सुप्रीम कोर्ट की पवित्र चौखट पर एक 71 वर्षीय वकील द्वारा मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई पर हमले की कोशिश ने देशभर में कोहराम मचा दिया. यह घटना न केवल न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार थी, बल्कि संवैधानिक मूल्यों और सभ्य समाज की नींव को भी चुनौती देती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस निंदनीय कृत्य की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि ऐसी घटनाओं का हमारे समाज में कोई स्थान नहीं हो सकता. उन्होंने मुख्य न्यायाधीश की संयमित प्रतिक्रिया की भी सराहना की, जो न्याय के उच्च आदर्शों को रेखांकित करती है. विपक्षी दलों ने भी एकजुट होकर इसकी भर्त्सना की, लेकिन कुछ ने सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाए.
मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई पर हमले की कोशिश का पता चलने पर पीएम नरेंद्र मोदी ने तत्काल प्रतिक्रिया दी. उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर कहा, “मैंने मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बी.आर. गवई से बात की है. आज सुप्रीम कोर्ट परिसर में उन पर हुआ हमला हर भारतीय को क्रोधित कर रहा है. हमारे समाज में ऐसी निंदनीय घटनाओं के लिए कोई जगह नहीं है. यह पूरी तरह से निंदनीय है. मैं जस्टिस गवई द्वारा ऐसी स्थिति में दिखाई गई शांति की सराहना करता हूं. यह न्याय के मूल्यों और हमारे संविधान की भावना को मजबूत करने की उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है.”
पीएम मोदी का यह बयान न केवल घटना की कड़ी निंदा करता है, बल्कि मुख्य न्यायाधीश की गरिमा और संयम को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित भी करता है. उन्होंने जोर देकर कहा कि सभ्य समाज में हिंसा या अपमान का कोई स्थान नहीं हो सकता, और ऐसी घटनाएं लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करती हैं. यह बयान राजनीतिक नेतृत्व की ओर से न्यायपालिका के प्रति अटूट समर्थन का संदेश देता है, जो वर्तमान सामाजिक तनावों के बीच विशेष रूप से प्रासंगिक है. उनके शब्दों में स्पष्ट संदेश दिया गया– न्यायपालिका पर हमला संविधान पर हमला है, और इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के दौरान एक मामले की सुनवाई हो रही थी. मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की बेंच इस मामले पर विचार कर रही थी, जब 71 वर्षीय अधिवक्ता राकेश किशोर ने अचानक हमलावर जैसा रूख अपनाया. राकेश किशोर ने अदालत की टिप्पणियों को सनातन धर्म का अपमान बताते हुए अपना जूता फेंकने का प्रयास किया. उसने चिल्लाते हुए कहा, “ऐसी अपमानजनक टिप्पणियों को हम बर्दाश्त नहीं करेंगे.”
यह दृश्य देखकर सुप्रीम कोर्ट के हॉल में उपस्थित सभी लोग दंग रह गए. सुरक्षा कर्मियों ने तुरंत उस अधिवक्ता को हिरासत में ले लिया और उसे बाहर ले जाया गया. बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने इस कृत्य को गंभीर अवमानना मानते हुए किशोर को पूरे देश में वकालत करने से निलंबित कर दिया.
एएनआई की रिपोर्ट्स के अनुसार, यह घटना धार्मिक संवेदनशीलताओं से जुड़ी लगती है, जहां किशोर ने अदालत की टिप्पणियों को हिंदू धर्म के प्रति असम्मान के रूप में देखा. ऑनलाइन प्रतिक्रियाओं में भी धार्मिक भावनाओं और जातिगत गतिशीलताओं पर बहस छिड़ गई है, जो समाज में व्याप्त विभाजनों को उजागर करती है. यह घटना सुप्रीम कोर्ट जैसे संवैधानिक मंदिर में अराजकता का प्रतीक बन गई, जहां कानून का राज सर्वोपरि होता है.
विपक्षी दलों ने भी इस घटना की भर्त्सना की, लेकिन कुछ नेताओं ने केंद्र सरकार की भूमिका पर सवाल उठाए. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ट्वीट कर कहा, “मुख्य न्यायाधीश पर हमला हमारे न्यायपालिका की गरिमा और संविधान की भावना पर प्रहार है. ऐसे घृणा का हमारे राष्ट्र में कोई स्थान नहीं है और इस घटना की निंदा की जानी चाहिए.”
प्रियंका गांधी ने हिंदी में ट्वीट किया, “माननीय सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पर हमले की कोशिश अत्यंत शर्मनाक, दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक है. यह सिर्फ देश के मुख्य न्यायाधीश पर नहीं, बल्कि हमारे संविधान, संपूर्ण न्याय व्यवस्था और कानून के शासन पर हमला है. मुख्य न्यायाधीश ने अपनी मेहनत, लगन और योग्यता के दम पर समाज के सारे बंधनों को तोड़कर सर्वोच्च न्यायिक पद हासिल किया है. उन पर इस तरह का हमला न्यायपालिका और लोकतंत्र – दोनों के लिए घातक है. इसकी जितनी निंदा की जाए, कम है.” प्रियंका का बयान मुख्य न्यायाधीश की व्यक्तिगत यात्रा को रेखांकित करता है, जो दलित समुदाय से आते हुए भी शीर्ष पर पहुंचे.
वहीं, पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने ट्वीट किया, “सीजेआई के प्रति सुप्रीम कोर्ट बार के एक मेंबर का असभ्य व्यवहार का सभी द्वारा सार्वजनिक रूप से निंदित किया जाना चाहिए, क्योंकि यह अदालत की महिमा का अपमान है. इस घटना पर पीएम, गृह मंत्री और कानून मंत्री की चुप्पी बहुत चौंकाने वाली है.”
यह प्रतिक्रियाएं दर्शाती हैं कि राजनीतिक दलों के बीच न्यायपालिका के प्रति सम्मान में कोई मतभेद नहीं है, हालांकि सिब्बल जैसे नेताओं ने सरकार की त्वरित कार्रवाई की मांग की.
सोशल मीडिया पर इस घटना ने तीखी बहस छेड़ दी. कुछ यूजर्स ने इसे धार्मिक भावनाओं का उन्माद बताया, जबकि अन्य ने जातिगत पूर्वाग्रहों को जिम्मेदार ठहराया. मुख्य न्यायाधीश गवई, जो दलित पृष्ठभूमि से हैं, ने इस घटना में अपनी शांति बनाए रखी, जो उनके चरित्र की मजबूती को दर्शाती है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना न्यायिक सुरक्षा और बार काउंसिल की भूमिका पर पुनर्विचार की मांग करती है. बार काउंसिल ने त्वरित कार्रवाई की, लेकिन भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सख्त दिशानिर्देश आवश्यक हैं. राजनीतिक नेताओं की एकजुट निंदा सकारात्मक है, लेकिन समाज को धार्मिक और जातिगत संवेदनशीलताओं के बीच संतुलन सिखाना होगा. पीएम मोदी का बयान इस दिशा में एक मजबूत कदम है, जो सभी को न्याय के प्रति प्रतिबद्ध रहने का संदेश देता है.
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