सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला दिया है. कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि वारंट या लिखित कारणों के बिना गिरफ्तारी अवैध है. जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने ने कहा कि तलाशी केवल संदेह या मनमानी संतुष्टि के आधार पर नहीं कि जा सकती है. बल्कि इसके लिए ठोस जानकारी तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर विवेकपूर्ण निर्णय जरूरी है. कोर्ट ने लीगल मेट्रोलॉजी एक्ट 2009 से जुड़े एक मामले में सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने यह आदेश दिया है.
कोर्ट ने कहा कि तलाशी और जब्ती से जुड़ी प्रक्रिया यदि कानूनी प्रावधानों का पालन किए बिना की जाए, तो पूरी कार्यवाही अवैध और अस्थिर होगी. साथ ही कोर्ट ने आईटीसी लिमिटेड के खिलाफ जाती जब्ती और कंपाउंडिंग नोटिस को खारिज कर दिया है. कोर्ट ने माना कि बिना वारंट और बिना कारण दर्ज किए की गई तलाशी और जब्ती की कार्यवाही शुरू से ही अवैध थी. चूंकि शुरुआती प्रक्रिया ही दोषपूर्ण थी, उसके आधार पर की गई सभी आगे की कार्यवाही भी टिकाऊ नहीं है.
बता दें कि यह विवाद 2 जुलाई 2020 को शुरू हुआ, जब लीगल मेट्रोलॉजी अधिकारी ने बेंगलुरु आईटीसी लिमिटेड के गोदाम का निरीक्षण किया. आईटीसी अपने क्लासमेट ब्रांड के तहत स्टेशनरी का कारोबार करती है. याचिका के मुताबिक अधिकारी ने 7600 पैकेज क्लासमेट एक्सरसाइज बुक्स जब्त कर लिए और आरोप लगाया कि लीगल मेट्रोलॉजी नियम 2011 के नियम 24 (A) का उल्लंघन हुआ है. जो 2009 अधिनियम की धारा 36 (1) के तहत दंडनीय अपराध है.
कोर्ट ने कहा कि विशेष अधिनियमों पर भी सीआरपीसी का प्रावधान लागू होगा. आयकर विभाग, सीमा शुल्क अधिनियम, जीएसटी कानून, एनडीपीएस अधिनियम जैसे विशेष कानूनों में भी तलाशी और जब्ती के लिए सीआरपीसी प्रक्रिया का पालन जरूरी है.
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-भारत एक्सप्रेस
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