UAPA के तहत दर्ज मामले और गिरफ्तारियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता व्यक्त की है. सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से यूएपीए और उस जैसे अन्य कानूनों के लंबित मामलों की समीक्षा करने को कहा है.
कोर्ट ने कहा है कि ऐसे सभी मामलों की समीक्षा की जाए जिनमें आरोपित खुद को निर्दोष साबित करने के लिए साक्ष्य देने होते है. जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने राज्य विधि सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया है कि वह प्रत्येक विचाराधीन कैदी को उसके प्रतिनिधित्व के अधिकार के बारे में जागरूक करें, चाहे वह अपनी पसंद के वकील के माध्यम से हो या कानूनी सहायता से मिले वकील के माध्यम से.
कोर्ट ने यह भी कहा कि जो लोग बाद वाला विकल्प चुनते हैं, उनके मामलों के लिए वकीलों को शीघ्रता से नियुक्त किया जाना चाहिए ताकि कार्यवाही जल्द से जल्द शुरू या जारी रह सके. कोर्ट ने लीगल सर्विसेज से कहा है कि वह लोगों को यह भी बताए कि उन्हें पैरवी के लिए अधिवक्ता की सेवा लेने का अधिकार है. इससे आरोपित को न्याय मिल सकेगा, साथ ही उसके मुकदमे की अदालत में तेजी से सुनवाई हो सकेगी. इससे अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या में कमी देखने को मिलेगी.
सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश 2010 में बंगाल के पश्चिमी मेदिनीपुर जिले में विस्फोट से ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस को दुर्घटनाग्रस्त करने के मामले में पकड़े गए आरोपितों की ओर से दायर जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया है. सीबीआई ने आरोपियों की ओर से दायर जमानत याचिका का विरोध किया था. इस हादसे में 148 लोगों की मौत हुई थी और 170 से अधिक यात्री घायल हुए थे. पश्चिम बंगाल के पश्चिम मिदनापुर जिले में माओवादियों द्वारा रेलवे ट्रैक उखाड़ने से ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस पटरी से उतर गई थी और एक मालगाड़ी से टकरा गई थी. निर्दोष लोगों की मौत के अलावा सरकार को सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान से करीब 25 करोड़ रुपए का घाटा हुआ था.
कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि हर नागरिक को सरकार की नीतियों के खिलाफ कानून के दायरे में रहकर विरोध करने का संवैधानिक अधिकार है. लेकिन निर्दोष लोगों की जान लेने वाली बर्बर और अमानवीय हरकतों को किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता. इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड अमित द्विवेदी ने कहा कि यह भारत का एक ऐसा कानून है जो आतंकवाद पर लगाम लगाने के लिए बनाया गया है. यूएपीए के तहत एनआईए को काफी अधिक अधिकार दिया गया है. यूएपीए के तहत लोगों की संपत्तियां भी दर्ज की जा सकती है. इसके तहत जमानत मिलना बहुत मुश्किल होता है.
इनके मुताबिक टेरर अटैक की आशंका भारत के लिए हमेशा बनी रहती है. चाहे 26/11की घटना हो, पुलवामा घटना हो या अभी हालही में हुए लाल किला कार ब्लास्ट की घटना हो ये सारी घटनाएं जुड़ी हुई है. इससे निपटने के लिए लोगो की जान और राष्ट्र की एकता बचाए रखने के लिए ये एक्ट बहुत जरूरी है.
वहीं पटियाला हाउस कोर्ट के वकील गीतांजलि कुमारी ने बताया कि इसके तहत पुलिस ऐसे आतंकियों, अपराधियों या संदिग्ध लोगों की पहचान करती है, जो आतंकी गतिविधियों में शामिल रहते है. आतंकी गतिविधियों के लिए लोगों को तैयार करते है या फिर ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा देते है. ऐसे मामलों में एनआईए के पास काफी शक्तियां होती है.
यूएपीए की धारा 15 आतंकी गतिविधि को परिभाषित करती है. इस कानून के तहत कम से कम 5 साल और अधिकतम आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है. अगर आतंकी घटना में किसी की जान चली जाती है तो दोषी व्यक्ति को मौत की सजा या फिर आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है. अगर कोई व्यक्ति आतंक फैलाने के मकसद से देश की अखंडता, एकता, सुरक्षा और संप्रभुता तो खंडित करने की कोशिश करता है या फिर देश या देश के बाहर भारतीयों के साथ आतंकी घटना करने की कोशिश करता है, तो वह यूएपीए कानून के दायरे में आएगा.
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-भारत एक्सप्रेस
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