Guru Nanak Jayanti 2025: देशभर में आज यानी 5 नवंबर को सिख धर्म के पहले गुरु और संस्थापक गुरु नानक देव जी का प्रकाश पर्व बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है. पंजाब से लेकर दिल्ली, हरियाणा और देश के अन्य हिस्सों में गुरुद्वारों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है. हर कोई गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं और उनके उपदेशों को याद कर रहा है.
हर साल कार्तिक पूर्णिमा के दिन गुरु नानक जयंती मनाई जाती है. इस दिन को गुरु पर्व भी कहा जाता है. गुरु नानक देव जी ने पूरी जिंदगी समानता, निस्वार्थ सेवा, प्रेम और विनम्रता का संदेश दिया. उन्होंने सिखाया कि ईश्वर एक है और हर इंसान को बिना भेदभाव के एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए.
गुरु नानक देव जी का जन्म 15 अप्रैल 1469 को वर्तमान पाकिस्तान के तलवंडी (ननकाना साहिब) में हुआ था. इस साल उनकी 556वीं जयंती मनाई जा रही है.
पाकिस्तान के राय भोई दी तलवंडी, जिसे आज ननकाना साहिब कहा जाता है, वही स्थान है जहां गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ था. यही वजह है कि यह स्थान सिखों के सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक माना जाता है. यहां नौ ऐतिहासिक गुरुद्वारे बने हैं, और गुरु पर्व के मौके पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं. हर साल इस दिन भव्य नगर कीर्तन और शोभायात्राएं निकाली जाती हैं.
गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन के अंतिम 18 साल करतारपुर में बिताए थे. कहा जाता है कि यहीं उन्होंने अपने अंतिम उपदेश दिए और यहीं उनकी समाधि बनी. 1522 में यहां गुरुद्वारा दरबार साहिब की स्थापना की गई. यह पाकिस्तान के नारोवाल जिले में है और भारत के डेरा बाबा नानक से महज चार किलोमीटर दूर स्थित है. खास बात यह है कि भारत से श्रद्धालु करतारपुर कॉरिडोर के जरिए बिना वीजा के यहां दर्शन करने जा सकते हैं.
पंजाब के सुल्तानपुर लोधी में स्थित गुरुद्वारा बेर साहिब का भी खास महत्व है. कहा जाता है कि यहीं एक बेर के पेड़ के नीचे गुरु नानक देव जी ध्यान लगाया करते थे. यही वह जगह है जहां उन्होंने कहा था– “ना कोई हिंदू, ना कोई मुसलमान” जो उनके समानता के संदेश की झलक देता है.
लद्दाख में स्थित गुरुद्वारा पत्थर साहिब गुरु नानक देव जी की यात्राओं की याद दिलाता है. लेह-कारगिल मार्ग पर समुद्र तल से 12,000 फीट की ऊंचाई पर बना यह गुरुद्वारा 1517 में उनकी लद्दाख यात्रा की स्मृति में बनाया गया था. यहां स्थानीय लोग गुरु नानक को ‘गुरु गोपका महाराज’ के रूप में पूजते हैं.
उत्तराखंड के चंपावत जिले में स्थित गुरुद्वारा रीठा साहिब भी गुरु नानक देव जी से जुड़ा है. कहा जाता है कि जब गुरु जी अपने साथी भाई मर्दाना के साथ यहां पहुंचे, तो उन्होंने रीठे के पेड़ के नीचे विश्राम किया. उस समय उन्होंने जो रीठा खाया, वह चमत्कारिक रूप से मीठा निकला. आज भी उस पेड़ को श्रद्धालु पवित्र मानते हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
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