एजुकेशन

व्हाइट, पिंक और रेड कॉलर जॉब में क्या है अंतर? जानें आपकी नौकरी किस रंग की श्रेणी में आती है

White vs Pink vs Red Collar Jobs: अक्सर जब हम करियर या नौकरियों की बात करते हैं, तो ‘व्हाइट कॉलर’ या ‘ब्लू कॉलर’ जैसे शब्द कानों में पड़ते हैं. सुनने में तो ये किसी फैशन ट्रेंड या शर्ट के रंग जैसे लगते हैं, लेकिन असल में ये शब्द हमारे काम की पूरी कुंडली खोल देते हैं. ये ‘कॉलर जॉब्स’ हमें बताते हैं कि व्यक्ति का काम किस माहौल में होता है, उसकी जिम्मेदारी क्या है और उसकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति कैसी है. अगर आप भी इन रंगों के फेरबदल में उलझे हैं, तो चलिए आज बड़ी ही आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर इन अलग-अलग कॉलर वाली नौकरियों का असली मतलब क्या है.

व्हाइट कॉलर जॉब

सबसे पहले बात करते हैं ‘व्हाइट कॉलर’ यानी सफेदपोश नौकरियों की. यह शब्द 1930 के दशक में मशहूर लेखक अप्टन सिंक्लेयर ने दिया था. ये वो लोग हैं जिन्हें आप अक्सर सूट-बूट या साफ-सुथरी शर्ट पहनकर ऑफिस जाते देखते हैं. इनका काम पसीने वाला नहीं, बल्कि दिमाग वाला होता है.

मैनेजर, बैंक कर्मचारी, सॉफ्टवेयर इंजीनियर, अकाउंटेंट और प्रशासनिक अधिकारी इसी श्रेणी में आते हैं. इनका दिन मीटिंग्स, कंप्यूटर स्क्रीन, डेटा और रिपोर्ट्स के बीच बीतता है. ये आमतौर पर फिक्स सैलरी पाने वाले लोग होते हैं जिनका कार्यस्थल एयर-कंडीशंड केबिन या साफ-सुथरा ऑफिस डेस्क होता है.

पिंक कॉलर जॉब

अब आते हैं ‘पिंक कॉलर’ जॉब्स पर. 1990 के आसपास यह शब्द उन नौकरियों के लिए इस्तेमाल होना शुरू हुआ, जिनमें सेवा भावना सबसे ऊपर होती है. दिलचस्प बात यह है कि शुरुआत में इन्हें उन कामों से जोड़ा गया जिन्हें पारंपरिक रूप से महिलाएं ज्यादा करती थीं, जैसे- नर्सिंग, टीचिंग, हाउसकीपिंग या बेबीसिटिंग.

हालांकि, आज के दौर में यह सिर्फ महिलाओं तक सीमित नहीं है. वेटर, सेल्सपर्सन, दर्जी या फूलवाले, यानी वो तमाम लोग जो सीधे ग्राहकों से जुड़ते हैं और उन्हें सर्विस देते हैं, वे पिंक कॉलर कैटेगरी में आते हैं. इनका काम लोगों की मदद करना और उनसे बेहतर तालमेल बिठाना होता है.

ये भी पढ़ें- अब ‘सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर’ नहीं बन पाएंगे अफसर, कोचिंग संस्थानों के विज्ञापन और रील बनाने पर सख्त रोक

रेड कॉलर जॉब

अंत में बात उस वर्ग की, जो इस दुनिया के अस्तित्व के लिए सबसे जरूरी है-‘रेड कॉलर’ जॉब्स. इन्हें ‘लालपोश श्रमिक’ भी कहा जाता है. ये वो लोग हैं जिनका काम सीधे तौर पर प्रकृति और जमीन से जुड़ा होता है. किसान, मछुआरे, खनन करने वाले मजदूर या जंगलों में काम करने वाले लोग इसी श्रेणी का हिस्सा हैं.

इनका काम एसी कमरों में नहीं, बल्कि खुले आसमान के नीचे होता है. इसमें शारीरिक मेहनत सबसे ज्यादा लगती है और जोखिम भी काफी होता है. चूंकि ये लोग प्राकृतिक संसाधनों (जमीन, पानी, जानवर) से सीधे तौर पर जुड़े होते हैं, इसलिए इनके काम की प्रकृति को ‘रेड कॉलर’ का नाम दिया गया है.

Also Follow Bharat Express on Youtube

-भारत एक्सप्रेस

Radha Priya

Recent Posts

1 अक्टूबर से बदल जाएगा रसोई गैस का नियम! सब्सिडी वाला LPG सिलेंडर चाहिए तो कराना होगा बायोमेट्रिक आधार वेरिफिकेशन

LPG Subsidy New Rules: घरेलू एलपीजी उपभोक्ताओं को सरकारी सब्सिडी के साथ निर्धारित कीमत पर…

7 hours ago

‘साहब को सेट करने’ के नाम पर मांगी 50 हजार की घूस! दिल्ली CBI की रेड में बेनकाब हुआ दलाल

दिल्ली में 50 हजार की रिश्वत लेते विक्रम उर्फ राधे को सीबीआई ने रंगे हाथों…

7 hours ago

अंडमान के पर्यटन को नई दिशा देने की तैयारी, प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए बनेगा विजन डॉक्यूमेंट

Dr Dinesh Sharma: अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को पर्यटन की दृष्टि से और अधिक…

7 hours ago

खुद को खुद से बेहतर बना रहा है AI! बस एक साल बचा है… क्या इंसानी दुनिया का अंत होने वाला है?

एआई के जनक माने जाने वाले नोबेल पुरस्कार विजेता जेफ्री हिंटन ने एक बार फिर…

7 hours ago

ढलती उम्र में प्यार फिर मर्डर! 24 घंटों में कन्नौज पुलिस ने सुलझाई कत्ल की गुत्थी

कन्नौज के तिर्वा में 60 वर्षीय प्रवेश दुबे की कुल्हाड़ी से काटकर हत्या. प्रेम संबंध…

7 hours ago

ग्रीन फैशन से बदलेगी देश की तस्वीर! पीएम मोदी बोले- ‘सस्टेनेबिलिटी अब विकल्प नहीं, भविष्य की जरूरत’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को कहा कि सतत विकास (सस्टेनेबिलिटी) भारत की परंपरा और…

8 hours ago