भारत की आज़ादी की कहानी सिर्फ 15 अगस्त 1947 तक सीमित नहीं है. इसके पीछे कई ऐसे पड़ाव रहे, जिन्होंने देश को अंग्रेजी शासन से निकलकर लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर बढ़ने का रास्ता दिखाया. इन्हीं महत्वपूर्ण पड़ावों में से एक था 2 सितंबर 1946, जब भारत में अंतरिम सरकार ने कामकाज संभाला.
यह वह दौर था जब ब्रिटिश सरकार धीरे-धीरे भारत की सत्ता भारतीय नेताओं को सौंपने की दिशा में आगे बढ़ रही थी. अंतरिम सरकार का मकसद सिर्फ देश का प्रशासन चलाना नहीं था, बल्कि सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाना भी था. यही सरकार आगे चलकर स्वतंत्र भारत की प्रशासनिक व्यवस्था की बुनियाद तैयार करने में अहम साबित हुई.
दूसरे विश्व युद्ध के खत्म होने के बाद ब्रिटेन पर भारत को लेकर अपना रुख बदलने का दबाव बढ़ रहा था. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गिरफ्तार किए गए कई राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी रिहा किया गया. इसी बीच भारत की सत्ता भारतीय हाथों में देने की प्रक्रिया तेज होने लगी.
अगस्त 1946 में कांग्रेस ने अंतरिम सरकार में शामिल होने का फैसला किया. उद्देश्य साफ था कि अंग्रेजों से भारतीय नेतृत्व तक सत्ता के हस्तांतरण को बिना बड़ी प्रशासनिक रुकावट के आगे बढ़ाया जाए.
इसी समय संविधान सभा के गठन और उसके चुनावों को लेकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच भी सहमति बनाने की कोशिशें चल रही थीं. हालांकि दोनों दलों के बीच राजनीतिक मतभेद लगातार बने हुए थे और आने वाले महीनों में ये मतभेद और गहरे हुए.
2 सितंबर को बनी इस सरकार में कुल 12 सदस्य थे. शुरुआत में इसमें कांग्रेस के प्रतिनिधि शामिल हुए. बाद में मुस्लिम लीग ने भी सरकार में भाग लेने का फैसला किया और उसके पांच सदस्य 6 अक्टूबर 1946 को अंतरिम सरकार में शामिल हुए.
सरकार की व्यवस्था उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए काफी अलग थी. वायसराय इसके शीर्ष पर थे, लेकिन सरकार के वास्तविक कामकाज में भारतीय नेताओं की भूमिका लगातार बढ़ रही थी. जवाहरलाल नेहरू को उपाध्यक्ष बनाया गया और वे व्यवहार में सरकार के प्रमुख के तौर पर काम कर रहे थे.
उस समय लॉर्ड वेवेल भारत के वायसराय थे, जबकि ब्रिटिश भारतीय सेना के कमांडर-इन-चीफ सर क्लॉड ऑकिनलेक थे.
अंतरिम सरकार में जवाहरलाल नेहरू के अलावा सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, जगजीवन राम, शरत चंद्र बोस, आसफ अली और सय्यद अली ज़हीर जैसे प्रमुख नेता शामिल थे.
अंतरिम सरकार का महत्व इस बात में था कि पहली बार भारतीय नेताओं को केंद्र की शासन व्यवस्था चलाने का व्यापक अनुभव मिला. प्रशासन, वित्त, विदेश नीति और दूसरे महत्वपूर्ण सरकारी कामों में भारतीय नेतृत्व की भूमिका पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा हो गई.
सरकार ने विदेशों के साथ भारत के संपर्क और राजनयिक संबंधों की दिशा में भी कदम बढ़ाए. अमेरिका समेत कई देशों के साथ संबंध विकसित करने की प्रक्रिया इसी संक्रमण काल में आगे बढ़ी.
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-भारत एक्सप्रेस
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