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सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के विद्युत विनियमों को वैध ठहराया, सस्ती बिजली की उम्मीद बढ़ी

राजस्थान सरकार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिल गई है. कोर्ट ने विद्युत विनियमों को पूरी तरह वैध ठहराया है. जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह फैसला दिया है. कोर्ट ने राजस्थान विद्युत विनियमों को पूरी तरह वैध ठहराया और बिजली कंपनियों की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से राज्य बिजली उपभोक्ताओं को सस्ती और न्यायसंगत बिजली मिलने की उम्मीद जग गई है. यह अपील रामायण इस्पात प्राइवेट लिमिटेड सहित अन्य की ओर से दायर की गई थी.

याचिका में राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कम्पनियों की तरफ से अपील दायर की गई थी. कम्पनियों के कहना था कि ये नियम उनके अपने पावर प्लांट्स या बाहरी राज्यों से बिजली खरीदने के अधिकार को अनुचित रूप से सीमित करते है. राजस्थान हाई कोर्ट ने पहले ही 2016 आरईआरसी विनियमों को वैध ठहराया था. जिनका उद्देश्य यह था कि उपभोक्ता एक साथ वितरण लाइसेंसधारी से अनुबंधित मांग और ओपन एक्सेस बिजली का बिजली के प्रयोग ना कर सके. इन नियमों का मकसद पावर ग्रीड में अनुशासन बनाये रखना और अधिक या कम बिजली खपत से उत्पन्न गड़बड़ियों को रोकना था.

जनता को सस्ती बिजली मिलने की उम्मीद

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया है कि राज्य सरकारें अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर बिजली के उपयोग को नियंत्रित कर सकती है, जबकि अंतर राज्यीय विद्युत व्यापार केंद्र के अधीन रहेगा. राजस्थान सरकार की ओर से पेश एडवोकेट जनरल शिव मंगल शर्मा ने कहा कि कोर्ट के फैसले के बाद राज्य की जनता को सस्ती बिजली मिलने की उम्मीद जग गई है. 2016 के नियमों से प्रभावित कम्पनियों की दलाली थी कि इन नियमों से ओपन एक्सेस वितरण लाइसेंसधारी से ली जा रही बिजली के संयुक्त उपयोग पर रोक लगाना मनमाना है और यह विद्युत अधिनियम 2003 का उल्लंघन करता है. उनका कहना था कि 2004 के पुराने नियमों के तहत उन्हें  बिजली की खपत के स्रोत को लचीले तरह से प्रबंधित करने की स्वतंत्रता थी, जो छीन ली गई है.

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-भारत एक्सप्रेस

गोपाल कृष्ण

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