प्रतीकात्मक तस्वीर.
गुलाबी नगरी जयपुर… जहां हर हवेली, हर गढ़ी और दीवारें अपने भीतर सदियों का गढ़ा हुआ इतिहास समेटे बैठी हैं. लेकिन इस बार शहर के प्रसिद्ध त्रिपोलिया बाजार में खड़ी एक पुश्तैनी हवेली किसी स्थापत्य कला के लिए नहीं, बल्कि मलबे के नीचे दबे कथित ‘करोड़ों के शाही खजाने’ को लेकर अचानक टॉक ऑफ द टाउन बन गई है.
दावा है कि जर्जर हो चुकी इस सदियों पुरानी हवेली की नींव जब खोदी जा रही थी, तब जमींदोज मुहाने से सोने के सिक्कों से भरे चमचमाते कलश, भारी-भरकम चांदी की सिल्लियां और रजवाड़ों के जमाने के हजारों सिक्के बाहर निकले. हालांकि, यह अनमोल दौलत इसके असली मालिक तक पहुंच पाती, उससे पहले ही एक खौफनाक साजिश का शिकार हो गई.
पूरे रहस्य का खुलासा तब हुआ जब हवेली के जीर्णोद्धार का काम कर रहे एक मजदूर ने सामने आकर खजाने का राज उगल दिया. हवेली मालिक राहुल सेठी के मुताबिक, करीब छह महीने पहले उन्होंने अपनी जर्जर हवेली को गिराकर नया निर्माण कराने के लिए एक निजी कंपनी को ठेका दिया था. अनुबंध में साफ था कि यदि जमीन के नीचे से कोई ऐतिहासिक या कीमती वस्तु निकलती है, तो उस पर पहला और एकमात्र हक सेठी परिवार का होगा.
लेकिन नीयत तब डोली जब जमींदोज तिजोरी से बेशकीमती खजाना बाहर आया. आरोप है कि ठेकेदार महेश मल्होत्रा उर्फ छोटू और उसके साथियों ने खजाना मालिक से छुपाकर आपस में बांट लिया. मजदूर का आरोप है कि उसे मुंह बंद रखने और राज छुपाने के बदले 150 सोने-चांदी के सिक्के देने की डील की गई थी. जब ठेकेदार वादे से मुकर गया, तो गुस्साए मजदूर ने हवेली मालिक के पास जाकर पूरे काले सच का खुलासा कर दिया.
एफआईआर में दावा किया गया है कि हवेली के मलबे के नीचे से:
शिकायतकर्ता का यह भी कहना है कि उसके पास ऐसे कुछ एक्सक्लूसिव ऑडियो और वीडियो क्लिप्स मौजूद हैं, जिनमें आरोपी खजाने की आपस में बंदरबांट और बंटवारे पर चर्चा कर रहे हैं. फिलहाल माणक चौक थाना पुलिस अधिकारी राकेश ख्यालिया के नेतृत्व में पुलिस की टीम वीडियो सबूतों की जांच कर ठेकेदार और उसके सहयोगियों से सख्ती से पूछताछ कर रही है.
राजस्थान का इतिहास हमेशा से छिपे हुए गुप्त खजानों की रहस्यमयी लोककथाओं से भरा रहा है. यह पहला मौका नहीं है जब जयपुर या राजस्थान में शाही खजाने की गूंज ने सरकार और खुफिया एजेंसियों की नींद उड़ाई हो.
राजस्थान में खजाने की सबसे चर्चित कहानी आपातकाल (1976) के दौरान की है. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दौर में सेना ने जयपुर के जयगढ़ किले में एक विशाल गुप्त खजाने की खोज के लिए 5 महीने से अधिक समय तक अब तक का सबसे बड़ा तलाशी अभियान चलाया था. कहा जाता है कि मानसिंह प्रथम जो आमेर के राजा थे, वे अफगानिस्तान (काबुल) विजय के बाद अपार धन-दौलत लाए थे और उसे जयगढ़ के गुप्त तलों में छिपाया गया था. हालांकि, हफ्तों चली खुदाई के बाद सरकार ने आधिकारिक तौर पर सिर्फ पानी के टांके ही मिलने का दावा किया था, लेकिन यह ऑपरेशन आज भी देश की सबसे बड़ी पहेलियों में शुमार है.
इसके अलावा, नागौर, चित्तौड़गढ़, जैसलमेर और शेखावाटी की पुरानी हवेलियों और गढ़-किलों की ढहती दीवारों से समय-समय पर गुप्त कलश और धातु के सिक्के मिलने की घटनाएं सामने आती रही हैं.
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