भारत में चुनाव सिर्फ सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं हैं, बल्कि लोकतंत्र में जनता के भरोसे की सबसे बड़ी परीक्षा भी हैं. इस पूरी व्यवस्था के केंद्र में चुनाव आयोग होता है और उसके मुखिया यानी मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है. बीते तीन दशकों में इस पद पर रहे अलग-अलग अधिकारियों ने अपने फैसलों और काम करने के तरीके से अलग पहचान बनाई है. टीएन शेषन, जेएम लिंगदोह और मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार—इन तीनों के कार्यकाल अलग-अलग दौर और अलग-अलग चुनौतियों को सामने रखते हैं.
1990 के दशक में टीएन शेषन ने मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला तो चुनावी व्यवस्था में उनका असर साफ दिखाई देने लगा. उस दौर में बूथ कैप्चरिंग, चुनाव में पैसे और बाहुबल के इस्तेमाल जैसी शिकायतें आम थीं. शेषन ने चुनाव आचार संहिता को सिर्फ नियमों की किताब में दर्ज प्रावधान मानने के बजाय उसे जमीन पर सख्ती से लागू करने पर जोर दिया.
चुनावी खर्च पर नजर रखने, पर्यवेक्षकों की तैनाती, केंद्रीय सुरक्षा बलों के इस्तेमाल और मतदाता पहचान पत्र जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत करने में उनका कार्यकाल महत्वपूर्ण रहा. उनके सख्त अंदाज की चर्चा इतनी ज्यादा हुई कि लोगों के बीच मजाक में यह तक कहा जाने लगा—“सो जा, वरना शेषन आ जाएगा.”
शेषन के दौर में उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों को यह साफ संदेश मिला कि चुनावी नियमों को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा. कई मामलों में नियमों का पालन न करने वाले उम्मीदवारों पर कार्रवाई भी हुई. यही वजह है कि चुनाव सुधारों की चर्चा में आज भी उनके कार्यकाल को एक अहम पड़ाव माना जाता है. 1996 में उन्हें रेमन मैग्सेसे पुरस्कार भी मिला.
इसके बाद चुनाव आयोग की स्वतंत्रता से जुड़ी एक बड़ी बहस जेएम लिंगदोह के कार्यकाल में सामने आई. 2002 में गुजरात विधानसभा चुनाव को लेकर चुनाव आयोग और तत्कालीन राज्य सरकार के बीच मतभेद खुलकर सामने आए.
गुजरात में दंगों के बाद राज्य सरकार विधानसभा चुनाव जल्द कराने के पक्ष में थी. वहीं लिंगदोह के नेतृत्व वाले चुनाव आयोग ने जमीनी परिस्थितियों का आकलन किया और मतदाता सूची को अपडेट करने तथा विस्थापित लोगों के मतदान से जुड़ी व्यवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए चुनाव कराने के समय पर फैसला लिया.
इस मुद्दे पर तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और लिंगदोह के बीच सार्वजनिक रूप से तीखी बयानबाजी भी हुई. लिंगदोह ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा था कि आयोग ने परिस्थितियों को देखते हुए निर्णय लिया है. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनाव कराने के समय को लेकर चुनाव आयोग के रुख को बरकरार रखा.
लिंगदोह का यह दौर अक्सर इस सवाल के संदर्भ में याद किया जाता है कि चुनाव आयोग राजनीतिक दबाव के बीच अपनी संवैधानिक भूमिका किस तरह निभाता है.
फरवरी 2025 में ज्ञानेश कुमार ने देश के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में जिम्मेदारी संभाली. वे 1988 बैच के केरल कैडर के आईएएस अधिकारी रहे हैं. आईआईटी कानपुर से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने प्रशासनिक क्षेत्र में लंबा अनुभव हासिल किया. केंद्र और राज्य सरकार में कई जिम्मेदारियां संभालने के बाद वे चुनाव आयोग का हिस्सा बने और बाद में मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त हुए.
उनकी नियुक्ति ऐसे समय में हुई जब चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर पहले से राजनीतिक बहस चल रही थी. 2023 में बने कानून के तहत चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया. विपक्षी दलों ने इस व्यवस्था पर सवाल उठाए और चयन प्रक्रिया को लेकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं.
ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में मतदाता सूची का स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर भी बड़ा मुद्दा बना. इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची की दोबारा गहन जांच और उसे अपडेट करना है. चुनाव आयोग का कहना है कि इससे पुरानी, गलत या अपूर्ण जानकारी को दुरुस्त करने में मदद मिलती है. दूसरी ओर, विपक्षी दलों ने बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने को लेकर सवाल उठाए हैं और आरोप लगाया है कि इससे वास्तविक मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं. इस मुद्दे पर राजनीतिक और कानूनी बहस अभी भी जारी है.
ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल को लेकर एक और बहस चुनाव आयोग के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया से जुड़ी है. हाल में सामने आई रिपोर्टों में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से कुछ फैसलों पर आपत्ति जताए जाने का उल्लेख किया गया.
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-भारत एक्सप्रेस
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