CJI बीआर गवई
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति बी.आर. गवई ने कानूनी सहायता को महज एक ‘दान कार्य’ मानने के बजाय इसे ‘नैतिक कर्तव्य’ और ‘शासन के एक अनिवार्य अभ्यास’ के रूप में देखने का आह्वान किया है. रविवार को ‘कानूनी सहायता वितरण तंत्र को मजबूत करना’ (Strengthening Legal Aid Delivery Mechanisms) विषय पर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में बोलते हुए, CJI गवई ने कहा कि जो लोग कानूनी सहायता आंदोलन से जुड़े हैं, उन्हें यह सुनिश्चित करने के लिए ‘प्रशासनिक कल्पना’ (Administrative Imagination) के साथ अपनी भूमिका निभानी चाहिए कि कानून का शासन देश के हर कोने तक पहुंचे.
यह कार्यक्रम राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) के 30वें वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया था, जिसमें नॉमिनेट CJI न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के कई अन्य न्यायाधीश भी उपस्थित थे. अपने संबोधन में, CJI गवई ने कानूनी सहायता आंदोलन को और अधिक मजबूत बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए, जिसमें नीतिगत निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए एक सलाहकार समिति के गठन का प्रस्ताव भी शामिल है.
CJI गवई ने कानूनी सहायता से जुड़े अधिकारियों, प्रशासकों और स्वयंसेवकों से अपेक्षा की कि वे अपनी भूमिका को केवल कानूनी प्रक्रिया तक सीमित न रखें. उन्होंने कहा, “कानूनी सहायता केवल दान का कार्य नहीं, बल्कि एक नैतिक कर्तव्य है. यह सुशासन का एक अभ्यास है, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कानून का शासन हमारे देश के हर कोने तक पहुंचे.”
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कानूनी सहायता कर्मियों को ‘न्याय के प्रशासक’ की तरह सोचना चाहिए. इसका अर्थ है योजना बनाना, समन्वय करना और नवाचार करना, ताकि खर्च किया गया हर रुपया, की गई हर यात्रा और किया गया हर हस्तक्षेप वास्तव में जरूरतमंदों के जीवन को बेहतर बना सके. उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि कानूनी सहायता संस्थाओं के काम का असली पैमाना आंकड़ों में नहीं, बल्कि उन नागरिकों के विश्वास में निहित है, जिन्हें एक बार अदृश्य महसूस कराया गया था, लेकिन अब उन्हें न्याय व्यवस्था पर विश्वास है.
CJI गवई ने कानूनी सेवा प्राधिकरणों को एक दीर्घकालिक संस्थागत दृष्टिकोण के साथ अपने प्रयासों को वैचारिक रूप देने और निष्पादित करने की आवश्यकता व्यक्त की. उन्होंने कहा कि वर्तमान में, प्राथमिकताएं अक्सर व्यक्तिगत कार्यकारी अध्यक्षों के कार्यकाल से निर्धारित होती हैं, और उनका सीमित कार्यकाल पहलों को लगातार लागू करने में एक चुनौती पैदा करता है.
इस चुनौती का समाधान करने के लिए, CJI ने एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया:
“मैं NALSA और SLSAs (राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों) में एक सलाहकार समिति बनाने का सुझाव देता हूँ, जिसमें वर्तमान कार्यकारी अध्यक्षों के साथ-साथ दो या तीन भविष्य के या आने वाले कार्यकारी अध्यक्ष भी शामिल हों.”
उन्होंने कहा कि यह समिति तिमाही या हर छह महीने में बैठक कर सकती है, ताकि एक दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य के साथ परियोजनाओं पर चर्चा और उनकी निगरानी की जा सके. यह व्यवस्था न्याय तक पहुंच, जागरूकता या डिजिटल परिवर्तन से संबंधित प्रमुख कार्यक्रमों को प्रशासनिक परिवर्तनों के बावजूद लगातार आगे बढ़ाने में मदद करेगी.
CJI गवई, जो 23 नवंबर को अपना पद छोड़ने वाले हैं, ने यह भी याद किया कि जब वह NALSA के कार्यकारी अध्यक्ष थे, तो उनके सहयोगी न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने एक साथ मिलकर देश के विभिन्न हिस्सों में यात्रा की और काम किया.
CJI गवई ने उन न्यायिक अधिकारियों के लिए एक विशेष संदेश दिया, जो कानूनी सेवा प्राधिकरणों में प्रतिनियुक्ति पर आते हैं. उन्होंने कहा कि न्यायिक प्रशिक्षण अक्सर एक निश्चित दूरी बनाए रखने, साक्ष्य को निष्पक्ष रूप से तौलने और तर्कसंगत निर्णय लागू करने की शिक्षा देता है, “लेकिन कानूनी सहायता का काम विपरीत संवेदनशीलता की मांग करता है.”
कानूनी सहायता के काम में सहानुभूति (Empathy), सहयोग (Collaboration), और प्रक्रिया से परे अन्याय पैदा करने वाली स्थितियों को देखने की क्षमता की आवश्यकता होती है.
उन्होंने स्पष्ट किया-
जब न्यायिक अधिकारी कानूनी सेवा संस्थानों में सेवा कर रहे होते हैं, तो उनकी भूमिका निर्णय देने की नहीं, बल्कि जुड़ने, सरकारी विभागों के अधिकारियों के साथ समन्वय करने, नागरिक समाज संगठनों के साथ साझेदारी बनाने, और करुणा व स्पष्टता के साथ नागरिकों तक पहुंचने की होती है.
CJI ने अपने अनुभवों का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने हर जगह पाया है कि सरकारी अधिकारी कानूनी सहायता को बढ़ावा देने और सरकारी योजनाओं के लाभ जरूरतमंदों तक सुनिश्चित करने में बहुत सहयोगी रहे हैं.
CJI गवई ने स्वयंसेवकों और कानूनी सहायता सलाहकारों को गरिमा और सम्मान के साथ व्यवहार करने का आह्वान किया, क्योंकि कानूनी सहायता आंदोलन की स्थिरता और सफलता इन्हीं समर्पित व्यक्तियों पर निर्भर करती है.
समापन करते हुए उन्होंने कहा कि पिछले तीन दशकों ने दिखाया है कि जब करुणा प्रतिबद्धता से मिलती है, और जब कानून मानवीय अनुभव से मिलता है, तभी वास्तविक परिवर्तन संभव हो पाता है. हालांकि, यह यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है. उन्होंने कहा कि हमारा कार्य केवल जो बन चुका है, उसे बनाए रखना नहीं, बल्कि यह कल्पना करना भी है कि और क्या किया जा सकता है.
CJI ने न्यायपालिका, कार्यपालिका और नागरिक समाज के बीच सहयोग को और गहरा करने, मानवीय स्पर्श को खोए बिना प्रौद्योगिकी का उपयोग करने, और प्रगति को केवल संख्याओं में नहीं, बल्कि जिन लोगों की गरिमा बहाल हुई है, उसमें मापने का आह्वान किया. उन्होंने यह कहकर अपने शब्दों को विराम दिया कि “कानूनी सहायता आंदोलन हमारे संविधान की आत्मा की सबसे बेहतरीन अभिव्यक्तियों में से एक है, यह कानून के अक्षर और लोगों की जीवित वास्तविकताओं के बीच एक सेतु है.”
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