Prashant Kishor 10 Factor For Bankipur: बिहार की राजनीति में दशकों पुराने बने-बनाए ढर्रे और समीकरणों को ध्वस्त करते हुए पटना की हाई-प्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव में जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की है. भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के राज्यसभा जाने से खाली हुई इस सीट पर, जो लंबे समय से भाजपा का अजेय गढ़ मानी जाती थी, प्रशांत किशोर ने भाजपा प्रत्याशी नीरज कुमार सिन्हा को 19,324 वोटों से करारी शिकस्त दी.
इस चुनाव में प्रशांत किशोर को कुल 64,151 वोट मिले, जबकि भाजपा उम्मीदवार को 44,827 वोटों से ही संतोष करना पड़ा. हालांकि यह सिर्फ एक सीट का उपचुनाव था, लेकिन 30 जुलाई को हुए मतदान (35% से कम वोटिंग) के बाद आए इन नतीजों ने पूरी बिहार की राजनीति में नई चर्चा को जन्म दिया है. आइये जानें वो 10 कारण जिनसे प्रशांत किशोर में जीत हासिल की है.
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प्रशांत किशोर ने पारंपरिक बड़ी-बड़ी रैलियों और बड़े नेताओं के भाषणों की जगह ‘हाइपर-लोकल’ रणनीति अपनाई. उन्होंने नुक्कड़ सभाएं, डोर-टू-डोर कैंपेन और 100-150 लोगों की छोटी-छोटी बैठकों पर ध्यान केंद्रित किया. मोहल्लों में चाय की चौपालें चुनी गईं, जहाँ वे आम जनता से सीधे जुड़े, उनकी समस्याओं पर बात की और एक नया संवाद मॉडल खड़ा किया.
प्रशांत किशोर बांकीपुर की जनता को यह समझाने में सफल रहे कि यह चुनाव केवल एक स्थानीय विधायक चुनने का नहीं है, बल्कि यह देश और प्रदेश को यह बताने का माध्यम है कि जनता किस तरह की राजनीति चाहती है. उन्होंने इसे सिर्फ एक बाय-इलेक्शन न बनाकर, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के कार्यकाल और तेजस्वी यादव के नेता प्रतिपक्ष के रोल पर एक ‘प्रतीकात्मक राष्ट्रीय व प्रांतीय जनादेश’ में तब्दील कर दिया.
भाजपा ने शुरुआत में अभिषेक बंटी सिन्हा को टिकट दिया था और उनके समर्थन में प्रचार भी शुरू हो गया था. लेकिन जब यह बात सामने आई कि उनके माता-पिता चारा घोटाले से जुड़े मामले में सजायाफ्ता हैं, तो आनन-फानन में व्यक्तिगत कारणों का हवाला देकर उनका टिकट काट दिया गया और बेहद कम चर्चित नीरज कुमार सिन्हा को प्रत्याशी बनाया गया. चुनाव के बीच उम्मीदवार बदलने और एक हल्के चेहरे को उतारने से पार्टी कैडर व वोटरों के बीच भ्रम फैल गया और विपक्ष को हमलावर होने का मौका मिला.
बांकीपुर कायस्थ बहुल और शिक्षित इलाका है, जहाँ से अजय आलोक जैसे वरिष्ठ नेता भी टिकट की दौड़ में थे. नए चेहरे को मौका देने से आंतरिक कलह तो बढ़ी ही, साथ ही भाजपा के कुछ नेताओं के इस अहंकार से कि “यहाँ से कोई भी खड़ा हो जाएगा तो जीत जाएगा”, आम वोटरों के स्वाभिमान को ठेस पहुंची. उन्हें लगा कि पार्टी उन्हें ‘टेकेन फॉर ग्रांटेड’ ले रही है. इसके अलावा, नितिन नबीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद उनके करीबी नेताओं द्वारा जमीन पर पर्याप्त पसीना न बहाने का खामियाजा भी पार्टी को उठाना पड़ा.
चुनाव प्रचार के दौरान ही दिल्ली में NEET पेपर लीक मामले और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर छात्र विरोध प्रदर्शन चरम पर था. 20 जुलाई को दिल्ली में छात्रों पर लाठीचार्ज और 25 जुलाई को ‘बिहार बंद’ की गूंज ने बांकीपुर के युवा वोटरों को काफी प्रभावित किया. प्रशांत किशोर युवाओं की बेरोजगारी, शिक्षा व्यवस्था में गड़बड़ियों और सरकारी रवैये को मुख्य एजेंडा बनाने में सफल रहे, जिससे भारी एंटी-इंकंबेंसी बनी.
भोजपुर (शाहपुर) के 26 वर्षीय युवक भरत भूषण तिवारी की संदिग्ध पुलिस मुठभेड़ में हुई मौत ने पटना और आसपास के शिक्षित समाज की भावनाओं को झकझोर दिया था. न्यायिक आयोग के बाद भी कार्रवाई में देरी और बाद में एसटीएफ जवान की गिरफ्तारी की सुस्त प्रक्रिया को लेकर लोगों में सरकार के प्रति काफी गुस्सा था. हालांकि भरत के परिजन प्रचार में नहीं आए, लेकिन इस मुद्दे ने प्रशासनिक रवैये पर सवाल खड़े किए.
प्रशांत किशोर ने चुनाव प्रचार के दौरान रणनीति के तहत भाजपा के पूर्व विधायक या राष्ट्रीय नेताओं पर व्यक्तिगत हमला करने के बजाय सिर्फ मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को अपना मुख्य निशाना बनाया. बांकीपुर में जज, वकील, डॉक्टर और नौकरशाह जैसे शिक्षित समाज के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं. प्रशांत किशोर द्वारा सम्राट चौधरी के कामकाज और उन पर लगाए गए तीखे राजनीतिक आरोपों ने शिक्षित वोटरों में काफी असर डाला.
मंचों से भले ही प्रशांत किशोर ‘जाति से परे’ राजनीति की बात करते रहे, लेकिन जन सुराज ने बांकीपुर के ईबीसी (EBC), यादव, मुस्लिम और अन्य सामाजिक तबकों के जातीय गणित का पूरा ख्याल रखा. 2025 के विधानसभा चुनाव में बिहार भर से चुनाव लड़ चुके जन सुराज के प्रमुख कार्यकर्ताओं ने पटना में डेरा डाला और माइक्रो-लेवल पर बूथ मैनेजमेंट संभाला. उन्होंने अपने समर्थकों को मतदान केंद्रों तक पहुँचाना सुनिश्चित किया.
नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद गठबंधन में ‘छोटे भाई’ की भूमिका में आ चुकी जेडीयू की चुनाव प्रचार में सक्रियता लगभग न के बराबर रही. भाजपा अकेली पड़ती दिखी. वहीं, महज 35% से कम हुए मतदान ने भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक की बेरुखी को उजागर किया. भाजपा अपने समर्थकों को पोलिंग बूथ तक नहीं ला सकी, जिसका सीधा फायदा जन सुराज के संगठित वोट बैंक को मिला.
पिछले विधानसभा चुनावों में इस सीट पर दूसरे नंबर पर रहने वाली राष्ट्रीय जनता दल (RJD) इस बार तीसरे स्थान पर खिसक गई. राजद का चुनाव प्रचार बेहद सुस्त रहा और उसके पारंपरिक वोटर्स भी पूरी तरह एकजुट नहीं रह सके. राजद के पिछड़ने का सीधा फायदा जन सुराज को मिला, जिससे मुख्य मुकाबला भाजपा बनाम जन सुराज हो गया और एंटी-बीजेपी वोट एकमुश्त प्रशांत किशोर के पाले में चले गए.
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बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के ये नतीजे सिर्फ़ एक सीट के हार-जीत के आंकड़े भर नहीं हैं, बल्कि ये बिहार की भावी राजनीति का एक नया संकेत हैं. प्रशांत किशोर की यह ऐतिहासिक जीत जन सुराज के लिए एक बड़े ‘राजनीतिक विकल्प’ के रूप में खुद को स्थापित करने की राह खोलती है. आने वाले विधानसभा चुनावों में बांकीपुर का यह ‘ग्राउंड मॉडल’ बिहार के भावी सियासी समीकरणों को किस दिशा में मोड़ेगा, इस पर अब पूरे देश की नजरें टिकी होंगी.
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