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चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति मामला: सुप्रीम कोर्ट में विभाजित फैसला, मामला बड़ी बेंच को भेजने के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति प्रक्रिया में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को चयन समिति में शामिल किए जाने के मुद्दे पर एक विभाजित (Divided) फैसला सुनाया है. अदालत ने इस मामले को आगे की सुनवाई के लिए मुख्य न्यायाधीश के पास भेज दिया है.

जस्टिस दीपांकर दत्ता का मत

जस्टिस दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता वाली बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा कि चूंकि इस तरह के संवैधानिक और कानूनी मुद्दों से जुड़ी याचिकाएं अक्सर लंबित रहती हैं, इसलिए इस मामले पर विचार करने के लिए कम से कम पांच जजों की एक स्थायी संविधान पीठ (Constitution Bench) का गठन किया जाना चाहिए. अब यह संविधान पीठ ही तय करेगी कि इन याचिकाओं पर सुनवाई के लिए मामला पांच जजों की बेंच को सौंपा जाए या नहीं.

जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा का मत

वहीं, पीठ में शामिल जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने अपने अलग फैसले में कहा कि वह जस्टिस दत्ता द्वारा दी गई सभी टिप्पणियों और अपनाए गए तर्कों से पूरी तरह सहमत नहीं हैं. हालांकि, उन्होंने भी यह माना कि इस मामले में उठाए गए महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों पर एक बड़ी संविधान पीठ द्वारा ही विचार किया जाना चाहिए.

2023 के कानून को दी गई है चुनौती

यह पूरा मामला कांग्रेस नेता डॉ. जया ठाकुर और अन्य द्वारा दायर की गई याचिकाओं से जुड़ा है. इन याचिकाओं में केंद्र सरकार के मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यालय की अवधि) अधिनियम, 2023 की वैधता को चुनौती दी गई है.

नए कानून के तहत चुनाव आयुक्तों का चयन करने वाली समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर कर दिया गया है. वर्तमान कानून के अनुसार, इस चयन समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता (या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता) शामिल होते हैं.

सुनवाई के दौरान उठी थीं आपत्तियां

चयन प्रक्रिया पर सवाल: सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं (जैसे पूर्व आईएएस अधिकारी एसएन शुक्ला और अन्य) की ओर से यह तर्क दिया गया था कि विधानमंडल ने बिना सोचे-समझे इस संशोधन को मंजूरी दी है. उनका कहना था कि मंत्री की अध्यक्षता वाली खोज समिति एकतरफा है और इसमें राजनीतिक निष्पक्षता से समझौता किया गया है, क्योंकि चयन समिति में विपक्ष के नेता की उपस्थिति केवल ‘नाममात्र’ की रह जाती है और उनकी राय को बहुमत के आधार पर नजरअंदाज किया जा सकता है.

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अदालत की पिछली टिप्पणियां: पूर्व की सुनवाई के दौरान बेंच ने यह भी टिप्पणी की थी कि जब देश के सीजेआई सीबीआई (CBI) निदेशक की नियुक्ति प्रक्रिया जैसी संस्थाओं में शामिल होते हैं, तो मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए भी एक स्वतंत्र और पारदर्शी प्रक्रिया क्यों नहीं हो सकती? हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि अदालत संसद को सीधे तौर पर कानून बनाने का निर्देश नहीं दे सकती, लेकिन चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखना बेहद जरूरी है.

गोपाल कृष्ण

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