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भोपाल की जहरीली रात का काला सच, क्या हम नई त्रासदी रोक पाएंगे?

Bhopal Gas Tragedy: कल्पना कीजिए, एक सर्द रात में अचानक हवा में जहर घुल जाए, जो तड़प-तड़पकर अनगिनत लोगों को मरने पर मजबूर कर दे. 2 दिसंबर 1984 की वो काली रात मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में कुछ वैसी ही थी. यूनियन कार्बाइड की फैक्ट्री से मिथाइल आइसोसाइनेट गैस का रिसाव हुआ, जो टैंक 610 में पानी के संपर्क से पैदा हुए दबाव की वजह से फट गया था. कीटनाशक बनाने वाली गैस मिथाइल आइसोसाइनेट के रिसाव से 2 हजार से ज्यादा मौतें और 50 हजार से ज्यादा घायल और शारीरिक रूप से अक्षम हुए. आज 41 सालों बाद भी भोपाल की गलियों में वो घाव हैं, जो शायद ही कभी भर सकें.

इसी दर्दनाक याद (Bhopal Gas Tragedy) को लेकर सबक सिखाने के लिए भारत हर साल 2 दिसंबर को राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस मनाता है. 1985 में स्थापित कल्याण आयुक्त कार्यालय और भोपाल गैस रिसाव अधिनियम जैसे कदम ने पीड़ितों को न्याय दिलाने की कोशिश की.

मुआवजा देने में सालों चली कोताही

मध्य प्रदेश के रसायन और पेट्रो रसायन विभाग के ऑफिशियल वेबसाइट पर मिली जानकारी के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देश पर अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन ने फरवरी 1989 में 470 मिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 3,000 करोड़ रुपए) का मुआवजा जमा किया.

रकम पीड़ितों को इंसाफ दिलाने के लिए थी. लेकिन, असल बंटवारा नवंबर 1992 में शुरू हुआ. शुरू में ये “ओरिजिनल मुआवजा” कहलाया, जो घायलों, मृतकों के परिवारों और बीमार लोगों को दिया गया. कुल 5,74,394 क्लेम दाखिल हुए थे. 31 जुलाई 2024 तक 5,73,959 क्लेम स्वीकृत किए गए और कुल 1,549.33 करोड़ रुपए बांटे. यानी लगभग हर क्लेम को औसतन 27,000 रुपए मिले.

राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस पर सवाल

सवाल है कि क्या पैसे जिंदगियां लौटा सकते हैं? राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस हमें चेतावनी देता है कि प्रदूषण सिर्फ हवा-पानी का नहीं, बल्कि सभ्यता का भी दुश्मन है. आज ग्लेशियर पिघल रहे हैं, नदियां सूख रही हैं, दिल्ली का प्रदूषण सांस का दुश्मन बन चुका है. इस स्थिति में राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस का महत्व और भी बढ़ जाता है.

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जागरूकता फैलाने का मंच

भोपाल की त्रासदी (Bhopal Gas Tragedy) को दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक प्रदूषण आपदा मानते हुए, यह दिन जागरूकता फैलाने का मंच है. पर्यावरण सुरक्षा को मानव, प्रकृति और समाज के लिए अनिवार्य बताते हुए, यह प्रदूषण के कारकों जैसे फैक्ट्री उत्सर्जन, वाहन धुआं, प्लास्टिक कचरा और नियंत्रण के उपायों जैसे पौधरोपण, रिसाइक्लिंग, साफ ऊर्जा पर जोर देता है.

नोट- यह खबर एजेंसी (IANS) फीड से सीधे पब्लिश की गई है. इसमें किसी भी जानकारी को नहीं बदला गया है. खबर को पढ़ने लायाक बनाने के लिए लिए केवल हेडलाइन बदली गई है. वहीं पैराग्राफ से पहले सबहेड जोड़े गए हैं. इस स्टोरी को लेकर भारत एक्सप्रेस की किसी भी तरह की नैतिक जिम्मेदारी नहीं होगी.

Shyamdatt Chaturvedi

श्यामदत्त चतुर्वेदी एक अनुभवी मीडिया पेशेवर हैं. वर्तमान में नोएडा 'भारत एक्सप्रेस' में पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं. मीडिया और पत्रकारिता के क्षेत्र में सात वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले श्यामदत्त ने हिंदी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए कंटेंट राइटिंग, रिपोर्टिंग, एडिटिंग और डेटा एनालिसिस में गहरी विशेषज्ञता हासिल की है. इससे पहले उन्होंने जी न्यूज, ईटीवी भारत, टीएफआई मीडिया, वे2न्यूज और सैफायर मीडिया लिमिटेड (इंडिया डेली लाइव) जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं. उन्होंने स्थानीय पंचायत से लेकर विधानसभा, लोकसभा तक की व्यापक कवरेज की. उन्होंने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय (IGNTU), अमरकंटक से पत्रकारिता और जनसंचार में स्नातक (BJMC) करने के बाद, प्रतिष्ठित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में मास्टर डिग्री (M.A.) हासिल की है.

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