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‘एक कॉन्फ्रेंस से बदलाव संभव नहीं होगा, इसके लिए बुनियादी ढांचे की ज़रूरत’-ओडिशा मीडिएशन कॉन्फ्रेंस पर बोलें CJI बीआर गवई

2nd National Mediation Conference: भुवनेश्वर में शनिवार को शुरू हुए दूसरे नेशनल मीडिएशन कॉन्फ्रेंस का भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.आर. गवई ने उद्घाटन किया. इस मौके पर ओडिशा के राज्यपाल डॉ. हरी बाबू कंभंपति, मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान समेत सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के कई न्यायाधीश मौजूद रहे.

चीफ जस्टिस बीआर गवई ने अपने उद्घाटन संबोधन में कहा कि ‘मीडिएशन आज न्याय व्यवस्था का तेजी से उभरता हुआ स्तंभ है, जिसे 2023 के मीडिएशन एक्ट के जरिए औपचारिक रूप से संस्थागत पहचान मिली है.’

उन्होंने याद दिलाया कि यह व्यवस्था उस दौर में जन्मी, जब अदालतों में मामलों का बोझ, लंबे इंतज़ार और टकराव भरे मुकदमों ने न्याय की राह कठिन बना दी थी.

CJI बीआर गवई ने समझाया कि मुकदमेबाज़ी जहां जीत-हार पर आधारित होती है, वहीं मीडिएशन आपसी संवाद, समझ और सहयोग पर टिकी है. इसमें पक्षकार खुद प्रक्रिया और नतीजे पर नियंत्रण रखते हैं. यही कारण है कि यह न सिर्फ तेज़ और लचीला है, बल्कि गोपनीय और कम खर्चीला भी है.

नई व्यवस्था की चुनौतियां और ज़रूरी संतुलन

CJI बीआर गवई ने यह भी माना कि हर नई व्यवस्था की तरह मीडिएशन के सामने भी कई चुनौतियां हैं चाहे कानूनी ढांचे में खामियाँ हों या संस्थागत स्तर पर कमी. उन्होंने कहा, ‘हमें पारंपरिक न्याय प्रणाली और आर्बिट्रेशन से सीख लेनी होगी कि कानून बनाने, संस्थान खड़े करने और उसे ज़मीन पर उतारने के बीच संतुलन बेहद ज़रूरी है.’

भारत के चीफ जस्टिस ने ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए कहा कि भारत की आज़ादी की लड़ाई में भी कई वैचारिक मतभेद संवाद और बातचीत के जरिए सुलझाए गए. उन्होंने कहा कि गांधी, नेहरू और अन्य नेताओं ने कई बार धैर्यपूर्ण बातचीत और सहमति बनाकर राह निकाली. यह बताता है कि संवाद और मध्यस्थता हमारी सामाजिक-राजनीतिक परंपरा में गहरे से जुड़ी हुई है.

कॉन्फ्रेंस का एजेंडा

दो दिन तक चलने वाले इस सम्मेलन में इन विषयों पर चर्चा हो रही है—

  • मीडिएशन एक्ट 2023 का क्रियान्वयन और न्याय तक पहुंच आसान बनाने की पहल.
  • क्षेत्रवार मध्यस्थता जैसे स्वास्थ्य, पर्यावरण, कॉर्पोरेट गवर्नेंस और रेस्टोरेटिव जस्टिस.
  • सरकारी मुकदमों में मीडिएशन ताकि नीति-निर्माण और जनहित के मामलों में विवाद कम हों.
  • वाणिज्यिक अदालतों में प्री-लिटिगेशन मीडिएशन और ऑनलाइन-हाइब्रिड मॉडल.
  • संस्थागत ढांचे और मानक मीडिएशन काउंसिल, मान्यता, प्रशिक्षण और पारदर्शिता.

न्यायमूर्ति गवई ने जोर देकर कहा कि मीडिएशन को केवल कानूनी पेशे तक सीमित न रखा जाए. उन्होंने याद दिलाया कि मीडिएशन एक्ट की धारा 43 समुदाय-स्तरीय विवादों को आपसी सहमति से सुलझाने की इजाज़त देती है. इससे मोहल्लों और गाँवों में भी लोग अपने मतभेद शांति से निपटा सकते हैं.

उन्होंने सुझाव दिया कि नालसा (NALSA) द्वारा तैयार किया गया 40 घंटे का ट्रेनिंग मॉड्यूल साधारण नागरिकों के लिए भी सरल भाषा में उपलब्ध कराया जाए और इसे विभिन्न भारतीय भाषाओं में पेश किया जाए. उनका मानना है कि ‘अगर आम लोग संवाद और बातचीत की तकनीक सीख जाएँ, तो सामाजिक और पारिवारिक विवाद अदालतों तक जाने से पहले ही सुलझ सकते हैं.’

‘झगड़ा नहीं, संवाद की कमी असली समस्या’: बी.आर. गवई

चीफ जस्टिस बी.आर. गवई ने यह भी साफ कहा कि केवल कानून या एक कॉन्फ्रेंस से बदलाव संभव नहीं होगा. इसके लिए लगातार अभ्यास, सामाजिक स्वीकृति और बुनियादी ढांचे की ज़रूरत है. सबसे अहम है कि न्यायाधीश, वकील, मध्यस्थ और आम नागरिक सभी संवाद को टकराव से ऊपर रखें.

अपने भाषण के अंत में उन्होंने कहा, ‘झगड़ा खुद हमारी शांति नहीं बिगाड़ता, बल्कि सुनने और समझने से इनकार करना असली समस्या है. अगर विवाद को सही तरीके से लिया जाए, तो वही टकराव हमें विकास और समझदारी की ओर ले जा सकता है.’

ये भी पढ़ें:  वरिष्ठ नागरिकों के उपहार में परिवार के प्रति होता है सम्मान: दिल्ली हाईकोर्ट

-भारत एक्सप्रेस 

निहारिका गुप्ता

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