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पादरी की शव को निर्धारित स्थान पर दफनाने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश

छत्तीसगढ़ के बस्तर में हुई एक पादरी की मौत के बाद शव को दफनाने की मांग को लेकर दायर याचिका पर विभाजित फैसला के बावजूद दोनों जज इस बात पर सहमत हुए की डेड बॉडी तीन सप्ताह से मॉर्चरी में सड़ रही है. इसलिए गांव से 20-30 किलोमीटर दूर करकापाल गांव में दफनाने का आदेश दिया है. जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने यह फैसला दिया है. जस्टिस सतीश शर्मा ने कहा कि राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई सार्वजनिक व्यवस्था संबंधी समस्या न हो. जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि छत्तीसगढ सरकार 2 महीने के भीतर राज्य भर में ईसाइयों के लिए बहिष्करण स्थलों का सीमांकन करें.

भाईचारा बढ़ाना सभी नागरिकों का दायित्व है- जस्टिस नागरत्ना

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि भाईचारा बढ़ाना सभी नागरिकों का दायित्व है. जस्टिस सतीश शर्मा ने कहा कि छत्तीसगढ़ में धर्मांतरित ईसाई का अंतिम संस्कार निर्धारित स्थान पर ही किया जाना चाहिए. मृतक के बेटा रमेश बघेल की ओर से दायर याचिका कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है. मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था कि इस मुद्दे को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाना बेहतर है. इसलिए बेहतर होगा कि शव को करकापाल गांव में ईसाइयों के लिए निदिष्ट स्थान पर दफनाया जाए.

सुनवाई में कोर्ट ने कही ये बात

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने कहा था कि यह देखकर दुख हुआ कि एक व्यक्ति ने छत्तीसगढ़ के एक गांव में अपने पिता को ईसाई रीति-रिवाज के अनुसार दफनाने के लिए शीर्ष अदालत का रुख करना पड़ा, क्योंकि अधिकारी इस मुद्दे को हल करने में विफल रहे. किसी विशेष गांव में रहने वाले व्यक्ति को उस गांव में क्यों नहीं दफनाया जाना चाहिए? याचिकाकर्ता ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. हाई कोर्ट ने उनके पिता, एक पादरी, को दफनाने के लिए निदिष्ट क्षेत्र में दफनाने की मांग को ठुकरा दिया था.

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आखिर क्यों नहीं दिया जा रहा दफनाने?

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा था कि एक व्यक्ति को, जो उस गांव में रहा, उसे मौत के बाद गांव के कब्रिस्तान में दफनाने क्यों नहीं दिया जा रहा है. शव बीते 7 जनवरी से मोर्चरी में रखा हुआ है. कोर्ट ने कहा था कि यह कहते हुए दुख हो रहा है कि एक व्यक्ति को अपने पिता को दफनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट आना पड़ रहा है. न तो पंचायत न ही राज्य सरकार या हाई कोर्ट कोई भी इस समस्या को सुलझा नहीं सका. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हम हाई कोर्ट की टिप्पणी से भी हैरान है।, इससे कानून व्यवस्था खराब होती है. बघेल ने याचिका में कहा है कि गांव के लोगों ने उसके पिता को दफनाने का विरोध किया.

ईसाइयों के लिए कोई कब्रिस्तान नही

छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि गांव में ईसाइयों के लिए कोई कब्रिस्तान नही है और शव को गांव से 20 किलोमीटर दूर एक कब्रिस्तान में दफनाया जा सकता है. बघेल की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंजाल्विस ने कहा कि उसके परिवार के अन्य सदस्यों को गांव के ही कब्रिस्तान में दफनाया गया है, लेकिन  उसे दफनाने की इजाजत नहीं दी जा रही है. एसजी ने कहा था कि मृतक का बेटा गांव के ही कब्रिस्तान में पिता के शव को दफनाने पर अड़ा है और इससे आदिवासी हिंदू और ईसाई समुदाय के बीच वैमनस्य पैदा हो सकता है.

-भारत एक्सप्रेस 

गोपाल कृष्ण

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