Bihar Chunav Aurangabad Seat: औरंगाबाद दक्षिणी बिहार का सिर्फ एक जिला मुख्यालय नहीं बल्कि ऐसा क्षेत्र है जिसने अपने आंचल में सदियों की ऐतिहासिक विरासत और आधुनिक राजनीतिक द्वंद को समेटे हुए है. बिहार का चितौड़गढ़ कहे जाने वाले औरंगाबाद की औरंगाबाद सदर विधानसभा सीट का चुनावी रण इस बार दिलचस्प होने वाला है. इस सीट पर हमेशा से कांग्रेस का मजबूत जनाधार रहा है, लेकिन 2020 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी आनंद शंकर सिंह ने मात्र 2243 वोटों के मार्जिन से जीत दर्ज की.
कांग्रेस का यह किला बीजेपी के हिलकोरे को थाम पायेगा या नहीं ये पक्का नहीं कहा जा सकता. 2020 के विधानसभा चुनाव के नतीजों ने ये साबित किया कि इस सीट पर भाजपा प्रबल दावेदार है. इसलिए बीजेपी ने इस विधानसभा चुनाव में पड़ोसी रोहतास जिले के रहने वाले पूर्व बीजेपी सांसद गोपाल नाराणय सिंह के बेटे त्रिविक्रम नाराणय सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया है.
औरंगाबाद विधानसभा सीट की स्थापना 1951 में हुई थी. तब से इस सीट पर राजपूत उम्मीदवारों का दबदबा देखने को मिला है. औरंगाबाद विधानसभा सीट लंबे समय से राजपूत मतदाताओं का मजबूत आधार माना जाता रहा है. कुल मतदाताओं में 22 प्रतिशत से भी अधिक की हिस्सेदारी रखने वाला राजपूत समुदाय चुनावों में राजपूत उम्मीदवारों का ही समर्थन करता रहा है.
औरंगाबाद विधानसभा, औरंगाबाद लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है, जिसमें कुल छह विधानसभा सीटें हैं. इस विधानसभा क्षेत्र की जनसांख्यिकी भी काफी विविध है. यहां 21.64 प्रतिशत अनुसूचित जातियां और लगभग 19 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं. 2020 के चुनाव में 3,17,947 पंजीकृत मतदाताओं में से 53.49 प्रतिशत ने मतदान किया था.
इस विधानसभा सीट की स्थापना के बाद से ही कांग्रेस का इसपर दबदबा रहा है. कांग्रेस ने इस सीट पर कुल 8 बार जीत दर्ज की है. जबकि भारतीय जनता पार्टी ने 4 बार जीत दर्ज कर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है.
राजपूतों का गढ़ कहे जाने वाले इस विधानसभा के किले को 2020 में राजद ने भेद दिया. यह पहली बार था जब किसी गैर राजपूत उम्मीदवार ने इस विधानसभा सीट पर जीत हासिल की. हाल ही में 2024 के लोकसभा चुनाव में राजद के अभय कुशवाहा ने इस सीट पर जीत दर्ज कर इतिहास रच दिया. अभय औरंगाबाद लोकसभा सीट से जीतने वाले पहले गैर राजपूत सांसद बने. जो इस बात का संकेत देता है कि अब सिर्फ जाति नहीं बल्कि गठबंधन और उम्मीदवारों की छवि भी इस सीट पर निर्णायक भूमिका निभा रही है.
2020 के विधानसभा चुनाव ने औरंगाबाद को एक हाई-प्रोफाइल और कांटे की टक्कर वाली सीट बना दिया. कांग्रेस के उम्मीदवार आनंद शंकर सिंह ने भाजपा के चार बार के विधायक रहे रामाधार सिंह को काफी कम अंतर से मात दी. इस बार भी यह सीट कांग्रेस के खाते में गई है और कांग्रेस ने आनंद शंकर सिंह को फिर यहां से टिकट दिया है.
औरंगाबाद सोन नदी की सीमा पर मौजूद है. औरंगाबाद कृषि प्रधान जिला है. इसलिए यहां की राजनीति को प्रभावित करने वाले मुद्दे भी ग्रामीण विकास से जुड़े हुए हैं. जिसमें सड़क, बिजली, पानी और सिंचाई शामिल हैं. इसके अलावा ग्रामीण स्वास्थ्य, शिक्षा की खराब स्थिति, बेरोजगारी और पलायन भी इस विधानसभा के शीर्ष एजेंडे में है.
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दशकों तक नक्सल गतिविधियों का दंश झेलने वाले औरंगाबाद में विकास की दर काफी कम है. बीते पांच सालों में बिहार में माओवादी घटनाओं में गिरावट आई है. राज्य सरकार ने 2025 के अंत तक इस जमीन से उग्रवाद को पूरी तरह से खत्म करने का लक्ष्य रखा है.
आज, इस क्षेत्र की पहचान इसकी कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था से है. अदरी नदी यहां से बहती है, जबकि सोन नदी इसकी पश्चिमी सीमा को छूती है. बार-बार सूखे की चुनौती के बावजूद, किसान यहां चावल, गेहूं, दालें और सरसों जैसी मुख्य फसलें उगाते हैं. पारंपरिक कलाओं, जैसे कालीन बुनाई और पीतल शिल्प काफी प्रसिद्ध हैं. नवीनगर सुपर थर्मल पावर प्लांट ने औद्योगिक विकास को नई गति दी है, जिसने रोजगार के नए द्वार खोले हैं. स्ट्रॉबेरी की खेती की अप्रत्याशित सफलता ने भी किसानों को आय का एक नया स्रोत दिया है.
-भारत एक्सप्रेस
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