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देशभर के पुलिस थानों में सीसीटीवी की कमी पर सुप्रीम कोर्ट नाराज, मीडिया रिपोर्ट पर लिए गए स्वतः संज्ञान पर फैसले को रखा सुरक्षित

कोर्ट 22 सितंबर को फैसला सुनाएगा. जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा कि मुद्दा सिर्फ इंस्टॉलेशन का नहीं है, बल्कि निगरानी का है. आज भले ही अनुपालन का हलफनामा दाखिल हो जाए, लेकिन अगर कल पुलिस अधिकारी कैमरे बंद कर दें या उन्हें डायवर्ट कर दे तो फिर क्या होगा?

कैमरा बंद होते ही मिलना चाहिए अलर्ट

कोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया गया यह मामला केवल तकनीकी अनुपालन का नहीं, बल्कि पुलिस हिरासत में पारदर्शिता और नागरिकों की सुरक्षा से जुड़ा है. उन्होंने कहा कि हम सोच रहे थे कि एक कंट्रोल रूम होना चाहिए, जिसमें मानवीय हस्तक्षेप न हो. अगर कोई कैमरा बंद होता है तो तुरंत अलर्ट मिलना चाहिए. साथ ही स्वतंत्र एजेंसी द्वारा थानों के निरीक्षण भी होना चाहिए. हम आईआईटी को भी इसमें शामिल करने पर विचार कर सकते है, ताकि ऐसा तंत्र बनें जिसमें सीसीटीवी फुटेज की निगरानी बिना मानवीय हस्तक्षेप के हो सकें. इसपर दवे ने कहा कि कैमरे बंद करने की समस्या वास्तव में हो रही है, सिर्फ हिरासत में मौत नही, बल्कि यातना और दुरुपयोग के मामले भी सामने आ रहे हैं. पिछले आठ महीनों में राजस्थान में 11 लोगों की पुलिस थानों में मौत हुई है.

केंद्र सरकार ने SC के आदेशों का नहीं किया पालन

मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने याद दिलाया कि वर्ष 2020 में ही कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में देशभर के पुलिस थानों में नाइट विजन वाले सीसीटीवी कैमरे लगाने का आदेश दिया था. सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ दवे ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने परमवीर सिंह सैनी केस के तहत एक चार्ट तैयार किया है, जिसमें यह बताया गया है कि किन राज्यों ने आदेश का पालन किया और किन राज्यों ने नहीं किया है. उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन नही किया है. न ही एनआईए, ईडी और सीबीआई ने किया है.

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने कहा था कि सीसीटीवी कैमरों की मौजूदगी पुलिस हिरासत में होने वाली अमानवीय घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए अनिवार्य है. यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने की दिशा में एक अहम कदम है. अदालत ने स्पष्ट किया था कि अब इस मामले में और देरी बर्दाश्त नही की जाएगी.

अधिकतर दफ्तरों में नहीं है उपयुक्त सीसीटीवी कैमरे

इससे पहले इसको लेकर दाखिल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को चेतावनी देते हुए स्टेट्स रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया था. मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ दवे ने कहा था कि अब भी देश भर में पुलिस थानों और केंद्रीय जांच एजेंसियों के अधिकतर दफ्तरों में समुचित सीसीटीवी कैमरे नहीं है. जो कैमरे लगे भी है, वो या तो काम नहीं कर रहे है, उसकी गुणवत्ता भी घटिया है. कैमरे की क़्वालिटी इतनी खराब है कि उसकी ऑडियो अच्छी नहीं है, धुंधला दिखता है.

दफ्तरों में सीसीटीवी लगाने का दिया था निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में सीबीआई, ईडी और एनआईए सहित अन्य जांच एजेंसियों के दफ्तर में सीसीटीवी कैमरे और रिकॉर्डिंग उपकरण लगाने का निर्देश दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि देशभर के प्रत्येक थाने में, सभी प्रवेश और निकास बिंदुओं, मुख्य द्वार, लॉक-अप, कॉरिडोर, लॉबी और रिसेप्शन के अलावे कई अन्य जगहों पर सीसीटीवी कैमरे लगाने का आदेश दिया था, ताकि कोई कैमरे की नजर से बच न सके.

इसका उद्देश्य था कि हिरासत में होने वाली पूछताछ के दौरान पारदर्शिता बनी रहे और किसी भी प्रकार के मानवाधिकार उल्लंघन या पुलिस ज्यादती पर रोक लगाई जा सके. सीसीटीवी फुटेज का इस्तेमाल पुलिस जांच और अदालती कार्यवाही में किया जा सकता है. सीसीटीवी फुटेज से कई ऐसे अहम सबूत मिलते है जो किसी मामले में अंतर पैदा कर सकता है.

ये भी पढ़ें: वक्फ संशोधित कानून 2025 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने कुछ प्रावधानों पर लगाया आंशिक रोक

-भारत एक्सप्रेस

गोपाल कृष्ण

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