों में लचीलेपन को दर्शाते हैं, वे ध्यान देने योग्य हैं.”
इस महीने की शुरुआत में राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) द्वारा जारी पहले अग्रिम अनुमानों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष में भारत की वृद्धि दर 6.4 प्रतिशत रहने की उम्मीद है, जो 4 साल का सबसे निचला स्तर है. आरबीआई को उम्मीद है कि चालू वित्त वर्ष में वृद्धि दर 6.6 प्रतिशत रहेगी.
डेलॉयट इंडिया की अर्थशास्त्री रुमकी मजूमदार ने कहा, “पहली तिमाही में चुनाव संबंधी अनिश्चितताओं और उसके बाद की तिमाही में मौसम संबंधी व्यवधानों के कारण निर्माण और विनिर्माण में मामूली गतिविधि के कारण सकल स्थिर पूंजी निर्माण अपेक्षा से कम रहा. पहली छमाही में सरकार का पूंजीगत व्यय वार्षिक लक्ष्य का मात्र 37.3 प्रतिशत रहा, जो पिछले वर्ष के 49 प्रतिशत से काफी कम है, और इसे जो गति प्राप्त करने की आवश्यकता है, उसमें अभी भी देरी है.”
उन्होंने कहा कि इसके अतिरिक्त, वैश्विक विकास की धीमी संभावना, औद्योगिक देशों के बीच व्यापार नियमों में संभावित बदलाव, तथा भारत और अमेरिका में पहले से अधिक कठोर मौद्रिक नीतियां, पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं में समन्वित सुधार में बाधा उत्पन्न कर सकती हैं, जिसकी हमने इस वित्तीय वर्ष में आशा की थी.
डेलॉयट ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि सरकार खुदरा निवेशकों के बढ़ते महत्व को स्वीकार करती है और आगामी केंद्रीय बजट 2025-26 में उनकी भागीदारी को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित कर सकती है.
उपायों में निवेश प्रक्रियाओं को सरल बनाना, घरेलू बचत को बाजार की अस्थिरता से बचाने के लिए सुरक्षा तंत्र को बढ़ाना, तथा अभियानों और प्रोत्साहनों के माध्यम से वित्तीय साक्षरता को बढ़ावा देना शामिल हो सकता है.
इसके अतिरिक्त, बजट में पूंजीगत व्यय को प्राथमिकता देने, कौशल विकास पहलों को आगे बढ़ाने, तथा आर्थिक लचीलापन बढ़ाने तथा मौजूदा वैश्विक अनिश्चितताओं के प्रभाव को कम करने के लिए डिजिटलीकरण में तेजी लाने की उम्मीद है.
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डेलॉयट ने कहा, “भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश और मध्य वर्ग की बढ़ती संपत्ति को अक्सर उपभोग मांग को बढ़ाने और श्रम बाजार को मजबूत करने के लिए सराहा जाता है. लेकिन अब हम जानते हैं कि वे देश के वित्तीय बाजारों की स्थिरता को भी बढ़ा रहे हैं.”
-भारत एक्सप्रेस
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