भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्हें सिर्फ अखबार चलाने वाले लोगों के तौर पर याद नहीं किया जा सकता. रामनाथ गोयनका उन्हीं में से एक थे. आज उनकी पुण्यतिथि है और यह मौका उस पत्रकार-स्वामी को याद करने का है, जिसने मुश्किल से मुश्किल दौर में भी सत्ता के सामने अपने अखबार की स्वतंत्रता बनाए रखने की कोशिश की.
गोयनका सिर्फ मीडिया कारोबारी नहीं थे. वे स्वतंत्रता सेनानी रहे, संविधान सभा के सदस्य रहे और दो बार लोकसभा के सदस्य भी चुने गए. लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान शायद यही रही कि उन्होंने प्रेस की आजादी को केवल भाषणों और लेखों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे व्यवहार में उतारने की कोशिश की.
मीडिया की स्वतंत्रता की चर्चा अक्सर पत्रकारों के साहस और संपादकों की स्वतंत्रता तक सीमित रह जाती है. लेकिन इसके पीछे एक और बड़ा सवाल है—पैसा कहां से आएगा?
अखबार का कारोबार थोड़ा अलग है. उसकी एक प्रति तैयार करने में जितना खर्च आता है, पाठक से उसकी कीमत उतनी नहीं ली जाती. आम तौर पर अखबार की बिक्री से होने वाली कमाई उसकी पूरी लागत निकालने के लिए पर्याप्त नहीं होती. इस अंतर को विज्ञापनों से पूरा किया जाता है.
यहीं से समस्या शुरू होती है. सरकारी विज्ञापन सत्ता के रुख के साथ बदल सकते हैं और निजी कंपनियां भी कई बार सरकार से अपने कारोबारी रिश्तों को ध्यान में रखकर विज्ञापन के फैसले करती हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर अखबार की कमाई का बड़ा हिस्सा बाहरी विज्ञापनों पर निर्भर हो, तो वह सत्ता से पूरी तरह स्वतंत्र कैसे रह पाएगा?
रामनाथ गोयनका ने इस चुनौती का एक अलग रास्ता खोजा.
उन्होंने देश के बड़े शहरों में बहुमंजिला इमारतें बनवाईं. इन इमारतों के कुछ हिस्सों में अखबार के दफ्तर और प्रेस चलते थे, जबकि बाकी जगह किराए पर दी जाती थी. इससे नियमित किराये की आमदनी होने लगी और अखबार के कारोबार को एक वैकल्पिक आर्थिक सहारा मिला.
यह व्यवस्था छोटी बात नहीं थी. इसका सीधा मतलब था कि अखबार की आर्थिक मजबूरी कुछ हद तक कम हो सकती थी. सरकार से मिलने वाले विज्ञापनों पर निर्भरता घटे तो सरकार के खिलाफ खबरें प्रकाशित करने या सत्ता से असहमति जताने की कीमत भी अपेक्षाकृत कम हो जाती है.
यही वजह है कि गोयनका का मॉडल आज भी चर्चा के लायक है. उन्होंने यह समझ लिया था कि प्रेस की स्वतंत्रता केवल अच्छे इरादों से नहीं टिकती. उसके पीछे मजबूत आर्थिक आधार भी होना चाहिए.
आज के दौर में जब बड़े मीडिया संस्थानों के खर्च और चमक-दमक की खूब चर्चा होती है, गोयनका का जीवन इसके बिल्कुल अलग उदाहरण के रूप में सामने आता है. उनके समय इंडियन एक्सप्रेस समूह में आज जैसी भव्यता नहीं थी. यहां तक कि गोयनका खुद अपनी फिएट कार चलाते थे.
उनके व्यक्तित्व में एक तरफ सादगी थी, तो दूसरी तरफ भविष्य को देखकर फैसला लेने की क्षमता. यही संयोजन उनके काम करने के तरीके में भी दिखाई देता था.
आज मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर बहस पहले से कहीं ज्यादा तेज है. ‘गोदी मीडिया’ जैसे शब्द आम बातचीत और राजनीतिक बहस का हिस्सा बन चुके हैं. सत्ता के करीब रहने वाले पत्रकार और मीडिया संस्थान आज ही पैदा नहीं हुए हैं; आजादी के बाद के अलग-अलग दौर में ऐसे उदाहरण मिलते रहे हैं. फर्क इतना है कि अब इस मुद्दे पर सार्वजनिक चर्चा ज्यादा होती है. लेकिन असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कौन-सा मीडिया संस्थान किसके करीब है. बड़ा सवाल यह है कि आर्थिक दबाव के बीच कोई मीडिया समूह कितनी स्वतंत्रता के साथ काम कर सकता है.
अगर पाठक अखबार की वास्तविक लागत का बड़ा हिस्सा अपनी जेब से देने के लिए तैयार हों, तो तस्वीर शायद अलग होती. मगर जमीन पर स्थिति यह है कि ज्यादातर अखबारों के लिए विज्ञापन अभी भी कमाई का अहम स्रोत हैं.
इसी संदर्भ में रामनाथ गोयनका का आर्थिक मॉडल आज फिर महत्वपूर्ण नजर आता है. उनका अनुभव बताता है कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता के लिए सिर्फ निडर पत्रकार ही नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से मजबूत और आत्मनिर्भर संस्थान भी जरूरी हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
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