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‘मैं नहीं, जनता हारती है…’ जानिए कौन थे 280 से ज्यादा चुनाव लड़ने वाले ‘धरतीपकड़’ नागरमल बाजोरिया

बिहार के भागलपुर के रहने वाले नागरमल बाजोरिया अब इस दुनिया में नहीं हैं. चुनावी मैदान में बार-बार उतरने और हार के बावजूद हिम्मत ना छोड़ने के कारण देशभर में ‘धरतीपकड़’ के नाम से मशहूर बाजोरिया का 3 सितंबर को पटना में 97 साल की उम्र में निधन हो गया. करीब पांच दशक से ज्यादा समय तक चुनावी राजनीति के अलग-अलग पड़ावों पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने वाले बाजोरिया का नाम भारतीय चुनावी इतिहास में एक अनोखी मिसाल के तौर पर याद किया जाएगा.

कहा जाता है कि उन्होंने पंचायत और वार्ड चुनाव से लेकर विधानसभा, लोकसभा, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद तक करीब 280 से 284 चुनाव लड़े. चुनावों की इस लंबी सूची में जीत से ज्यादा उनकी पहचान लगातार चुनाव लड़ने के जुनून से बनी. हालांकि उनके चुनावी रिकॉर्ड को लेकर अलग-अलग रिपोर्टों में आंकड़े थोड़े अलग मिलते हैं और कहीं-कहीं स्थानीय चुनाव में जीत का भी उल्लेख है, लेकिन आम तौर पर उनकी कहानी लगातार चुनाव हारने के बावजूद मैदान में डटे रहने वाले उम्मीदवार की रही.

लाहौर में जन्म, भागलपुर को बनाया कर्मभूमि

नागरमल बाजोरिया का जन्म 1930 में अविभाजित भारत के लाहौर में हुआ था. देश के बंटवारे से पहले ही उनका परिवार भागलपुर आकर बस गया था. आगे चलकर भागलपुर ही उनकी पहचान और सामाजिक गतिविधियों का केंद्र बन गया. वे एमपी द्विवेदी रोड के पास देवी बाबू धर्मशाला इलाके में रहते थे.

व्यवसाय की बात करें तो वे कॉस्मेटिक और व्यापार से जुड़े हुए थे. लेकिन आम लोगों के बीच उन्हें पहचान कारोबार से नहीं, बल्कि उनके चुनावी सफर और सामाजिक कामों से मिली.

राष्ट्रपति चुनाव से लेकर दिग्गज नेताओं को चुनौती

उनका चुनावी सफर 1969 में राष्ट्रपति पद के चुनाव से शुरू होने की बात सामने आती है. इसके बाद उन्होंने अलग-अलग चुनावों में देश के बड़े नेताओं के खिलाफ भी पर्चा दाखिल किया.

उन्होंने रायबरेली में इंदिरा गांधी को चुनौती दी तो अमेठी में राजीव गांधी के खिलाफ चुनावी मैदान में उतरे. संजय गांधी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे बड़े नेताओं के सामने भी उन्होंने अपनी उम्मीदवारी पेश की. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ 1997 में लखनऊ से चुनाव लड़ना भी उनके चर्चित मुकाबलों में शामिल रहा. उस समय 100 गधों के काफिले के साथ प्रचार करने की वजह से वे काफी सुर्खियों में आए थे.

2012 में उन्होंने प्रणब मुखर्जी के खिलाफ राष्ट्रपति चुनाव के लिए भी नामांकन दाखिल किया था, हालांकि उनका पर्चा खारिज हो गया. उनका आखिरी चुनाव करीब 2019 के आसपास माना जाता है.

हार को भी उन्होंने अलग नजरिए से देखा

बाजोरिया चुनाव हारने को लेकर भी अपनी अलग सोच रखते थे. उनका एक चर्चित कथन था, “मैं चुनाव नहीं हारता, जनता हार जाती है.”

उनके लिए चुनाव सिर्फ जीतने का जरिया नहीं था. वे मानते थे कि लोकतंत्र में आम आदमी को भी चुनाव लड़ने और अपनी बात रखने का अधिकार है. इसी सोच के चलते वे हर बार नए उत्साह के साथ मैदान में उतरते रहे. हार का सिलसिला उन्हें रोक नहीं पाया.

उनका चुनाव चिन्ह भी कई बार गधा रहा, जिसने उनके प्रचार और अंदाज को बाकी उम्मीदवारों से बिल्कुल अलग बना दिया.

आखिर ‘धरतीपकड़’ नाम कैसे पड़ा?

लगातार चुनाव लड़ते रहने और हार के बाद भी जमीन न छोड़ने की उनकी आदत ने लोगों के बीच उन्हें ‘धरतीपकड़’ नाम दिलाया. यह नाम धीरे-धीरे इतना मशहूर हुआ कि उनका असली नाम पीछे छूट गया और देश उन्हें इसी उपनाम से पहचानने लगा.

कुछ रिपोर्टों में यह भी बताया गया है कि जमीन, मिट्टी और स्थानीय जरूरतों से उनका गहरा जुड़ाव था. इलाके में पानी की व्यवस्था और ट्यूबवेल जैसे कामों से जुड़ने की वजह से भी उनके ‘धरतीपकड़’ नाम को एक अलग अर्थ मिला.

चुनाव से आगे भी थी समाजसेवा

बाजोरिया की जिंदगी को सिर्फ चुनावों तक सीमित करके देखना उनके व्यक्तित्व को अधूरा समझना होगा. वे सामाजिक कामों में भी सक्रिय रहे. गरीब परिवारों की बेटियों की सामूहिक शादी करवाने, बच्चों की पढ़ाई में मदद करने और जरूरतमंद लोगों के लिए पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था कराने में उन्होंने भूमिका निभाई.

उम्र बढ़ने के साथ उन्होंने चुनावी गतिविधियों को कुछ कम किया और समाजसेवा पर ज्यादा ध्यान देने लगे. उनके लिए लोगों से जुड़ना और जरूरत के समय उनकी मदद करना भी उतना ही महत्वपूर्ण था जितना चुनाव लड़ना.

नागरमल बाजोरिया की कहानी इसलिए खास है क्योंकि भारतीय राजनीति में जहां ज्यादातर उम्मीदवार जीत को ही अंतिम लक्ष्य मानते हैं, वहीं उन्होंने चुनाव को जनता तक पहुंचने और लोकतंत्र में भागीदारी का माध्यम माना. उनकी हारें भले ही लंबी सूची बनाती हों, लेकिन चुनावी मैदान में लौटने का उनका हौसला उससे कहीं ज्यादा बड़ा था.

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-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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