Bankipur By Election: बिहार की सियासत में जब भी पटना के राजनीतिक गढ़ की बात होती है, तो बांकीपुर विधानसभा सीट का नाम सबसे ऊपर आता है. इसे सूबे की ‘विद्वानों और वीआईपी’ वाली हाई-प्रोफाइल सीट माना जाता है, जहां की हार-जीत सीधे तौर पर पूरे राज्य के सियासी मूड को तय करती है. लंबे समय से इस सीट पर टिकी राजनीतिक ललक और अटकलों पर विराम लगाते हुए देश के निर्वाचन आयोग (Election Commission) ने आखिरकार चुनावी रणभेरी फूंक दी है.
चुनाव आयोग द्वारा आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी किए जाने के साथ ही बांकीपुर में ‘जंग’ की तारीख मुकर्रर हो चुकी है. आइए विस्तार से जानते हैं कि बांकीपुर का चुनावी शेड्यूल क्या है, इस सीट का गौरवशाली इतिहास क्या है और यहाँ दावा ठोकने वाले दिग्गजों की रणनीति क्या रहने वाली है.
बांकीपुर सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि पटना का वो हृदय स्थल है जहां राजनेता, नौकरशाह, छात्र और प्रबुद्ध वर्ग मिलकर सरकार की नीतियां तय करते हैं. पटना साहिब लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली यह सीट पारंपरिक रूप से बेहद जागरूक और शहरी मतदाताओं के लिए जानी जाती है. इस सीट पर जातिगत समीकरणों से ज्यादा उम्मीदवारों की साख, विकास और वैचारिक विमर्श हावी रहता है.
इस सीट को जीतने का मतलब होता है राजधानी पटना के दिल पर राज करना. यही वजह है कि मुख्य चुनाव भले ही दूर हों, लेकिन इस अकेले उपचुनाव को जीतने के लिए सत्ताधारी गठबंधन (NDA) और मुख्य विपक्षी खेमा (महागठबंधन) अपनी पूरी सांगठनिक ताकत झोंकने के लिए तैयार बैठे हैं.
बांकीपुर की इस ‘जंग’ की तारीख आते ही पटना से लेकर दिल्ली तक टिकटार्थियों और दावेदारों की फेहरिस्त लंबी हो चुकी है. कूटनीतिक गलियारों में चल रही चर्चा के अनुसार, दोनों मुख्य धड़े इस सीट के लिए अपनी खास बिसात बिछा रहे हैं.
सत्ताधारी खेमे का दांव: एनडीए (NDA) इस सीट को अपने ‘अभेद्य किले’ के रूप में देखती रही है. उनकी रणनीति शहरी वोटर्स, युवाओं और महिला मतदाताओं को साइलेंट विनर बनाने की है. यहाँ विकास कार्यों और डबल इंजन सरकार के दावों के सहारे एक बार फिर परचम लहराने की तैयारी है.
विपक्ष का पलटवार: दूसरी तरफ, विपक्षी गठबंधन सरकार की नीतियों और स्थानीय शहरी समस्याओं को मुद्दा बनाकर एंटी-इंकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) को भुनाने की ताक में है. विपक्ष की कोशिश है कि एक ऐसा युवा और पढ़ा-लिखा चेहरा उतारा जाए जो बांकीपुर के प्रबुद्ध वर्ग को सीधे प्रभावित कर सके.
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30 जुलाई को होने वाली यह वोटिंग केवल एक विधायक का चुनाव नहीं करेगी, बल्कि आने वाले समय में बिहार की भावी राजनीति की दिशा और दशा का भी बड़ा संकेत देगी. अब देखना दिलचस्प होगा कि 13 जुलाई तक कौन-कौन से कद्दावर चेहरे नामांकन दाखिल कर इस महा-मुकाबले को त्रिकोणीय या आमने-सामने की लड़ाई में तब्दील करते हैं.
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