Om Birla On No Confidence Motion: संसद के बजट सत्र के दौरान एक ऐतिहासिक और नाटकीय मोड़ आया है. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने आज से सदन की कार्यवाही का संचालन न करने का फैसला किया है. यह निर्णय उन्होंने नैतिकता और संवैधानिक मर्यादाओं के आधार पर लिया है. विपक्ष द्वारा उनके खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के चलते उन्होंने यह कदम उठाया है. अब वे तब तक स्पीकर की कुर्सी पर नजर नहीं आएंगे, जब तक सदन इस प्रस्ताव पर अपना अंतिम फैसला नहीं सुना देता.
सूत्रों के मुताबिक, स्पीकर के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर 9 मार्च को विचार किया जा सकता है. यह तारीख बजट सत्र के दूसरे चरण का पहला दिन होगी. इसी दिन सदन में प्रस्ताव पर चर्चा शुरू होने की संभावना है. दरअसल, विपक्षी दल लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि लोकसभा अध्यक्ष सदन का संचालन निष्पक्ष तरीके से नहीं कर रहे हैं और उनका झुकाव सत्तापक्ष की ओर है. विपक्ष का कहना है कि उन्हें सदन में अपनी बात रखने का पर्याप्त मौका नहीं दिया जा रहा है.
यह सियासी भूचाल तब आया जब मंगलवार को विपक्ष के 118 सांसदों ने एकजुट होकर लोकसभा महासचिव को स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस सौंपा. इस नोटिस पर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके और आरजेडी जैसे प्रमुख दलों के सांसदों के हस्ताक्षर हैं. विपक्ष का सीधा आरोप है कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को सदन में बोलने से रोका गया और विपक्षी सांसदों को मनमाने ढंग से निलंबित किया गया. हालांकि, इस मुहिम में ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी शामिल नहीं हुई है.
स्पीकर को हटाने की राह इतनी आसान नहीं होती. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94(c) के तहत, स्पीकर को हटाने के लिए कम से कम 14 दिन का पूर्व नोटिस देना अनिवार्य होता है. नोटिस स्वीकार होने के बाद, इसे सदन में पेश करने के लिए कम से कम 50 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होती है. एक बार प्रस्ताव स्वीकार हो जाने पर चर्चा और वोटिंग होती है. संविधान के अनुच्छेद 96 के मुताबिक, जब स्पीकर को हटाने का प्रस्ताव विचाराधीन हो, तो वे सदन की अध्यक्षता नहीं कर सकते. ओम बिड़ला का सदन से दूर रहने का फैसला इसी संवैधानिक मर्यादा के अनुरूप है.
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भले ही विपक्ष ने आक्रामक रुख अपनाया हो, लेकिन लोकसभा में आंकड़ों का खेल एनडीए (NDA) के पक्ष में है. सरकार के पास पूर्ण बहुमत है, जिससे इस अविश्वास प्रस्ताव के पारित होने की संभावना बेहद कम है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह प्रस्ताव महज ‘प्रतीकात्मक’ है, जिसका उद्देश्य सरकार को घेरना और जनता के बीच यह संदेश देना है कि विपक्ष की आवाज को संसद में दबाया जा रहा है.
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