दशाश्वमेध घाट प्रयागराज
Sawan 2025: तीर्थराज प्रयागराज में दशाश्वमेध घाट का काफी महत्व है. ब्रह्मा जी ने यहीं पर सृष्टि का पहला यज्ञ किया था. कांवड़िए यहां से गंगा जल लेकर काशी विश्वनाथ या अन्य शिवालयों में जाते हैं. इस वर्ष सावन माह में कांवड़ यात्रा 9 जुलाई से 9 अगस्त तक चलेगी. दशाश्वमेध घाट पर ब्रह्माजी ने सृष्टि का पहला यज्ञ किया था. यहां पर उन्होंने एक शिवलिंग की स्थापना भी की थी.
सावन शुरू होते ही दशाश्वमेध घाट पर शिव भक्ति का अदभुत नजारा देखने को मिल रहा है. बाबा भोलेनाथ की भक्ति में डूबे हुए हैं. कांवड़िए गंगा में स्नान कर अपने कांवड़ में गंगा जल भर रहे हैं. बोल बंब के जयकारों के साथ कांवड़ियों में खासा उत्साह देखा जा रहा है. यहां काफी दूर दूर से कांवड़िए आ रहे हैं. इनमें अपार शिव भक्ति देखी जा रही है. मान्यता है कि सावन के महीने में गंगाजल से शिवलिंग का अभिषेक करने से पुण्य लाभ की प्राप्ति होती है. कावड़िए भी बहुत मेहनत के साथ कांवड़ में दूर दूर शिवालयों में जाते हैं. ये पूरी भक्ति के साथ शिवलिंग में गंगा जल से अभिषेक करते हैं. कांवड़ियो के दशाश्वमेध घाट पर स्नान करने और ब्रह्माजी के स्थापित शिवलिंग की पूजा अर्चना से सभी कष्ट दूर होते हैं.
ब्रह्माजी ने गंगा के दशाश्वमेध घाट पर सृष्टि का पहला यज्ञ किया था. इसका उल्लेख पुराणों में भी मिलता है. सृष्टि का प्रथम यज्ञ स्थल होने के कारण प्रयाग नाम पड़ा. भगवान ब्रह्मा ने यज्ञ के बाद यहां एक शिवलिंग की स्थापना भी की थी जो आज भी मौजूद है. कहते है ब्रह्मा जी ने यहां 10 यज्ञ किए. धर्मराज युधिष्ठिर ने भी अपनी पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए 10 यज्ञ किए थे. इन्हीं यज्ञों के कारण इस घाट का नाम दशाश्वमेध पड़ा. प्रयागराज का दशाश्वमेध घाट संगम घाट से काफी नजदीक है. कुंभ और माघ मेले में आने वाल तीर्थयात्री दशाश्वमेध मंदिर में बाबा भोलेनाथ का दर्शन जरूर करते है.
कई धार्मिक पुस्तकों के अनुसार कांवड़ यात्रा भगवान परशुराम ने शुरू की. मान्यता है कि उन्होंने गणमुक्तेश्वर में गंगा स्नान कर कांवड़ में गंगा जल भरा. इसके बाद वह कांवड़ को कंधे पर रखकर बागपत स्थित पुरा महादेव मंदिर पहुंचे. यहीं शिवलिंग पर जलाभिषेक किया.
वहीं कई पुस्तकों में पहले कांवड़िए के रूप में श्रवण कुमार का नाम भी आता है. कहा जाता है कि त्रेता युग में श्रवण कुमार अपने नेत्रहीन माता पिता को कावंड में बैठाकर तीर्थ यात्रा करवाई थी. श्रवण कुमार अपने माता पिता को हरिद्वार लेकर गए. उनको गंगा स्नान कराया. वापस जाते समय गंगा जल भरकर ले गए. इसी गंगा जल से शिवलिंग का अभिषेक किया. इस कारण उन्हें पहली कांवड़ यात्रा शुरू करने का जनक माना गया.
पहले कांवड़ यात्रा को शुरू करने को लेकर रावण का नाम भी आता है. इन सबके बावजूद भगवान परशुराम जी को ही अधिकतर लोग पहले कांवड़िए के रूप में मानते हैं.
विभिन्न राज्यों की पुलिस ने कावड़ यात्रा को लेकर विशेष इंतजाम कर रखे हैं. यूपी उत्तराखंड की बात करें तो प्रयागराज से वाराणसी मार्गों पर कांवड़ यात्रा तक वाहनों का रुट डाइवर्जन किया है. आने जाने वाले रास्ते में एक तरफ का रास्ता वाहनों के लिए पूरी तरह बंद कर दिया है. उस रास्ते को कांवड़ियों के लिए कर दिया गया है. वाराणसी जाने वाले मार्गों पर कांवड़ियों की काफी भीड़ है. इसीलिए पुलिस को 24घंटे अलर्ट मोड पर रहना पड़ रहा है. उत्तराखंड में हरिद्वार में कांवड़ियों का सैलाब सा आ गया है. हरिद्वार की हरकी पौड़ी पर सावन माह में अब तक लाखों कांवड़िए गंगा जल लेकर जा चुके हैं. हरिद्वार जिले में वाहनों के प्रवेश पर पूरी तरीके से पाबंदी लगा दी गई है. यहां यात्रा पर आने वाले तीर्थ यात्रियों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. इन दिनों हरिद्वार में कई-कई किलोमीटर के जाम की समस्या आम हो चुकी है. पुलिस के लिए सावन माह काफी चुनौती भरा है.
–भारत एक्सप्रेस
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