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Radha Ashtami Special: गोलोक धाम से पृथ्वी पर कैसे मानव देह में अवतरित हुईं श्री राधा, ब्रह्मवैवर्त पुराण की ये कथा पढ़कर समझिए

Radha Ashtami Special: ब्रजमंडल सहित पूरे देश में राधाष्टमी का पावन पर्व बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है. देवी राधा, जिन्हें भगवान श्रीकृष्ण की ह्लादिनी शक्ति और साक्षात प्राणस्वरूप माना जाता है, उनका पृथ्वी पर अवतरण कैसे हुआ? इस विषय में विभिन्न पुराणों में कई कथाएं मिलती हैं.

आमतौर पर लोग जानते हैं कि राधा जी का प्राकट्य बरसाना (या रावल गांव) में राजा वृषभानु के यहां हुआ था. लेकिन क्या आप जानते हैं कि साक्षात गोलोक की स्वामिनी को पृथ्वी पर एक साधारण मानव देह में क्यों आना पड़ा और क्यों उन्हें श्रीकृष्ण से वर्षों का विरह सहना पड़ा? ब्रह्मवैवर्त पुराण में दर्ज गोलोक धाम के एक गुप्त श्राप की यह कहानी इस परम रहस्य से पर्दा उठाती है.

गोलोक धाम का वो विवाद, जिसने बदल दी सृष्टि की रूपरेखा

ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खंड और कृष्णजन्म खंड के अनुसार, यह पूरी घटना सृष्टि के प्रारंभ की है. गोलोक धाम में भगवान श्रीकृष्ण और राधा जी दिव्य रासमंडल में निवास करते थे. एक बार देवी राधा की अनुपस्थिति में श्रीकृष्ण अपनी एक अन्य सखी ‘विराजा’ के साथ विहार कर रहे थे.

जब राधा जी को इस बात की सूचना मिली, तो वे अत्यंत क्रोधित हो गईं. वे तुरंत उस स्थान पर पहुंचे. राधा जी के उग्र और क्रोधित रूप को देखकर श्रीकृष्ण वहां से अंतर्ध्यान हो गए. लेकिन वहां उपस्थित श्रीकृष्ण के परम मित्र, पार्षद और गोप श्रीदामा को राधा जी का यह व्यवहार उचित नहीं लगा. उन्होंने कृष्ण के सम्मान में राधा जी के सामने खड़े होकर प्रतिवाद किया और बहस करने लगे.

जब क्रोधित राधा जी ने श्रीदामा को दिया श्राप

श्रीदामा द्वारा भगवान कृष्ण का पक्ष लेते देख राधा जी का क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया. उन्होंने श्रीदामा को मर्यादा का उल्लंघन करने के आरोप में डांटते हुए कहा:

गच्छ त्वं राधके कोपान्मत्समक्षं स्थातुमर्हसि।
यथा कृष्णस्तथा त्वं च निर्भया निर्गुणा सती॥

अर्थ: राधा जी ने अत्यंत क्रोध में आकर श्रीदामा से कहा कि तुम मेरे सामने ठहरने के योग्य नहीं हो, यहां से चले जाओ. जैसे तुम्हारे कृष्ण निर्भय और मर्यादा से परे होकर आचरण कर रहे हैं, वैसे ही तुम भी उनके प्रभाव में आकर निर्भीक हो रहे हो.

इसके बाद क्रोध में आकर राधा जी ने श्रीदामा को गोलोक से निष्कासित होने और असुर योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया:

असुरो भव मूढेति गोलोकाद्याहि मानवम्।
मच्छापेन न संदेहो दानवेन्द्रो भविष्यसि॥

अर्थ: ‘हे मूढ़! तुम इसी क्षण गोलोक से गिरकर मानव लोक (पृथ्वी) में जाओ और असुर बनो. मेरे इस श्राप से तुम निश्चित ही दानवों के राजा बनोगे.’

(बता दें कि इसी श्राप के कारण अगले जन्म में श्रीदामा ‘शंखचूड़’ नामक महाप्रतापी राक्षस बने थे, जिसका वध बाद में भगवान शिव ने किया).

देवी राधा को मिला पृथ्वी पर 100 वर्ष के विरह का श्राप

श्रीदामा भगवान के परम भक्त और गोलोक के प्रतिष्ठित गोप थे. उन्होंने जब देखा कि राधा जी एक मानवीय स्वभाव की तरह अत्यधिक क्रोध में आकर विवेक खो बैठी हैं, तो उन्होंने भी पलटकर राधा जी को श्राप दे दिया:

मानुषी भव गोपी त्वं मच्छापेन महीं गतः।
तत्र त्वं कृष्णविच्छेदं प्राप्स्यसि शतवार्षिकम्॥

अर्थ: श्रीदामा ने कहा- ‘हे गोपी! तुम भी मेरे श्राप से पृथ्वी लोक पर जाओ और एक मानुषी (मानव स्त्री) के रूप में जन्म लो. वहां तुम्हें अपने प्राणप्रिय श्रीकृष्ण से 100 वर्षों का दीर्घ विरह सहन करना पड़ेगा.’

देवी राधा का रुदन और श्रीकृष्ण की सांत्वना

श्राप मिलने के बाद जब राधा जी का क्रोध शांत हुआ, तो वे श्रीकृष्ण से अलग होने की कल्पना मात्र से व्याकुल होकर रोने लगीं. तब स्वयं भगवान श्रीकृष्ण वहां प्रकट हुए और उन्होंने राधा जी को गले से लगाते हुए समझाया कि यह कोई साधारण घटना नहीं, बल्कि एक पूर्व-निर्धारित दैवीय लीला है.

श्रीकृष्ण ने राधा जी को सांत्वना देते हुए कहा:

याहि त्वं भारते वर्षे कीर्तिगेहे च राधिके।
वृषभानुसुता भूत्वा मम प्राणाधिका सती॥

अर्थ: श्रीकृष्ण ने कहा- ‘हे राधिके! तुम भारतवर्ष में जाओ और देवी कीर्ति के गर्भ से प्रकट हो. वहां तुम राजा वृषभानु की पुत्री कहलाओगी और पृथ्वी पर भी तुम मुझे मेरी प्राणों से प्रिय रहोगी.’

विरह के पीछे छिपा था लोक-कल्याण का उद्देश्य

श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि पृथ्वी का भार हरने, कंस जैसे असुरों का संहार करने और भूलोक के मनुष्यों को ‘प्रेम रस’ की पराकाष्ठा सिखाने के लिए हम दोनों का पृथ्वी पर अवतरित होना अनिवार्य था. श्रीदामा का श्राप तो केवल एक माध्यम बना.

यही कारण था कि राधा जी अयोनिजा रूप में बरसाना में राजा वृषभानु के यहां प्रकट हुईं. पृथ्वी पर रहते हुए भी उन्होंने श्रीकृष्ण से अटूट और निश्छल प्रेम किया. पुराणों के अनुसार, जब कंस वध के बाद कृष्ण मथुरा चले गए, तब से लेकर अगले 100 वर्षों तक दोनों का विरह बना रहा. बाद में कुरुक्षेत्र में सूर्य ग्रहण के मेले के दौरान दोनों का पुनः मिलन हुआ और श्राप की अवधि समाप्त होने के बाद राधा जी श्रीकृष्ण के साथ पुनः अपने मूल गोलोक धाम वापस पधारीं.

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-भारत एक्सप्रेस

Vijay Ram

'भारत एक्सप्रेस' में चीफ सब एडिटर। न्‍यूज वेबसाइट पर एवरग्रीन स्‍टोरीज, क्रिएटिव/स्‍पेशल प्रजेंटेशन, हाइलाइट्स के अगुआ। संस्‍था के शुरुआती दौर से दिन-रात हर मौके पर दम-दिमाग झोंककर स्वयं को तपाया। अब तक 8,000 से ज्‍यादा पोस्ट्स पब्लिश कर चुके, 1K+ बाइलाइन हुईं। 'भारत एक्सप्रेस' के CMD एवं एडिटर-इन-चीफ उपेन्द्र राय जी के प्रोग्राम्स (कॉन्क्लेव), और आर्टिकल्‍स को Bharatexpress.com पर प्रमुखता से कवर करते हैं। जर्नलिज्‍म में इनके 10+ वर्ष बीते। यहां से पहले एबीपी इंटरनेशनल, वनइंडिया हिंदी, राजस्‍थान पत्रिका और भास्कर ग्रुप में सेवा दे चुके। देश-विदेश, सैन्य-रणनीति, स्पेस साइंस, ऑफबीट, धर्म-अध्यात्म की खबरों में रुचि।

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