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एक हिंसक घटना जिसने गांधी के अहिंसा आंदोलन रोकने पर मजबूर कर दिया

आज चौरी चौरा कांड की 104वीं वर्षगांठ है. यह घटना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में जानी जाती है, जहां अहिंसक आंदोलन की सीमाओं और जन आक्रोश की तीव्रता का संगम हुआ. चौरी चौरा, उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में स्थित एक छोटा-सा कस्बा, 4 फरवरी 1922 को हिंसा की लपटों में घिर गया था. इस कांड ने महात्मा गांधी को असहयोग आंदोलन को अचानक समाप्त करने के लिए मजबूर कर दिया, जिससे स्वतंत्रता संग्राम की दिशा बदल गई.

ऐतिहासिक संदर्भ

1920 के दशक की शुरुआत में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन की शुरुआत की थी, जो ब्रिटिश शासन के खिलाफ अहिंसक प्रतिरोध का एक व्यापक अभियान था. यह आंदोलन देशभर में फैल चुका था, और किसान, मजदूर तथा आम जनता इसमें सक्रिय रूप से शामिल हो रही थी. चौरी चौरा में स्थानीय किसानों और स्वयंसेवकों ने बाजार में बढ़ती महंगाई और पुलिस की ज्यादतियों के खिलाफ प्रदर्शन शुरू किया. 4 फरवरी 1922 को, जब प्रदर्शनकारी पुलिस स्टेशन पहुंचे, तो स्थिति बेकाबू हो गई. प्रदर्शनकारियों ने थाने पर हमला कर दिया और उसे आग के हवाले कर दिया, जिसमें 22 पुलिसकर्मी और 3 नागरिक मारे गए.

इस हिंसक घटना ने गांधीजी को गहरा आघात पहुंचाया, क्योंकि यह उनके अहिंसा के सिद्धांत के विपरीत था. परिणामस्वरूप, 12 फरवरी 1922 को उन्होंने पूरे देश में असहयोग आंदोलन को स्थगित कर दिया.

यह कांड न केवल एक स्थानीय विद्रोह था, बल्कि औपनिवेशिक दमन और ग्रामीण असंतोष का प्रतीक बन गया. ब्रिटिश सरकार ने इस घटना के बाद 225 लोगों को गिरफ्तार किया, जिसमें से 19 को फांसी की सजा सुनाई गई. घटना ने दिखाया कि कैसे असहयोग आंदोलन का जन आंदोलन में रूपांतरण हिंसा की ओर मुड़ सकता था.

स्वतंत्रता संग्राम पर प्रभाव

चौरी चौरा कांड ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को गहराई से प्रभावित किया. गांधीजी के निर्णय से कई कांग्रेस नेता निराश हुए, लेकिन इससे आंदोलन में अनुशासन और अहिंसा की महत्वपूर्णता पर जोर पड़ा. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इस घटना ने क्रांतिकारी आंदोलन को प्रेरित किया, जैसे भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे युवाओं को गांधीवादी मार्ग से हटकर नई राह अपनाने के लिए प्रेरित किया. यह कांड राष्ट्रीय स्मृति में एक विरोधाभासी स्थान रखता है—एक ओर यह शहीदों का प्रतीक है, दूसरी ओर हिंसा के कारण आंदोलन की असफलता का. आज चौरी चौरा में शहीद स्मारक स्थापित है, जो इस घटना की स्मृति को जीवित रखता है.

चौरी चौरा कांड पर कई महत्वपूर्ण किताबें लिखी गई हैं, जो घटना को विभिन्न दृष्टिकोणों से विश्लेषित करती हैं.

  • सुभाष चंद्र कुशवाहा की “चौरी चौरा: विद्रोह और स्वाधीनता आंदोलन”: यह पुस्तक 2014 में पेंगुइन बुक्स इंडिया द्वारा प्रकाशित हुई, जो हिंदी में इस घटना पर सबसे विस्तृत और प्रामाणिक रचनाओं में से एक है. लेखक सुभाष चंद्र कुशवाहा ने ब्रिटिशकालीन मूल दस्तावेजों, न्यायिक रिकॉर्ड्स, समाचार पत्रों की रिपोर्ट्स, RTI से प्राप्त सामग्री और स्थानीय निवासियों से बातचीत के आधार पर इसे तैयार किया है. पुस्तक को तीन भागों और 23 अध्यायों में विभाजित किया गया है, जिसमें 12 परिशिष्ट भी शामिल हैं.

लेखक घटना को हिंसा-अहिंसा की बहस से आगे ले जाकर किसान विद्रोह के क्रांतिकारी रूप में प्रस्तुत करते हैं. वे तर्क देते हैं कि यह ब्रिटिश शोषण, अपमान और सामाजिक-आर्थिक अन्याय से थके दलित, गरीब किसानों, मुस्लिम और पिछड़ी जातियों की प्रतिक्रिया थी. पुस्तक में दुमरी खुर्द गांव को केंद्र में रखकर घटना के नेताओं (जैसे नजर अली, लाल मोहम्मद, भगवान अहिर) का विस्तृत वर्णन है. मुकदमे में 225 आरोपियों (जिनमें अधिकांश दलित और पिछड़े थे), 19 को फांसी और बाद में परिवारों की उपेक्षा पर गहन चर्चा है.

कुशवाहा कांग्रेस नेतृत्व और गांधीजी के निर्णय की आलोचना करते हुए इसे बुर्जुआ वर्ग की पीछे हटने की रणनीति मानते हैं, जो विद्रोह की तीव्रता से डर गया था. यह घटना क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा बनी. यह रचना राष्ट्रीय इतिहास में हाशिए पर धकेले गए वर्गों को केंद्र में लाती है और औपनिवेशिक न्याय व्यवस्था की गहन आलोचना करती है. लेखक की बाद की पुस्तक “चौरी चौरा पर औपनिवेशिक न्याय” (Colonial Justice on Chauri Chaura) भी इसी विषय पर आधारित है.

  • शाहिद अमीन की “Event, Metaphor, Memory: Chauri Chaura, 1922-1992”: यह किताब घटना को एक ऐतिहासिक घटना, रूपक और स्मृति के रूप में जांचती है. अमीन ने स्थानीय लोगों की स्मृतियों और आधिकारिक दस्तावेजों का उपयोग कर घटना को सबाल्टर्न इतिहास के नजरिए से पुनर्निर्मित किया है. किताब में दिखाया गया है कि कैसे यह घटना राष्ट्रीय कथा में हाशिए पर धकेल दी गई.

चौरी चौरा कांड हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता संग्राम में हिंसा और अहिंसा के बीच का तनाव कितना जटिल था.

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-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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