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चीन की ‘डेब्ट ट्रैप डिप्लोमेसी’ और अफ्रीका में बंदरगाहों पर बढ़ता प्रभाव

अफ्रीका में चीन की बढ़ती बंदरगाह मौजूदगी ने ‘डेब्ट ट्रैप डिप्लोमेसी’ की बहस तेज कर दी है. निवेश, कर्ज और रणनीतिक नियंत्रण के बीच संप्रभुता पर सवाल खड़े हो रहे हैं.

चीन की वैश्विक महत्वाकांक्षा आज किसी से छिपी नहीं है. उसकी ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) के तहत, चीन ने विकासशील देशों में बड़े पैमाने पर निवेश किया है, खासकर अफ्रीका में. यह निवेश मुख्य रूप से इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स जैसे सड़कें, रेलवे और बंदरगाहों पर केंद्रित है. लेकिन इस प्रक्रिया में एक विवादास्पद पक्ष भी उभरा है – ‘डेब्ट ट्रैप डिप्लोमेसी’. इसके तहत, चीन गरीब देशों को भारी कर्ज देता है और जब वे कर्ज चुकाने में असमर्थ होते हैं, तो वह रणनीतिक संपत्तियों पर कब्जा कर लेता है.

अफ्रीका में चीन की बंदरगाहों पर बढ़ती पकड़ इसी का एक उदाहरण है, जहां कुल 231 वाणिज्यिक बंदरगाहों में से लगभग 78 में चीनी कंपनियां बिल्डर, फाइनेंसर या ऑपरेटर के रूप में शामिल हैं. यह अफ्रीका में चीनी फर्मों की मौजूदगी को एक-तिहाई से अधिक बनाता है, जो वैश्विक व्यापार और सैन्य रणनीति दोनों के लिए महत्वपूर्ण है.

अफ्रीका में चीनी निवेश का पृष्ठभूमि

चीन ने 2000 के दशक से अफ्रीका में अपने पैर पसारने शुरू किए. फोरम ऑन चाइना-अफ्रीका कोऑपरेशन (FOCAC) के माध्यम से, चीन ने अफ्रीकी देशों को सस्ते कर्ज और निवेश की पेशकश की. 2007 से 2020 तक, चीन ने अफ्रीका में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में 23 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक निवेश किया. यह निवेश मुख्य रूप से बंदरगाहों, रेलवे और ऊर्जा क्षेत्रों में हुआ. लेकिन यह ‘डेब्ट ट्रैप’ का हिस्सा है, जहां कर्ज की शर्तें इतनी कड़ी होती हैं कि देश कर्ज नहीं चुका पाते और चीन को रणनीतिक संपत्तियां सौंपनी पड़ती हैं.

उदाहरण के लिए, श्रीलंका का हम्बनटोटा बंदरगाह एक क्लासिक केस है. चीन ने यहां भारी कर्ज दिया, और जब श्रीलंका कर्ज नहीं चुका सका, तो 2017 में बंदरगाह को 99 साल की लीज पर चीनी कंपनी को सौंप दिया गया. यही मॉडल अफ्रीका में दोहराया जा रहा है. हालांकि कुछ विशेषज्ञ इसे मिथक बताते हैं, कहते हैं कि चीन का उद्देश्य सिर्फ आर्थिक विकास है, न कि राजनीतिक नियंत्रण. फिर भी, अफ्रीकी देशों का बढ़ता कर्ज (जैसे जाम्बिया और जिबूती में) चिंता का विषय है.

78 से अधिक बंदरगाहों पर चीनी पकड़

अफ्रीका में कुल 231 वाणिज्यिक बंदरगाह हैं, और चीनी राज्य-स्वामित्व वाली कंपनियां 32 देशों के 78 बंदरगाहों में सक्रिय हैं. यह पश्चिम अफ्रीका में सबसे अधिक केंद्रित है (35 बंदरगाह), उसके बाद पूर्वी अफ्रीका (17), दक्षिणी अफ्रीका (15) और उत्तरी अफ्रीका (11). चीनी कंपनियां जैसे चाइना मर्चेंट्स पोर्ट होल्डिंग्स और चाइना हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी इनमें बिल्डिंग, फाइनेंसिंग और ऑपरेशन का काम संभालती हैं.

कुछ प्रमुख उदाहरण:

  • जिबूती: यहां डोरालेह मल्टीपर्पज पोर्ट का निर्माण चीन ने किया, और यह चीन का पहला विदेशी सैन्य बेस भी है. जिबूती का 70% से अधिक कर्ज चीन के पास है, जिससे ‘डेब्ट ट्रैप’ की आशंका बढ़ती है.
  • केन्या: मोम्बासा पोर्ट पर चीन का बड़ा निवेश है. अगर केन्या कर्ज नहीं चुका पाया, तो पोर्ट पर चीनी नियंत्रण की बात उठी है, हालांकि यह अभी विवादित है.
  • नाइजीरिया: लेक्की डीप सी पोर्ट में चाइना हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी की 54% हिस्सेदारी है, और यह 16 साल की लीज पर ऑपरेट हो रहा है.
  • अंगोला, सूडान, कांगो: इन देशों में भी चीनी निवेश से बने बंदरगाह हैं, जहां कर्ज के बदले संसाधनों (जैसे तेल) का उपयोग होता है.

यह अप्रत्यक्ष कब्जा इसलिए कहा जाता है क्योंकि कई मामलों में चीनी कंपनियां 50% या अधिक हिस्सेदारी रखती हैं, जैसे टोगो के लोमे पोर्ट में 50%. हालांकि, सभी प्रोजेक्ट्स में 99 साल की लीज नहीं है, लेकिन श्रीलंका जैसा मॉडल अफ्रीका में दोहराने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.

लॉजिस्टिक्स, तेल और सैन्य उपयोग

चीन का यह जाल वैश्विक व्यापार पर गहरा असर डालेगा. अफ्रीका से निकलने वाले तेल, खनिज और अन्य संसाधनों का बड़ा हिस्सा इन बंदरगाहों से गुजरता है. समय आने पर, चीन लॉजिस्टिक्स और जल परिवहन को नियंत्रित कर सकता है, जो वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित करेगा. उदाहरण के लिए, अफ्रीका से यूरोप और एशिया जाने वाले जहाजों का रूट इन पोर्ट्स से होकर गुजरता है.

सैन्य दृष्टि से, ये बंदरगाह युद्ध या संकट के समय उपयोगी साबित हो सकते हैं. चीनी नौसेना ने इनमें से 36 बंदरगाहों पर विजिट या मिलिट्री ड्रिल्स की हैं. जिबूती में पहले से ही चीनी बेस है, और अन्य पोर्ट्स को सैन्य उपकरणों की ढुलाई के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. यह ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति का हिस्सा माना जाता है, जहां चीन इंडियन ओशन और अफ्रीकी तटों पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है.

विवाद और चुनौतियां

कई विशेषज्ञ ‘डेब्ट ट्रैप’ को अतिरंजित बताते हैं. एक अध्ययन के अनुसार, चीन के निवेश से अफ्रीका में SDGs (सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स) हासिल करने में मदद मिल रही है, और कोई स्पष्ट डेब्ट ट्रैप नहीं है. लेकिन अमेरिका और पश्चिमी देश इसे ‘नियो-कोलोनियलिज्म’ कहते हैं. अफ्रीकी देशों को सलाह दी जाती है कि वे कर्ज की शर्तों पर सावधानी बरतें और वैकल्पिक फाइनेंसिंग स्रोत तलाशें.

चीन ने अफ्रीका में अपनी चतुर रणनीति से एक मजबूत जाल बिछाया है, जो आर्थिक विकास के साथ-साथ रणनीतिक लाभ भी देता है. 78 से अधिक बंदरगाहों पर उसकी मौजूदगी वैश्विक शक्ति संतुलन को बदल सकती है. लेकिन अफ्रीकी देशों के लिए यह दोधारी तलवार है – विकास की कीमत पर संप्रभुता का खतरा. भविष्य में, अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस पर नजर रखनी होगी ताकि कोई एक देश वैश्विक संसाधनों पर एकाधिकार न कर सके.

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– भारत एक्सप्रेस



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