रोहिंग्या शरणार्थियों से संबंधित मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कई सवाल उठाया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा क्या वे शरणार्थी है या अवैध तरीके से भारत में प्रवेश कर रह रहे है. जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह मुद्दा तय होने के बाद बाकी मुद्दे अपने आप तय हो जाएगा.
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि पहला प्रमुख मुद्दा सरल है, क्या वे शरणार्थी हैं या अवैध घुसपैठिए. कोर्ट ने कहा कि सरकार अवैध शरणार्थियों को डिपोट करे, लेकिन अनुच्छेद 21 के तहत यहां रहने तक बेसिक सुविधाएं उपलब्ध कराए.
कोर्ट ने यह भी सवाल किया गया यदि वे शरणार्थी नहीं हैं और अवैध रूप से प्रवेश कर रहे हैं, तो क्या उन्हें निर्वासित करने का केंद्र या राज्यों का कदम उचित है? यदि उन्हें अवैध रूप से प्रवेश करने वाला माना भी गया है, तो क्या उन्हें अनिश्चित काल तक हिरासत में रखा जा सकता है या क्या वे कुछ शर्तें के अधीन जमानत पर रिहा होने के हकदार हैं? कोर्ट ने सवाल किया कि क्या हिरासत में नहीं लिए गए और शरणार्थी शिविरों में रहने वालों को पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि जैसी बुनियादी सुविधाएं प्रदान की गई है?
कोर्ट ने पूछा अगर रोहिंग्या को अवैध घुसपैठिया के रूप में पाया गया, तो क्या उन्हें अनिश्चिकाल तक हिरासत में रखा जा सकता है या वह जमानत पर रिहा होने के हकदार हैं, उन शर्ते के अधीन, जिन्हें न्यायालय लागू करना उचित समझे? कोर्ट ने इस मामले को तीन भागों में बांटा है. पहला रोहिंग्याओ से जुड़ा है. दूसरा रोहिंग्याओ से सीधे नहीं जुड़ा है, और तीसरा एक अलग ही मामला बताया है. इन सभी मुद्दे पर कोर्ट अलग-अलग सुनवाई करेगा और यह सुनवाई प्रत्येक बुधवार को की जाएगी.
पिछली सुनवाई में रोहिंग्या शरणार्थियों को समुद्र में फेंक देने का दावा करने पर कोर्ट ने याचिकाकर्ता को फटकार लगाते हुए कहा था कि देश ऐसे मुश्किल समय से गुजर रहा है और आप मनमानी कहानियां गढ़ कर ले आते है. एक बार कोर्ट ने आपको राहत दे दी बार-बार नई कहानी के साथ कोर्ट आ जाते हैं. यदि आपको इतनी ही चिंता है तो गरीबों के लिए कुछ खुद क्यों नहीं करते? दायर याचिका में 43 रोहिंग्या शरणार्थियों को समुद्र में फेंक कर म्यांमार निर्वासित करने का आरोप लगाया गया था.
वह लोग लाइफ जैकेट के सहारे तैरते हुए म्यांमार पहुचे है. यह याचिका रोहिंग्या मोहम्मद इस्माइल की ओर से दायर की गई है. याचिकाकर्ता के वकील कॉलिन गोंजाल्विस ने कोर्ट से कहा था कि संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट में इन लोगों को पीड़ित शरणार्थी माना गया है.
रिपोर्ट में यह कहा गया है कि इन्हें जबरन निर्वासित न किया जाए. कोर्ट ने कहा था कि हम इस रिपोर्ट पर अपनी बात को रखेंगे. भारत से बाहर बैठे लोग हमारी सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़े मामलों को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं.
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भारत एक्सप्रेस
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