दिल्ली स्थित इंडिया हैबिटैट सेंटर के गुलमोहर हॉल में बुधवार शाम एक खास माहौल देखने को मिला. 18वें हैबिटैट फिल्म फेस्टिवल 2026 के तहत आयोजित एक विशेष कार्यक्रम का मौका था , जहां मशहूर दास्तानगो और रंगकर्मी महमूद फ़ारूक़ी की नई किताब ‘दास्तान-ए-गुरुदत्त’ का लोकार्पण किया गया. यह किताब दिग्गज फिल्मकार गुरुदत्त के जीवन और उनके दौर के हिंदी सिनेमा को नए नजरिए से समझने की कोशिश करती है. इसे राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया है.
कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए दास्तानगो पूनम गिरधानी ने इसे सिर्फ एक किताब का लोकार्पण नहीं, बल्कि साहित्य, सिनेमा और दास्तानगोई के मेल का उत्सव बताया. उन्होंने कहा कि यह कृति उस पुरानी परंपरा की याद दिलाती है, जब किताबें पहले सुनी जाती थीं और बाद में छपती थीं. उनके मुताबिक, दास्तान और किताब का यह मेल इस पूरे अनुभव को खास बनाता है.
उन्होंने यह भी कहा कि जब कोई कहानी दास्तानगो के अंदाज में सामने आती है, तो वह सिर्फ पढ़ी नहीं जाती, बल्कि महसूस भी की जाती है.
वरिष्ठ फिल्म समीक्षक जवरीमल पारख ने किताब को हिंदी सिनेमा समझने के लिए बेहद अहम बताया. उनका कहना था कि महमूद फ़ारूक़ी ने गुरुदत्त को किसी महानायक की तरह नहीं, बल्कि एक जटिल, कमजोरियों और विरोधाभासों से भरे इंसान के रूप में दिखाया है. उन्होंने इस बात की सराहना की कि किताब में गुरुदत्त और गीता दत्त के रिश्तों को भी बिना किसी झिझक के ईमानदारी से रखा गया है.
पारख ने प्यासा, कागज़ के फूल और साहब बीवी और गुलाम जैसी फिल्मों का जिक्र करते हुए कहा कि यह किताब सिर्फ एक कलाकार की कहानी नहीं, बल्कि पूरे दौर की सिनेमाई सोच को सामने लाती है.
फिल्म अध्येता इरा भास्कर ने कहा कि किताब पढ़ते हुए वे गुरुदत्त के जीवन और उनकी पीड़ा को बहुत करीब से महसूस कर पाईं. उनके अनुसार लेखक ने भावनात्मक जुड़ाव के बावजूद आलोचनात्मक दूरी बनाए रखी है, जो इस किताब की सबसे बड़ी ताकत है.
उन्होंने गुरुदत्त की तुलना पी.सी. बरुआ और ऋत्विक घटक जैसे फिल्मकारों से करते हुए कहा कि इन कलाकारों के भीतर एक बेचैनी तो थी, लेकिन साथ ही कला के प्रति गहरी निष्ठा भी दिखाई देती है. इरा भास्कर ने कहा कि गुरुदत्त को सिर्फ एक दुखांत चरित्र नहीं, बल्कि एक बेहद संवेदनशील और प्रयोगधर्मी फिल्मकार के रूप में देखा जाना चाहिए.
कवि और समीक्षक प्रियदर्शन ने कहा कि यह किताब सिर्फ जीवनी नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा के एक पूरे दौर का जीवंत दस्तावेज है. उन्होंने कहा कि इसमें न सिर्फ गुरुदत्त का जीवन, बल्कि आज़ादी के बाद बदलता समाज, टूटता स्टूडियो सिस्टम और सिनेमा की नई दिशा भी दिखाई देती है.
सुदीप्ति ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि दास्तान-ए-गुरुदत्त को सुनना और पढ़ना दो अलग लेकिन गहरे अनुभव हैं. उनके मुताबिक, दास्तान सुनते समय जो भावनात्मक असर होता है, वह किताब पढ़ते हुए भी कहीं न कहीं बना रहता है, लेकिन किताब पाठक को इतिहास और सिनेमा की गहराई में ले जाती है.
अंत में महमूद फ़ारूक़ी ने कहा कि उनका मकसद गुरुदत्त के जीवन को किसी रोमांटिक मिथक में बदलना नहीं था, बल्कि उनकी जटिलताओं को ईमानदारी से सामने लाना था. उन्होंने स्वीकार किया कि गुरुदत्त के जीवन में गहरा तनाव और मानसिक थकान थी, जिसे समझना आसान नहीं है.
उन्होंने यह भी कहा कि समय के साथ उनका खुद का नजरिया भी बदला है जहां पहले वे गुरुदत्त की छवि से प्रभावित थे, वहीं बाद में उन्होंने उन्हें ज्यादा मानवीय और आलोचनात्मक नजर से देखना शुरू किया.
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-भारत एक्सप्रेस
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