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अयोध्या भूमि अधिग्रहण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा, यूपी सरकार बोली- ‘विकास को नहीं रोक सकते’

सरयू नगर विकास समिति द्वारा अयोध्या में भूमि अधिग्रहण को को चुनौती देने वाली याचिका पर सभी पक्षों की जिरह के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है. मामले की सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अयोध्या में विकास कार्यों की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि इस शहर में होटल और व्यावसायिक गतिविधियां क्यों नहीं होनी चाहिए? पूरी दुनिया अयोध्या की ओर देख रही है. यह शहर विकास और तीर्थयात्रा के लिहाज से महत्वपूर्ण है, ऐसे में यहां के विकास को रोका नहीं जा सकता.

उत्तर प्रदेश सरकार ने कोर्ट को यह भी बताया कि राज्य सरकार के पास अयोध्या के विकास को लेकर व्यापक दृष्टिकोण है. शहर का विकास उस स्तर पर होना चाहिए, जो अयोध्या के महत्व और उसकी पहचान के अनुरूप हो. सरकार ने कहा कि अयोध्या में बढ़ती धार्मिक गतिविधियों और तीर्थयात्रियों की जरूरतों को देखते हुए विकास जरूरी है.

भूमि अधिग्रहण योजना पर याचिकाकर्ता के वकील ने उठाए सवाल

मामले की सुनवाई के याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने भूमि अधिग्रहण की योजना पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस योजना को पहली बार देखने से ही इसकी खामियां सामने आती है. उन्होंने दलील दी कि योजना में 9 होटल भूखंड और 18 व्यावसायिक भूखंड प्रस्तावित हैं. इसके लिए करीब 250 किसानों की जमीन अधिग्रहण की जा रही है, जबकि इन जमीनों पर बहु फसली खेती होती है.

याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि क्षेत्र में व्यावसायिक विकास तेजी से कृषि भूमि पर हावी होता जा रहा है. उन्होंने मुआवजे की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि किसानों को दिया जा रहा मुआवजा ऐसा है, मानो उनकी ओर कुछ पैसे फेंक दिए जा रहे हों. इसपर यूपी सरकार की ओर से पेश वकील ने कहा कि किसानों पर पैसे नहीं फेंके जा रहे हैं.

सरकार के मुताबिक, संबंधित कानून के तहत बढ़ी हुई दरों पर मुआवजा, अनिवार्य ग्रहण की राशि और अन्य वैधानिक लाभ दिए जाने का प्रावधान है. बता दें कि अयोध्या में उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद द्वारा बनाई गई योजनाओं और 2020 के बाद जारी अधिसूचना के जरिये यूपी आवास एवं विकास परिषद अधिनियम 1965 के तहत उनके लिए किए गए अधिग्रहण से जुड़ा है.

जमीन मालिकों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने दलील दी देते हुए कहा था कि राज्य ने 2013 के एक्ट के बजाए 1965 के कानून को चुना, जिसमें ज्यादा मुआवजा, जरूरी पुनर्वास और अधिग्रहण पहले सोशल.इम्पैक्ट असेसमेंट शामिल है.

यह भी पढ़ें-महाराष्ट्र मतदाता सूची विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट का चुनाव आयोग को नोटिस, 33% नाम हटने पर याचिका पर जवाब तलब

-भारत एक्सप्रेस

गोपाल कृष्ण

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