इलाहाबाद हाईकोर्ट ( Allahabad High Court ) ने कहा है कि प्रशासनिक कानूनी सिद्धांत है कि किसी कार्य को प्राधिकारी द्वारा विशेष तरीके से करने का विधान हो तो वह कार्य उसी तरीके से किया जाना चाहिए.
कोर्ट ने विभागीय जांच अधिकारी द्वारा याची को आरोपों का दोषी करार देते हुए बर्खास्त करने की संस्तुति करने और इसी आधार पर कर्मचारी को बर्खास्त किये जाने को कानूनी प्रक्रिया के विपरीत माना और 14 अप्रैल 23 की जांच रिपोर्ट व 11 दिसंबर 23 का बर्खास्तगी आदेश अवैध करार देते हुए रद कर दिया है. और याची को बर्खास्तगी के समय की सेवा स्थिति बहाल करने का निर्देश दिया है.
कोर्ट ने कहा कि यदि विभाग चाहे तो नियमानुसार तीन माह में नये सिरे से जांच कार्यवाही कर सकता है. यह आदेश न्यायमूर्ति अजित कुमार की एकलपीठ ने बरेली के पुलिस सिपाही तौफीक अहमद की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है.
मालूम हो कि याची के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए जांच अधिकारी नियुक्त किया गया. उसने अपनी रिपोर्ट में याची को दोषी करार दिया. साथ ही बर्खास्त करने की संस्तुति भी कर दी.
कोर्ट ने कहा जांच रिपोर्ट के आधार पर सक्षम प्राधिकारी ने कारण बताओ नोटिस के बाद बर्खास्त कर दिया. अपने स्वतंत्र विवेक का आदेश पारित करते समय इस्तेमाल नहीं किया.
याची ने जांच अधिकारी की दंड की संस्तुति की अधिकारिता पर सवाल उठाया. कहा यूपी पुलिस अधीनस्थ रैंक कर्मचारी (दंड एवं अपील ) नियमावली 1991 के नियम 14(1) के अंतर्गत जांच अधिकारी को दंड की संस्तुति करने का अधिकार नहीं है. याची ने बलबीर सिंह केस का भी हवाला दिया. प्राधिकारी को ऐसी रिपोर्ट अस्वीकार करनी चाहिए थी. इसलिए याची की रिपोर्ट की संस्तुति पर की गई बर्खास्तगी अवैध है. रद किया जाए.
-भारत एक्सप्रेस
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