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TMC के 20, UBT के 6… पूरे 366 सांसदों के पीछे का क्या है गणित? विपक्ष में टूट के बाद NDA कर रही मैथमेटिक्ल गेम!

देश की राजनीति में एक बार फिर नए समीकरण बनते दिखाई दे रहे हैं. हाल के दिनों में तृणमूल कांग्रेस (TMC) और शिवसेना (UBT) में हुई बड़ी टूट ने विपक्षी खेमे को झटका दिया है, वहीं इससे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की संसदीय ताकत बढ़ती नजर आ रही है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि मानसून सत्र से ठीक पहले NDA को सांसदों की संख्या बढ़ाने की जरूरत क्यों पड़ रही है? राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इसके पीछे सरकार की नजर उन महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों पर है, जिनके लिए दो-तिहाई बहुमत जरूरी होता है.

TMC में टूट की कहानी

तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 28 साल के इतिहास में पहली बार पार्टी में बड़ी और औपचारिक टूट देखने को मिली (TMC split story). पश्चिम बंगाल के हालिया चुनाव नतीजों के बाद पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष ने बगावत का रूप ले लिया. पार्टी से निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 58 टीएमसी विधायकों ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और अलग गुट बना लिया.

बगावत का असर संसद तक भी पहुंचा. टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसद बागी खेमे में शामिल हो गए. वहीं, राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय समेत कई वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी पदों और संसद से इस्तीफा दे दिया. बागी नेताओं ने दावा किया कि उनका गुट नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय हो गया है. इस घटनाक्रम को टीएमसी के इतिहास की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती माना गया.

शिवसेना (UBT) से 6 लोकसभा सांसद हुए अलग

उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (UBT) को हाल ही में एक बड़ा झटका लगा (Shiv Sena UBT rebellion). पार्टी के 9 लोकसभा सांसदों में से 6 सांसदों ने बगावत कर दी, जिससे यह पार्टी की सबसे बड़ी हालिया टूट बन गई. 17 और 18 जून को पार्टी के भीतर मतभेद खुलकर सामने आए. स्थिति को संभालने के लिए संसदीय दल की बैठक बुलाई गई, लेकिन इसमें 9 में से केवल 3 सांसद ही शामिल हुए. इसके बाद पार्टी में टूट की अटकलें तेज हो गईं.

22 जून 2026 को बागी सांसदों ने बड़ा कदम उठाते हुए उप-मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना का दामन थाम लिया. शिवसेना में शामिल होने वाले सांसदों में संजय जाधव, संजय देशमुख, भाऊसाहेब वाकचौरे, नागेश पाटिल अष्टिकर, ओमराजे निंबालकर और संजय पाटिल शामिल हैं. इस घटनाक्रम को शिवसेना (UBT) के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है, क्योंकि लोकसभा में पार्टी की ताकत काफी कम हो गई है.

DMK ने INDIA गठबंधन से बनाई दूरी

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत नहीं मिलने के बाद राज्य की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम देखने को मिला (DMK INDIA alliance). लंबे समय से DMK की सहयोगी रही कांग्रेस ने सरकार गठन के मुद्दे पर रुख बदलते हुए अभिनेता जोसेफ विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कझगम (TVK) को समर्थन दे दिया, जो चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी.

इस फैसले से DMK नेतृत्व नाराज हो गया. पार्टी प्रमुख एम.के. स्टालिन और उदयनिधि स्टालिन ने कांग्रेस पर “विश्वासघात” और “पीठ में छुरा घोंपने” का आरोप लगाया. उनका कहना है कि कांग्रेस के कई विधायक DMK के सहयोग से चुनाव जीत पाए, लेकिन चुनाव के बाद कांग्रेस ने DMK का साथ छोड़ दिया. कांग्रेस के इस कदम के बाद DMK ने 8 जून 2026 को नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में आयोजित INDIA गठबंधन की महत्वपूर्ण बैठक का बहिष्कार कर दिया.

DMK के इस रुख के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं कि पार्टी INDIA गठबंधन से दूरी बना सकती है. साथ ही यह अटकलें भी लगाई जा रही हैं कि DMK भविष्य में NDA के साथ जाने का फैसला कर सकती है.

NDA का आंकड़े वाला गेम

21 जुलाई से शुरू होने वाले मानसून सत्र से पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) लोकसभा में अपनी संख्या मजबूत करने की कोशिश में जुटा है. माना जा रहा है कि सरकार जल्द ही परिसीमन से जुड़ा कानून संसद में ला सकती है, ताकि महिला आरक्षण को 2029 से लागू करने का रास्ता साफ हो सके.


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इससे पहले अप्रैल में सरकार को सदन में महिला आरक्षण बिल के मुद्दे पर झटका लगा था, क्योंकि संविधान संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत उसके पास नहीं था. किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए लोकसभा में कम से कम 362 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होती है.

राजनीतिक समीकरणों पर नजर डालें तो तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसद, शिवसेना (UBT) छोड़कर एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल हुए 6 सांसद और यदि DMK के 22 सांसद भी महिला आरक्षण से जुड़े विधेयक का समर्थन करते हैं, तो NDA के पक्ष में सांसदों की संख्या 366 तक पहुंच सकती है. ऐसी स्थिति में सरकार के लिए संविधान संशोधन सहित महत्वपूर्ण विधेयकों को संसद से पारित कराना काफी आसान हो सकता है. इसी वजह से मानसून सत्र से पहले इन राजनीतिक घटनाक्रमों पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं.

-भारत एक्सप्रेस

Sahil Singh

पढ़ने-लिखने से शुरू हुआ सफर खबरों तक ले गया. पत्रकारिता को करियर बनाने का एक मात्र उद्देश्य—पढ़ना, साथ ही नई-नई चीज़ों को जानने की जिज्ञासा रखना था. आज से पहले ‘आज तक’ चैनल, उसके बाद दायित्व वेबसाइट, और अब भारत एक्सप्रेस में बतौर सब-एडिटर की भूमिका निभा रहा हूं.

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