केरल के सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश को लेकर सालों से चला आ रहा विवाद अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है. सीजेआई सूर्यकांत ने इसको लेकर दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई के लिए 9 जजों की संविधान पीठ का गठन किया है. दायर पुनर्विचार याचिकाओं में कहा गया है कि संविधान का अनुच्छेद 25 और अनुच्छेद 26 सभी को अपनी मान्यताओं के मुताबिक धर्म के पालन का अधिकार देता है.
यह संविधान पीठ 7 अप्रैल 2026 से व्यापक कानूनी सवालों पर नियमित रूप से सुनवाई करने जा रही है, जिसकी अध्यक्षता खुद सीजेआई सूर्यकांत कर रहे हैं. अदालत के सामने असल चुनौती यह तय करना है कि क्या व्यक्तिगत मौलिक अधिकार किसी समुदाय के धार्मिक अधिकारों से ऊपर हैं.
इस संविधान पीठ में सीजेआई सूर्यकांत समेत जस्टिस बी. वी. नागरत्ना, जस्टिस एम. एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन मसीह, जस्टिस प्रसन्ना वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं.
कोर्ट ने सभी पक्षों को 14 मार्च तक लिखित दलीलें दाखिल करने का आदेश दिया था. कोर्ट के पिछले आदेश के मुताबिक 8 दिन में सुनवाई पूरी होगी. 7 अप्रैल से 9 अप्रैल तक पुनर्विचार का समर्थन करने वाले पक्ष अपनी दलीलें रखेंगे. 14 अप्रैल से 16 अप्रैल तक विरोध करने वाले पक्ष अपनी बात रखेंगे. 21 अप्रैल को पुनर्विचार समर्थक अपना जवाबी पक्ष रखेंगे. 22 अप्रैल को सुनवाई पूरी होगी. उस दिन एमिकस क्यूरी के. परमेश्वर अपनी बात रखेंगे. 2019 में बनी नौ जजों की बेंच अब खत्म हो चुकी है, क्योंकि सीजेआई सूर्यकांत को छोड़कर बाकी सभी सदस्य रिटायर हो चुके हैं.
नौ जजों की संविधान पीठ ने कहा था कि पूजा स्थलों में महिलाओं का प्रवेश केवल सबरीमाला मंदिर तक ही सीमित नहीं है. इसमें मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश और दाउदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना भी शामिल है. इसलिए इन मामलों पर पुनर्विचार होना चाहिए. मामले की सुनवाई के दौरान सबरीमाला मंदिर प्रबंधन की ओर से पेश वकील ने बताया था कि 10 से 50 वर्ष आयु तक की महिलाओं के प्रवेश पर इसलिए प्रतिबंध लगाया गया है, क्योंकि मासिक धर्म के समय वे “शुद्धता” बनाए नहीं रख सकतीं. जिसको अदालत ने खारिज कर दिया था और सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दे दी थी.
वर्ष 2018 में तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा की बेंच ने 4:1 के बहुमत से सबरीमाला में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी. कोर्ट ने कहा था कि भक्ति को लैंगिक भेदभाव का शिकार नहीं बनाया जा सकता. एकमात्र जज इंदु मल्होत्रा ने असहमति जताते हुए कहा था कि धार्मिक प्रथाओं की तर्कसंगतता की जांच करना अदालतों का काम नहीं है. मुस्लिम पक्ष ने कोर्ट से कहा था कि अदालतों को यह तय करने से बचना चाहिए कि किसी धर्म में क्या आवश्यक धार्मिक प्रथा है.
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