दिल्ली हाई कोर्ट ने द इलेक्शन सिंबल्स (रिजर्वेशन एंड अलॉटमेंट) ऑर्डर, 1968 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि चुनावों को नियंत्रित करने वाले मौजूदा कानूनी ढांचे को बाधित करने का कोई मामला नहीं बनता है. जस्टिस नितिन वासुदेव सांब्रे और जस्टिस अनीश दयाल की पीठ ने यह आदेश दिया है. कोर्ट ने यह आदेश हिंद साम्राज्य पार्टी की ओर से दायर याचिका पर यह आदेश दिया है.
याचिकाकर्ता ने कोर्ट में चुनाव चिन्ह आदेश को रद्द करने और इसके प्रावधानों को लागू करने से रोकने की मांग की थी. साल 2019 में हिंद साम्राज्य पार्टी ने एक याचिका दायर कर कहा था कि चुनाव चिन्ह से जुड़ा 1968 का आदेश संविधान के अनुच्छेद 14 में दिए गए बराबरी के अधिकार का उल्लंघन करता है.
दायर याचिका में कहा गया था कि इस आदेश के कारण कुछ पुराने राजनीतिक दलों को नए दलों से ज्यादा सुविधाएं और अधिकार मिलते हैं, जो सही नहीं है. पार्टी का कहना है कि सभी राजनीतिक दल एक ही वर्ग में आते हैं और एक ही वर्ग के अंदर भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए और किसी भी पुराने दल को खास अधिकार नहीं मिलने चाहिए.
दायर याचिका में यह भी कहा गया था कि चुनाव आयोग के पास कोई अधिकार नहीं है कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में लिखे गए नियमों को लागू करने के लिए वह अपने स्तर पर किसी तरह का नया कानून बनाए. सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने कहा कि आयोग के पास सिंबल्स आदेश जारी करने की स्वतंत्र अधिकार क्षेत्र नहीं है.
याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि सभी पंजीकृत राजनीतिक दल एक ही वर्ग का गठन करते हैं और मान्यता प्राप्त पार्टियों को आरक्षित चिन्ह और प्रक्रियात्मक लाभ देना नई पंजीकृत संस्थाओं के साथ भेदभाव करता है.
-भारत एक्सप्रेस
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