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दिल्ली हाई कोर्ट ने 38 साल पुराने मामले का निपटारा करते हुए कहा न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के समान

दिल्ली हाई कोर्ट ने 38 साल से लंबित वसीयत विवाद मामले का निपटारा कर दिया हैं. कोर्ट ने दिवंगत राजा प्रताप भान प्रकाश सिंह की 1985 की वसीयत को वैध ठहराया है. जस्टिस पुरुषेन्द्र कुमार कौरव कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि 38 साल से चल रहे इस विवाद के दौरान मूल पक्षकारों में से कई लोगों की मौत हो चुकी है. कितने वकील बदले जा चुके हैं.

मामलों का शीघ्र निपटारा हो सुनिश्चित

कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि न्याय प्रणाली पर जनता के भरोसे को कमजोर करती है. यह मामला 1987 से अदालतों में लंबित था. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ऐसी देरी न्याय प्रणाली को बाधित करती है, पक्षकारों को अनावश्यक रूप से उलझाती है और प्रशासनिक चूकों की गुंजाइश बढ़ाती हैं. इसलिए हर हितधारक, याचिकाकर्ता, वकील और कोर्ट की जिम्मेदारी है कि मामलों का शीघ्र निपटारा सुनिश्चित किया जाए.

बच्चों को वसीयत से बाहर रखना संदिग्ध नहीं

कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि न्यायिक व्यवस्था बार एंड बेंच और पक्षकारों के परस्पर विश्वास पर चलती है, और किसी भी पक्ष की चूक पूरे सिस्टम में विश्वास को कमजोर करती है. कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि पत्नी और बच्चों को वसीयत से बाहर रखा जाना संदिग्ध नहीं है, क्योंकि वसीयत में उनके साथ चल रहे वैवाहिक विवाद, शत्रुता और धमकियों का स्पष्ट उल्लेख हैं. वसीयत की धारा 63 भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार विधिवत निष्पादित हुई थी.

मानसिक अक्षमता का विश्वसनीय प्रमाण नहीं

कोर्ट ने यह भी कहा कि ज़बरदस्ती या मानसिक अक्षमता का कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं हैं. यह याचिका 1987 में वी. प्रभा द्वारा दाखिल की गई थी. वे नवंबर 1985 की उस वसीयत के आधार पर प्रमाणिक इच्छा पत्र चाहती थी, जिसे राजा प्रताप भान प्रकाश सिंह ने अपने निधन तीन दिन पहले बनाया था.

वसीयत में राजा ने अपनी कई स्वयं अर्जित संपत्तियां पांच लाभार्थियों को दी थी, जिनमें प्रभा और उनके परिजन शामिल थे. राजा की विधवा सविता कुमारी और उनके पुत्रों ने वसीयत को चुनौती देते हुए कहा कि वसीयत संदिग्ध परिस्थिति में बनाई गई और इसमें पुश्तैनी सम्पत्तियां भी शामिल थी.

ये भी पढ़ें: कोविड टीकों के दुष्प्रभाव को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा

-भारत एक्सप्रसे

गोपाल कृष्ण

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