21 मार्च 1977 का दिन भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है. यह वह तारीख थी जब आपातकाल (Emergency) औपचारिक रूप से समाप्त हुआ और भारत ने दुनिया को दिखाया कि उसकी जनता की इच्छाशक्ति से कोई भी तानाशाही टिक नहीं सकती. 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा घोषित आपातकाल ने 21 महीनों तक देश को अंधेरे में डुबो रखा था. लेकिन जनता ने मतदान के माध्यम से अपनी आवाज बुलंद की और लोकतंत्र को पुनर्जीवित किया.
25 जून 1975 की आधी रात को राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने इंदिरा गांधी की सलाह पर “आंतरिक अशांति” के आधार पर आपातकाल की घोषणा की. इसके तहत मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए. विपक्षी नेताओं को बिना मुकदमे के जेल में डाल दिया गया — शाह आयोग के अनुसार कुल 1,10,806 लोग गिरफ्तार किए गए. प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई; अखबारों को सरकार की मंजूरी के बिना कुछ भी छापने की अनुमति नहीं थी. संजय गांधी के नेतृत्व में जबरन नसबंदी (forced sterilization) अभियान चलाया गया, जिसमें 1975-77 के दौरान 1.07 करोड़ से अधिक लोग नसबंदी के शिकार हुए (जिसमें लाखों मामले जबरदस्ती के थे).
दिल्ली में तुर्कमान गेट जैसे इलाकों में झुग्गी-झोपड़ियों को बुलडोजर से उजाड़ दिया गया, जिससे 1.2 लाख से अधिक लोग बेघर हुए. यह दौर सिर्फ राजनीतिक दमन का नहीं था, बल्कि संविधान और लोकतंत्र की आत्मा पर हमला था. जनता में भय का माहौल था — आधी रात की दस्तक अब महज एक रूपक नहीं, हकीकत बन गई थी.
जनवरी 1977 में इंदिरा गांधी ने अचानक चुनाव की घोषणा की और कई विपक्षी नेताओं को रिहा किया. शायद उन्हें लगा कि जनता डर से दब गई है और कांग्रेस फिर जीतेगी. लेकिन जनता ने जवाब दिया — बैलट बॉक्स से क्रांति.
16 से 20 मार्च 1977 तक हुए आम चुनाव में जनता पार्टी (जो विभिन्न विपक्षी दलों का गठबंधन थी) ने भारी बहुमत हासिल किया. जनता पार्टी और उसके सहयोगियों को 330 सीटें मिलीं (जनता पार्टी को अकेले 295). कांग्रेस को सिर्फ 154 सीटें मिलीं (पहले 350+ थीं).
उत्तर भारत में कांग्रेस का सफाया हो गया. कई हिंदी भाषी राज्यों में एक भी सीट नहीं जीती. 21 मार्च 1977 को आपातकाल औपचारिक रूप से खत्म हुआ और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी सरकार बनी. आजादी के बाद पहली गैर-कांग्रेसी सरकार.
1977 का चुनाव भारत के लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा और सबसे शानदार विजय थी. यह साबित हुआ कि सत्ता कितनी भी मजबूत क्यों न हो, जनता की आवाज अंतिम होती है. लोकतंत्र को चेन में जकड़ा जा सकता है, लेकिन उसकी आत्मा कभी नहीं मरती. भारत जैसे विविध देश में भी एकजुट होकर लोग तानाशाही को उखाड़ फेंक सकते हैं.
आज जब हम 21 मार्च को याद करते हैं, तो सिर्फ इतिहास नहीं पढ़ते एक चेतावनी भी सुनते हैं. लोकतंत्र एक दिन में नहीं खोता, यह तब खोता है जब लोग उसकी कीमत भूल जाते हैं. (21 मार्च 1977) वह दिन जब भारत ने साबित किया कि सबसे अंधेरी रात के बाद भी सूरज निकलता है, और जनता की इच्छा से बड़ा कोई नहीं.
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-भारत एक्सप्रेस
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