देश में तेजी से बढ़ती मेडिकल महंगाई फोटो क्रेडिट- AI@Bharat Express
Health Insurance Claim Report: दिल्ली/आदित्य द्विवेदी: इलाज की आधुनिक तकनीक ने गंभीर बीमारियों से लड़ने की उम्मीद तो बढ़ाई है, लेकिन इसके साथ अस्पतालों और दवाइयों का खर्च भी तेजी से बढ़ा है. कैंसर, हार्ट डिजीज या कोई अन्य गंभीर बीमारी होने पर बड़ा इलाज एक मध्यमवर्गीय परिवार की वर्षों की जमा पूंजी तक खत्म कर सकता है. ऐसे दौर में हेल्थ इंश्योरेंस आर्थिक सुरक्षा का सबसे बड़ा सहारा माना जाता है. हालांकि, सबसे बड़ा सवाल यह बना हुआ है कि जब मरीज को सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तब क्या इंश्योरेंस कंपनियां क्लेम का पूरा पैसा आसानी से देती हैं?
आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि हर साल लाखों क्लेम सेटल जरूर होते हैं, लेकिन बड़ी रकम के क्लेम डिसअलो (कटौती) और रिप्यूडियेट (खारिज) भी किए जा रहे हैं, जिसके कारण बीमा होने के बावजूद मरीज को अपनी जेब से भारी रकम खर्च करनी पड़ती है.
भारत में मेडिकल खर्च बढ़ने की दर सामान्य महंगाई की तुलना में कहीं अधिक है. ‘एऑन’ (Aon) की 2026 ग्लोबल मेडिकल ट्रेंड रेट्स रिपोर्ट के अनुसार, भारत में मेडिकल लागत 2025 में करीब 13 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान था, जबकि 2026 के लिए भी यह बढ़ोतरी लगभग 11.5 प्रतिशत रहने का अनुमान है.
इसके विपरीत, वर्ष 2026 में सामान्य महंगाई दर का अनुमान करीब 4.1 प्रतिशत है. इसका स्पष्ट अर्थ है कि मेडिकल खर्च सामान्य महंगाई के मुकाबले लगभग ढाई गुना तेजी से बढ़ रहा है. महंगी मेडिकल टेक्नोलॉजी, स्पेशलिटी दवाएं और बायोलॉजिक्स, बढ़ती क्रॉनिक बीमारियां, अस्पतालों में इलाज का बढ़ता उपयोग और विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी मेडिकल खर्चों में हो रही इस बढ़ोतरी के प्रमुख कारण हैं.
बीमा विनियामक IRDAI के वित्तीय वर्ष 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार, जनरल और हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों ने कुल मिलाकर करीब 2.69 करोड़ हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम का निपटारा किया. इन दावों के तहत कुल ₹83,493 करोड़ का भुगतान किया गया. लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि कुल दावों में से करीब 11 प्रतिशत क्लेम खारिज (Repudiate) कर दिए गए, जबकि 6 प्रतिशत क्लेम 31 मार्च 2024 तक लंबित (Pending) थे. सरल शब्दों में कहें तो हर 100 में से औसतन 83 क्लेम का निपटारा हुआ, 11 खारिज हुए और 6 क्लेम प्रक्रिया में लंबित रहे.
हेल्थ इंश्योरेंस में सबसे बड़ी परेशानी क्लेम के दौरान काटी जाने वाली रकम को लेकर है. FY 2023-24 के दौरान करीब ₹26,000 करोड़ के हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम या तो डिसअलो (आंशिक कटौती) किए गए या फिर सीधे तौर पर रिप्यूडियेट (पूरी तरह खारिज) कर दिए गए. यह आंकड़ा पिछले वित्तीय वर्ष (FY 2022-23) के ₹21,861 करोड़ के मुकाबले लगभग 19.1 प्रतिशत अधिक है. आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में लगभग ₹15,100 करोड़ के क्लेम डिसअलो हुए, जबकि करीब ₹10,937 करोड़ के क्लेम पूरी तरह खारिज किए गए.
यद्यपि बीमा कंपनियां क्लेम सेटलमेंट रेशियो (CSR) को अपनी विश्वसनीयता का सबसे बड़ा पैमाना बताती हैं, लेकिन केवल इसी आधार पर पॉलिसी चुनना पर्याप्त नहीं है. स्टैंडअलोन हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों (Standalone Health Insurers) के लिए 2023-24 में तीन महीने के भीतर क्लेम सेटलमेंट का राष्ट्रीय औसत लगभग 88.55 प्रतिशत दर्ज किया गया. अलग-अलग कंपनियों के प्रदर्शन में काफी अंतर देखने को मिलता है.
इलाज के लगातार बढ़ते खर्च को लेकर चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि नीतिगत स्तर पर बदलाव की जरूरत है. दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. अजय लेखी के अनुसार, महंगी दवाइयों और आधुनिक इलाज की बढ़ती कीमतों पर सरकारों को गंभीरता से ध्यान देना चाहिए. विशेष रूप से जीवन रक्षक दवाओं पर लगने वाले टैक्स और नीतियों की तत्काल समीक्षा जरूरी है.
वहीं, क्लेम में होने वाली अनावश्यक कटौतियों पर दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन के सदस्य डॉ. मुकेश गुप्ता का कहना है कि कई बार मरीजों को गंभीर बीमारी के इलाज के तनाव के साथ-साथ बीमा कंपनियों की जटिल शर्तों और कटौतियों से जूझना पड़ता है. नियमित और भारी प्रीमियम भरने के बाद भी यदि मरीज को बिल का एक बड़ा हिस्सा अपनी जेब से देना पड़े, तो बीमा सुरक्षा की उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
अस्पतालों में भर्ती मरीजों और उनके तीमारदारों की व्यावहारिक शिकायतें बताती हैं कि पॉलिसी खरीदते समय जो प्रक्रिया आसान दिखती है, अस्पताल के काउंटर पर बिलिंग के वक्त उसकी असली तस्वीर सामने आती है. तीमारदार रजनीश शर्मा के अनुसार, पॉलिसी लेते समय कवरेज और कैशलेस क्लेम की बातें बहुत सरल समझाई जाती हैं, लेकिन डिस्चार्ज के समय कई हिडन क्लॉज, को-पेमेंट और गैर-चिकित्सीय मदों के नाम पर कटौतियां थोप दी जाती हैं.
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देश में मेडिकल महंगाई की रफ्तार सामान्य महंगाई से ढाई गुना तेज होने के चलते हेल्थ इंश्योरेंस लेना बेहद जरूरी हो चुका है. लेकिन बीमा की असली उपयोगिता केवल समय पर प्रीमियम भरने में नहीं, बल्कि आपात स्थिति में पूरा और पारदर्शी क्लेम मिलने में है. इसलिए पॉलिसी चुनते समय केवल सेटलमेंट का प्रतिशत न देखें, बल्कि यह भी बारीकी से समझें कि किन शर्तों, किन बीमारियों और कितनी कटौती के नियमों के तहत क्लेम का भुगतान किया जाएगा.
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