ईसाई धर्म में आज का दिन यानी ‘गुड फ्राइडे’ (Good Friday) गहरे शोक और परम श्रद्धा का प्रतीक है. लगभग दो हजार साल पहले इसी शुक्रवार को ईसा मसीह (Jesus Christ) को सूली पर चढ़ाया गया था. लेकिन दुनिया के मन में हमेशा यह सवाल उठता है कि जिस दिन ईसा मसीह को इतनी क्रूरता से मृत्युदंड दिया गया, उस ‘काले दिन’ को ‘गुड’ यानी अच्छा क्यों कहा जाता है? इसके पीछे छिपी है अटूट विश्वास और बलिदान की एक ऐसी कहानी, जो एक दुखद घटना को पूरी मानवता के लिए ‘वरदान’ बना देती है.
इस दिन (Good Friday) को ‘गुड’ कहे जाने के पीछे दो मुख्य तर्क हैं. पहला तर्क भाषाई है इसके अनुसार, प्राचीन अंग्रेजी में ‘गुड’ शब्द का प्रयोग अक्सर ‘पवित्र’ (Holy) के अर्थ में किया जाता था, जैसे हम ‘गॉड’ (God) का संदर्भ लेते हैं. वहीं दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण इसका धार्मिक माना जाता है.
दरअसल ईसाई मान्यताओं के अनुसार ईसा मसीह ने खुद कष्ट सहकर पूरी मानवता के पापों का प्रायश्चित किया. उन्होंने सूली पर चढ़ते वक्त भी अपने दुश्मनों को क्षमा किया, जो ईश्वर के असीम प्रेम का प्रतीक बना. इसी ‘पवित्रता’ और ‘कल्याण’ की वजह से इसे ‘गुड फ्राइडे’ का नाम मिला.
बाइबिल के अनुसार, ईसा मसीह ने जब यरूशलेम में प्रेम और भाईचारे का प्रसार शुरू किया, तो वहां के कट्टरपंथियों और शासकों को अपनी सत्ता डगमगाती दिखी. उन पर राजद्रोह का झूठा आरोप लगाया गया और बंदी बना लिया गया. उन्हें अपमानित करने के लिए कांटों का ताज पहनाया गया, कोड़ों से पीटा गया और अंततः भारी क्रूस उठाकर गोलगोथा की पहाड़ी तक ले जाने पर मजबूर किया गया. दोपहर के वक्त जब उन्हें कीलों से ठोककर सूली पर चढ़ाया गया, तो वह नजारा किसी भी इंसान के लिए ‘बैड फ्राइडे’ जैसा ही था.
धार्मिक दृष्टिकोण से ईसा मसीह की मृत्यु को एक ‘अच्छी घटना’ इसलिए माना जाता है क्योंकि इसके बिना ‘ईस्टर’ (Easter) संभव नहीं होता. मान्यता है कि सूली पर चढ़ने के तीसरे दिन ईसा मसीह फिर से जीवित हो उठे थे. उनके बलिदान ने यह साबित किया कि मृत्यु अंत नहीं है, बल्कि सत्य और प्रेम की जीत शाश्वत है. यदि वह शुक्रवार को अपना बलिदान न देते, तो मानवता को पुनर्जन्म और पापों से मुक्ति का मार्ग नहीं मिलता. यही वजह है कि ईसाई समुदाय इसे शोक के साथ-साथ कृतज्ञता के दिन के रूप में मनाता है.
गुड फ्राइडे के दिन चर्चों में घंटी नहीं बजाई जाती और न ही कोई उत्सव होता है. लोग काले कपड़े पहनकर ईसा मसीह के अंतिम सात शब्दों का स्मरण करते हैं और दोपहर 3 बजे (उनकी मृत्यु का समय) विशेष प्रार्थना सभाएं आयोजित की जाती हैं.
यह दिन हमें याद दिलाता है कि बुराई कितनी भी ताकतवर क्यों न हो, क्षमा और बलिदान का मार्ग ही अंततः संसार का उद्धार करता है. दुनिया भर के चर्चों में आज सन्नाटा है, लेकिन यह सन्नाटा ईसा मसीह के उस महान बलिदान की गूंज है जिसने सदियों पहले एक ‘बुरी’ दोपहर को ‘पवित्र’ शुक्रवार में बदल दिया था.
Also Follow Bharat Express on Youtube
-भारत एक्सप्रेस
Ishwar Chandra Vidyasagar Biography: ईश्वरचंद्र विद्यासागर भारत के महान समाज सुधारक, शिक्षाविद और दया के…
Kerala Wellness Tourism: केरल में आयुर्वेद, योग, मेडिटेशन और प्राकृतिक वातावरण के कारण वेलनेस टूरिज्म…
Chhath Special Trains 2026: दिवाली और छठ पूजा 2026 के अवसर पर पूर्व मध्य रेल…
Bill Gates On AI Risks: माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स ने एक हालिया साक्षात्कार में…
Three Language Policy: सीबीएसई की तीन-भाषा नीति में बदलाव और नौवीं कक्षा की एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तकों…
Pitra Paksha 2026: पितृ पक्ष 2026 की शुरुआत 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध से होगी,…