क्या भारत की अगली फूड क्राइसिस मिट्टी से शुरू होगी?
Fertilizer Shortage In India: अक्टूबर का महीना है और खेतों में रबी की फसलों की बुवाई शुरू हो रही है. किसान गेहूं, सरसों और चने की खेती की तैयारी में जुटे हैं. ऐसे में खाद की मांग भी बढ़ रही है. गांवों में किसान यूरिया और डीएपी की बोरियां खरीद रहे हैं. यूरिया की 45 किलो की बोरी सरकारी दर पर करीब 242 रुपये में मिलती है, जबकि डीएपी की 50 किलो की बोरी के लिए 1,350 रुपये देने पड़ते हैं. लेकिन इन बोरियों की कहानी सिर्फ खेतों और दुकानों तक सीमित नहीं है. इसका संबंध हजारों किलोमीटर दूर समुद्र में चल रहे तनाव से भी है.
ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच फरवरी 2026 में शुरू हुए टकराव के बाद होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही को लेकर चिंता बढ़ी है. यह समुद्री रास्ता दुनिया के खाद कारोबार के लिए अहम है. दुनिया में खाद की सप्लाई का करीब एक-तिहाई हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है. भारत भी अपनी जरूरत की बड़ी मात्रा में खाद विदेशों से मंगाता है. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर होर्मुज स्ट्रेट पर तनाव बढ़ा, तो क्या भारतीय किसानों को खाद की कमी का सामना करना पड़ेगा?
सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, फिलहाल देश में खाद की कमी नहीं है. 31 जुलाई को लोकसभा में रसायन और उर्वरक मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने बताया था कि खरीफ सीजन में 1 अप्रैल से 27 जुलाई के बीच यूरिया की उपलब्धता 174 लाख टन रही, जबकि जरूरत 120 लाख टन थी. इसी अवधि में डीएपी की उपलब्धता 42 लाख टन रही, जबकि जरूरत करीब 35 लाख टन थी.
27 जुलाई तक देश के गोदामों में करीब 65 लाख टन यूरिया, 16.5 लाख टन डीएपी, 8.5 लाख टन पोटाश और 44.5 लाख टन एनपीके का भंडार था. यानी फिलहाल खाद की उपलब्धता जरूरत से ज्यादा है. लेकिन असली चिंता यह है कि इस भंडार को बनाए रखने के लिए भारत को विदेशों पर कितना निर्भर रहना पड़ता है.
पौधों की अच्छी बढ़त और पैदावार के लिए नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश जरूरी हैं. यूरिया से पौधों को नाइट्रोजन मिलती है. डीएपी मुख्य रूप से फॉस्फोरस और कुछ नाइट्रोजन देता है, जबकि पोटाश पौधों की सेहत और फसल की गुणवत्ता में मदद करता है. एनपीके में ये तीनों (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश) होते हैं.
भारत में खाद बनाने की फैक्ट्रियां हैं, लेकिन खाद बनाने के लिए जरूरी कच्चा माल भी चाहिए. यूरिया बनाने में प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल होता है. वहीं, डीएपी बनाने के लिए फॉस्फेट, फॉस्फोरिक एसिड, अमोनिया और सल्फर की जरूरत पड़ती है. इनमें से कई चीजें भारत को दूसरे देशों से खरीदनी पड़ती हैं.
आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने करीब 103.5 लाख टन यूरिया आयात किया, जबकि इससे पिछले साल यह मात्रा 56.47 लाख टन थी. यानी यूरिया के आयात में करीब 83 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. पूरे साल में डीएपी का आयात भी करीब 62 लाख टन रहा.
अप्रैल से जनवरी के बीच भारत में करीब 33.71 लाख टन डीएपी का उत्पादन हुआ, जबकि विदेशों से करीब 60.16 लाख टन डीएपी मंगाया गया. यानी देश में जितना डीएपी बना, उससे करीब दोगुना विदेशों से आया.
सरकार ने घरेलू उत्पादन बढ़ाने की कोशिश की है. 2024-25 में देश में 306 लाख टन से ज्यादा यूरिया का उत्पादन हुआ, जो 2013-14 के मुकाबले करीब 35 फीसदी अधिक था. इसके बावजूद बढ़ती खपत के कारण आयात पर निर्भरता बनी हुई है. इसी वजह से सरकार दूसरे देशों के साथ लंबे समय के समझौते भी कर रही है. सऊदी अरब के साथ पांच साल तक हर साल करीब 31 लाख टन डीएपी की सप्लाई का समझौता इसका एक उदाहरण है.
होर्मुज स्ट्रेट में तनाव बढ़ने का असर भारत तक दो रास्तों से पहुंच सकता है. पहला- जहाजों की आवाजाही और दूसरा- खाद बनाने के लिए जरूरी गैस की सप्लाई.
जहाजों के रास्ते में परेशानी आने पर खाद और कच्चा माल पहुंचने में देरी हो सकती है. साथ ही जहाजों का बीमा और माल ढुलाई भी महंगी हो सकती है. दूसरी तरफ भारत के खाद कारखानों को प्राकृतिक गैस की जरूरत होती है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, खाद कारखानों के लिए जरूरी एलएनजी गैस का करीब 86 फीसदी हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है.
सरकार ने भी माना था कि कुछ समय के लिए खाद कारखानों को मिलने वाली गैस की सप्लाई घटकर करीब 65 फीसदी रह गई थी. हालांकि, जुलाई में केंद्र सरकार ने बताया कि गैस की सप्लाई पूरी तरह बहाल हो गई है और यूरिया बनाने वाले सभी कारखाने पूरी क्षमता से काम कर रहे हैं. इसी दौरान खाद और कच्चा माल लेकर 15 जहाज होर्मुज स्ट्रेट पार करके भारत के बंदरगाहों की ओर आए थे.
अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद महंगी होने के बावजूद सरकार ने किसानों पर इसका सीधा बोझ नहीं पड़ने दिया. अप्रैल में केंद्र सरकार ने खरीफ 2026 के लिए डीएपी जैसी खादों पर 41,534 करोड़ रुपये की सब्सिडी मंजूर की. इसका मकसद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने के बावजूद डीएपी की बोरी 1,350 रुपये में उपलब्ध कराना था.
यानी खाद की कीमत बढ़ने का बोझ किसानों के बजाय सरकारी खजाने पर पड़ा. एक रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने 2026-27 के लिए खाद सब्सिडी का अनुमान 1.71 लाख करोड़ रुपये रखा है. पिछले साल इसका अनुमान 1.86 लाख करोड़ रुपये था.
इससे फिलहाल किसानों को राहत मिल रही है, लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो खाद की सप्लाई और सरकारी खर्च दोनों पर दबाव बढ़ सकता है.
खाद की सप्लाई के साथ एक दूसरी बड़ी चिंता भी जुड़ी है. वह है खेतों की मिट्टी की सेहत. हरित क्रांति के दौरान रासायनिक खाद के इस्तेमाल ने भारत में अनाज का उत्पादन बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई. लेकिन जरूरत से ज्यादा और असंतुलित खाद का इस्तेमाल मिट्टी के लिए नुकसानदायक हो सकता है.
खेती के जानकारों के मुताबिक, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश का इस्तेमाल आम तौर पर 4:2:1 के अनुपात में सही माना जाता है. लेकिन इंटरनेशनल काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (ICRIER) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2024-25 तक भारत में खाद के इस्तेमाल का अनुपात बिगड़कर 10.9:4.4:1 हो गया था. यानी एक हिस्सा पोटाश के मुकाबले करीब 11 हिस्से नाइट्रोजन का इस्तेमाल हो रहा था.
इसकी एक बड़ी वजह खाद की कीमतों में अंतर है. यूरिया पर करीब 85 से 90 फीसदी तक सब्सिडी है, जबकि फॉस्फोरस वाली खादों पर यह करीब 45 फीसदी बताई जाती है. यूरिया सस्ता मिलने के कारण किसान इसका ज्यादा इस्तेमाल करते हैं.
लगातार असंतुलित खाद डालने से मिट्टी की सेहत प्रभावित हो सकती है. इससे आगे चलकर फसल की पैदावार और मिट्टी की क्षमता पर असर पड़ने का खतरा रहता है. मिट्टी कमजोर होने पर किसान को ज्यादा खाद की जरूरत पड़ सकती है. इससे विदेशों से खाद मंगाने और सरकार पर सब्सिडी का खर्च बढ़ने का दबाव भी बढ़ सकता है.
खाद के ज्यादा इस्तेमाल की समस्या का समाधान खोजने के लिए पूरी तरह जैविक खेती का विकल्प भी सामने आता है. लेकिन इसके लिए जल्दबाजी में फैसला लेना नुकसानदायक हो सकता है.
श्रीलंका ने अप्रैल 2021 में रासायनिक खाद और कीटनाशकों के आयात पर पूरी तरह रोक लगा दी थी. सरकार ने देश को जैविक खेती की ओर ले जाने का फैसला किया. लेकिन पर्याप्त मात्रा में जैविक खाद उपलब्ध नहीं होने के कारण करीब सात महीने बाद ही नवंबर 2021 में इस रोक को आंशिक रूप से हटाना पड़ा. बाद के रिपोर्टों में यह बताया गया कि सरकार के इस फैसले से देश में धान की पैदावार में 20 से 40 फीसदी तक गिरावट दर्ज की गई.
दूसरी तरफ भारत के सिक्किम राज्य को 2016 में पूरी तरह जैविक घोषित किया गया था. लेकिन सिक्किम एक छोटा और पहाड़ी राज्य है. पूरे भारत में एक साथ यही तरीका अपनाना आसान नहीं है, क्योंकि देश के कई राज्यों में गेहूं और धान की बड़े पैमाने पर खेती होती है.
विशेषज्ञों के मुताबिक, खाद का इस्तेमाल कम करने के बजाय जरूरत के हिसाब से और सही तरीके से करना जरूरी है. इसके लिए सबसे पहले खेत की मिट्टी की जांच होनी चाहिए. इससे पता चलता है कि मिट्टी में किन पोषक तत्वों की कमी है और किस खाद की कितनी जरूरत है.
दूसरा तरीका संतुलित खाद का इस्तेमाल है. किसानों को सिर्फ यूरिया पर निर्भर रहने के बजाय जरूरत के हिसाब से फॉस्फोरस और पोटाश का भी इस्तेमाल करना चाहिए.
इसके अलावा हरी खाद भी मददगार हो सकती है. ढैंचा ऐसा पौधा है, जिसे धान की बुवाई से पहले खेत में उगाकर मिट्टी में मिला दिया जाता है. खाद्य और कृषि संगठन (FAO) की गाइडलाइन के मुताबिक, इससे मिट्टी में प्रति हेक्टेयर 50 से 60 किलो तक नाइट्रोजन जुड़ सकती है. कई खेत परीक्षणों में इससे धान की फसल में रासायनिक नाइट्रोजन की जरूरत करीब एक-चौथाई तक कम होने की बात सामने आई है.
सरकार नैनो यूरिया और नैनो डीएपी जैसी तरल खादों को भी बढ़ावा दे रही है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 के बीच करीब पौने दो करोड़ बोतल नैनो यूरिया और डेढ़ करोड़ के करीब बोतल नैनो डीएपी बिकीं. हालांकि, इनके इस्तेमाल से पारंपरिक खाद की बोरियों की जरूरत कितनी कम हो रही है, यह अब भी अहम सवाल है. कुछ कृषि विश्वविद्यालयों के अध्ययनों में नैनो यूरिया से मिलने वाले नाइट्रोजन की मात्रा को लेकर सवाल उठाए गए हैं.
खाद के ज्यादा इस्तेमाल के लिए केवल किसानों को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा. यूरिया की 45 किलो की बोरी करीब 242 रुपये में मिलती है, जबकि डीएपी की 50 किलो की बोरी के लिए 1,350 रुपये देने पड़ते हैं. ऐसे में किसान के सामने सस्ती खाद का इस्तेमाल करने और फसल की पैदावार बनाए रखने की चुनौती रहती है.
अगर किसान खाद कम डालता है और पैदावार घट जाती है, तो नुकसान उसे ही उठाना पड़ता है. इसलिए खाद का इस्तेमाल कम करने की सलाह देने के साथ किसानों को सही जानकारी, नई तकनीक, बाजार तक पहुंच और आमदनी की सुरक्षा देना भी जरूरी है.
इसके साथ ही भारत को खाद के लिए किसी एक देश या समुद्री रास्ते पर निर्भरता कम करनी होगी. अंतरराष्ट्रीय संकट के समय खाद बेचने वाले देश अपने घरेलू किसानों की जरूरत को प्राथमिकता दे सकते हैं. इसलिए आयात के लिए कई देशों से समझौते करना, अलग-अलग रास्तों से सप्लाई सुनिश्चित करना और देश में उत्पादन बढ़ाना जरूरी है.
सरकार के मुताबिक नई निवेश नीति 2012 के तहत देश में छह नए यूरिया संयंत्र लगाए गए हैं और कुछ दूसरी परियोजनाओं पर भी काम चल रहा है. इसके बावजूद फॉस्फेट और पोटाश जैसे कच्चे माल के लिए भारत को दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता है.
होर्मुज स्ट्रेट में तनाव के कारण भारत में खाद की सप्लाई को लेकर चिंता जरूर है, लेकिन फिलहाल सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में खाद का पर्याप्त भंडार मौजूद है. असली चुनौती यह है कि भविष्य में भी किसानों को समय पर और सही कीमत पर खाद मिलती रहे.
इसके लिए घरेलू उत्पादन बढ़ाने, आयात के विकल्प तैयार करने और खाद की सब्सिडी का बोझ संभालने के साथ मिट्टी की सेहत पर भी ध्यान देना होगा. हरित क्रांति के समय भारत के सामने ज्यादा अनाज उगाने की चुनौती थी. अब जरूरत इस बात की है कि कम खाद और कम पानी में बेहतर पैदावार कैसे हासिल की जाए.
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क्योंकि खाद से फसल को पोषण मिलता है, लेकिन खेती की असली ताकत स्वस्थ मिट्टी है. मिट्टी बचेगी, तो खेत बचेगा. खेत बचेगा, तो किसान बचेगा और किसान बचेगा, तभी हमारी थाली भी सुरक्षित रहेगी.
-भारत एक्सप्रेस
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