Who is Salabega bhakat of Jagannath
Jagannath Rath Yatra: ओडिशा के पुरी में निकलने वाली भगवान जगन्नाथ की विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सामाजिक सौहार्द का भी प्रतीक मानी जाती है. हर साल लाखों श्रद्धालु इस भव्य यात्रा के दर्शन के लिए देश-विदेश से पुरी पहुंचते हैं. रथयात्रा से जुड़ी कई ऐसी मान्यताएं हैं जो लोगों की आस्था को और गहरा करती हैं. इन्हीं में सबसे चर्चित कथा भक्त सालबेग की है, जिनकी मजार के सामने आज भी भगवान जगन्नाथ का रथ कुछ समय के लिए रुकने की परंपरा निभाई जाती है.
लोकमान्यताओं के अनुसार, एक बार भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथ पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर की ओर जा रहे थे. चारों ओर श्रद्धालुओं की भीड़ थी और “जय जगन्नाथ” के जयकारों से गूंज रहा था. इसी दौरान यात्रा के बीच अचानक रथ एक स्थान पर आकर रुक गया.
रथ को आगे बढ़ाने के लिए श्रद्धालुओं ने पूरी ताकत लगा दी, लेकिन वह अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ. लोग हैरान थे कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है. तभी वहां मौजूद एक बुजुर्ग ने लोगों का ध्यान पास में स्थित भक्त सालबेग की समाधि की ओर दिलाया. इसके बाद श्रद्धालुओं ने भगवान जगन्नाथ के जयकारे के साथ “जय भक्त सालबेग” का उद्घोष किया. मान्यता है कि जैसे ही यह जयघोष हुआ, रथ अपने आप आगे बढ़ने लगा. तभी से यह विश्वास और मजबूत हो गया कि भगवान अपने परम भक्त को सम्मान देने के लिए हर वर्ष उनकी समाधि के सामने अवश्य रुकते हैं.
भक्त सालबेग का जीवन मुगलकाल से जुड़ा माना जाता है. लोककथाओं के अनुसार उनके पिता मुस्लिम थे, जबकि उनकी माता हिंदू थीं. एक युद्ध के दौरान सालबेग गंभीर रूप से घायल हो गए थे. उस कठिन समय में उनकी माता ने उन्हें भगवान जगन्नाथ की शरण लेने की सलाह दी. माता से भगवान की महिमा सुनने के बाद उनके मन में ऐसी भक्ति जागी कि उन्होंने अपना जीवन प्रभु की आराधना को समर्पित कर दिया.
जब वे पुरी पहुंचे, तब उस समय की परंपराओं के कारण उन्हें जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं मिल सकी. लेकिन इससे उनकी श्रद्धा कम नहीं हुई. उन्होंने मंदिर के बाहर रहकर भगवान जगन्नाथ के भजन गाना और उनका स्मरण करना जारी रखा. समय के साथ उनकी भक्ति इतनी प्रसिद्ध हुई कि वे भगवान जगन्नाथ के सबसे बड़े भक्तों में गिने जाने लगे. उनके रचे भजन आज भी ओडिशा में बड़े श्रद्धा भाव से गाए जाते हैं.
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लोकविश्वास के मुताबिक, जीवन के अंतिम दिनों में सालबेग की सबसे बड़ी इच्छा भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने की थी. कहा जाता है कि भगवान ने अपने इस अनन्य भक्त की भावना का सम्मान करते हुए यह आशीर्वाद दिया कि भविष्य में उनकी रथयात्रा सालबेग के स्थान पर रुके बिना आगे नहीं बढ़ेगी.
इसी मान्यता के कारण आज भी पुरी की रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ का रथ सालबेग की समाधि के सामने कुछ समय के लिए ठहरता है. यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि ईश्वर के लिए किसी व्यक्ति की जाति, धर्म या जन्म से अधिक महत्व उसकी सच्ची श्रद्धा, समर्पण और निष्कलंक भक्ति का होता है. यही वजह है कि भक्त सालबेग की कहानी आज भी जगन्नाथ संस्कृति का एक महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक अध्याय मानी जाती है.
-भारत एक्सप्रेस
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