Justice BR Gavai Vision: ‘आइडियाज फॉर इंडिया समिट 2025’ में बोलते हुए भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई ने भारतीय न्याय व्यवस्था के अतीत, वर्तमान और भविष्य का एक व्यापक तथा दूरदर्शी खाका पेश किया. उन्होंने कहा कि भारतीय न्यायपालिका महज एक संस्थागत ढांचा नहीं, बल्कि नागरिकों की उम्मीदों, संघर्षों और समानता की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब है. अपने संबोधन के दौरान उन्होंने भारतीय न्याय व्यवस्था की नींव, चुनौतियों और भविष्य की दिशा पर एक दूरदर्शी खाका प्रस्तुत किया.
जस्टिस गवई ने याद दिलाया कि 1950 में आठ न्यायाधीशों से शुरू हुई सुप्रीम कोर्ट आज 34 जजों, 25 हाई कोर्ट और करीब 700 ज़िला न्यायालयों की नेटवर्क वाली प्रणाली बन चुकी है. जो साफ दिखाता है कि देश की न्यायिक संरचना जनता की बढ़ती आवश्यकताओं के साथ विकसित हुई है.
अपने संबोधन में उन्होंने भारतीय संविधान की उस मूल भावना पर ज़ोर दिया, जिसमें न्याय को केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन की अनिवार्य शर्त बताया गया है. उन्होंने कहा कि असमानताओं (चाहे वह जाति हो, लिंग हो या सामाजिक-आर्थिक विषमता) ने न्याय-प्रणाली को चुनौती भी दी है और उसे विकसित होने के लिए मजबूर भी किया है. यही वजह है कि भारतीय न्याय व्यवस्था कोई विदेशी प्रतिरूप नहीं, बल्कि भारतीय समाज की वास्तविकताओं से निर्मित मॉडल है.
जस्टिस गवई ने इसके बाद देश की न्याय प्रणाली में मौजूद पुरानी और उपनिवेशकालीन जड़ों पर कड़ा सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि आज भी कई हाई कोर्ट में ऐसी सर्विस रूल्स मौजूद हैं जिनमें ‘हलालखोर’ और ‘जमादार’ जैसे जाति-आधारित, अप्रासंगिक और अपमानजनक पदनाम मिलते हैं. यह एक आधुनिक संवैधानिक लोकतंत्र में अस्वीकार्य हैं. उन्होंने इसे तत्काल समाप्त करने की आवश्यकता बताई और कहा कि भारत की न्याय प्रणाली को लोकतांत्रिक न्याय के बजाय उपनिवेशी शासन के ढांचे ने अधिक प्रभावित किया है. इसे अब निर्णायक रूप से बदलना ही होगा.
तकनीक को न्याय प्रणाली का भविष्य बताते हुए उन्होंने चेतावनी भी दी कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस न्याय की गति बढ़ा सकता है. अगर इसे बिना संवैधानिक नैतिकता के लागू किया गया, तो वही पूर्वाग्रह और भेदभाव बढ़ सकते हैं जिन्हें खत्म करने के लिए न्याय तंत्र बना है. उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी ‘AI and Judiciary’ श्वेतपत्र तकनीक के अवसरों के साथ जोखिमों को भी विस्तार से सामने रखता है.
जस्टिस गवई ने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत को 2047 तक ऐसी न्यायिक संरचना की आवश्यकता है जिसमें अधिक न्यायाधीश, अधिक कोर्टरूम, बेहतर डिजिटल ढांचा, वैज्ञानिक जांच, आधुनिक फोरेंसिक लैब, मजबूत अभियोजन तंत्र और सुदृढ़ कानूनी सहायता प्रणाली शामिल हों. उनके अनुसार यदि पूरक संस्थाएं कमजोर रहीं, तो सर्वोत्तम न्यायिक सुधार भी पूरा असर नहीं दिखा पाएंगे.
अपने संबोधन में उन्होंने पर्वतीय, जनजातीय और दूरस्थ क्षेत्रों में न्याय तक पहुंच को भारत की सबसे बड़ी चुनौती बताया और कहा कि मोबाइल कोर्ट, क्षेत्रीय हाई कोर्ट बेंच और डिजिटल सुविधाओं का विस्तार ही इसे हल कर सकता है. साथ ही उन्होंने कोर्ट प्रशासन में तकनीकी विशेषज्ञों, डाटा विश्लेषकों, पब्लिक पॉलिसी विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की अनिवार्य भागीदारी पर भी जोर दिया. ताकि जज अपने मूल कार्य यानी न्याय देने पर केंद्रित रह सकें.
सत्र के अंत में उन्होंने अपने दो महत्वपूर्ण निर्णयों ‘डिमोलिशन केस’ और SC Sub-Categorisation Creamy Layer फैसले का उल्लेख करते हुए न्याय प्रणाली की संवैधानिक जिम्मेदारियों को रेखांकित किया. पहले मामले में उन्होंने कहा कि कोई भी सरकार केवल आरोप या सजा के आधार पर किसी का घर नहीं ढहा सकती. क्योंकि आश्रय का अधिकार पूरे परिवार का मौलिक अधिकार है. दूसरे निर्णय में उन्होंने स्पष्ट कहा कि अनुसूचित जातियों में भी ‘क्रीमी लेयर’ लागू होनी चाहिए, ताकि आरक्षण का लाभ समाज के सबसे पिछड़े तबकों तक पहुंच सके.
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जस्टिस बीआर गवई का यह संबोधन भारत के न्याय तंत्र के भविष्य को लेकर एक स्पष्ट, ईमानदार और साहसिक दृष्टि प्रस्तुत करता है. जहां आधुनिकता, तकनीक, सामाजिक न्याय और उपनिवेश-मुक्त ढांचे का संतुलित मेल हो. उनका संदेश साफ है. 2047 का भारत तभी न्यायपूर्ण होगा, जब न्याय सिर्फ तेज़ नहीं बल्कि समान, सुलभ और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित होगा. यह भाषण नीति-निर्माताओं, न्यायपालिका और समाज सभी के लिए एक रोडमैप की तरह है.
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