उन्नीसवीं सदी के भारत में बाल विवाह समाज की आम व्यवस्था का हिस्सा था और लड़कियों की शादी को लेकर उनकी राय पूछना तो दूर, उनकी इच्छा को अक्सर कोई महत्व ही नहीं दिया जाता था. ऐसे समय में मुंबई की एक किशोरी ने ऐसा फैसला लिया, जिसने सिर्फ उसके अपने जीवन की दिशा नहीं बदली, बल्कि देश में बाल विवाह, महिलाओं की सहमति और शादी से जुड़े कानूनों पर एक बड़ी बहस खड़ी कर दी. उस लड़की का नाम था रुख्माबाई.
साल 1878 के आसपास, महज किशोर उम्र में रुख्माबाई ने अपने पति के साथ रहने से इनकार कर दिया. उनका तर्क था कि जिस रिश्ते को उन्होंने अपनी मर्जी से चुना ही नहीं, उसे निभाने के लिए उन्हें मजबूर क्यों किया जाए?
यही सवाल आगे चलकर अदालत तक पहुंचा और फिर पूरे भारत में चर्चा का विषय बन गया.
रुख्माबाई का जन्म 22 नवंबर 1864 को बंबई, यानी आज की मुंबई, में एक मराठी परिवार में हुआ था. उनके पिता का निधन कम उम्र में ही हो गया था. उनकी मां जयंतीबाई ने बाद में डॉ. सखाराम अर्जुन से विवाह किया. डॉ. अर्जुन डॉक्टर होने के साथ-साथ समाज सुधार की सोच रखने वाले व्यक्ति थे और उन्होंने रुख्माबाई की शिक्षा को भी बढ़ावा दिया.
लेकिन उस दौर की सामाजिक व्यवस्था में शिक्षा के साथ-साथ एक और फैसला परिवार ने उनके लिए कर दिया था.
करीब 11 साल की उम्र में रुख्माबाई की शादी 19 वर्षीय दादाजी भिकाजी से कर दी गई. परिवार को उम्मीद थी कि दादाजी आगे पढ़ाई करेंगे और घर जमाई के तौर पर रहेंगे. लेकिन हालात उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे. दादाजी पढ़ाई से दूर होते गए, कर्ज में फंस गए और उनका जीवन भी अस्थिर होता चला गया.
रुख्माबाई दूसरी तरफ पढ़ना चाहती थीं और अपनी जिंदगी को अपने तरीके से आगे बढ़ाना चाहती थीं.
जब दादाजी ने उन्हें अपने साथ रहने के लिए कहा, तो रुख्माबाई ने साफ मना कर दिया. उन्होंने उस शादी को स्वीकार करने से इनकार कर दिया जिसे उन्होंने खुद चुना ही नहीं था.
रुख्माबाई के इस फैसले ने विवाद को जन्म दिया. आखिरकार 1884 में दादाजी भिकाजी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया. उन्होंने मांग की कि रुख्माबाई को उनके साथ रहने का आदेश दिया जाए. कानूनी भाषा में इसे ‘पुनर्स्थापना दांपत्य अधिकार’ यानी restitution of conjugal rights कहा जाता था.
मामले की सुनवाई करने वाले जज रॉबर्ट हिल पिन्ही ने शुरुआती फैसला रुख्माबाई के पक्ष में दिया. उन्होंने माना कि किसी बच्चे की शादी के आधार पर उसे बाद में जबरन वैवाहिक जीवन में धकेलना उचित नहीं माना जा सकता.
लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं हुआ. अपील के बाद फैसला बदल गया.
1887 में जज फारन ने रुख्माबाई को पति के साथ रहने का आदेश दिया. आदेश न मानने पर उन्हें छह महीने जेल की सजा भुगतने की चेतावनी दी गई.
रुख्माबाई ने इसके बाद भी अपना फैसला नहीं बदला. उनका रुख स्पष्ट था—वह जेल जाना स्वीकार करेंगी, लेकिन अपनी इच्छा के खिलाफ पति के साथ रहने के लिए तैयार नहीं होंगी.
यह मामला जल्द ही सिर्फ एक परिवार का विवाद नहीं रह गया. भारत के साथ-साथ ब्रिटेन में भी इस पर चर्चा होने लगी.
एक तरफ वे लोग थे जो इसे हिंदू सामाजिक परंपराओं में बाहरी दखल के रूप में देख रहे थे. बाल गंगाधर तिलक जैसे लोगों ने भी इस मामले को लेकर सुधारवादी हस्तक्षेप का विरोध किया. दूसरी तरफ समाज सुधारकों और महिलाओं के अधिकारों की वकालत करने वालों ने रुख्माबाई के समर्थन में आवाज उठाई.
रुख्माबाई ने भी चुप रहने के बजाय सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखी. उन्होंने ‘ए हिंदू लेडी’ नाम से टाइम्स ऑफ इंडिया में लेख लिखे. अपने लेखों में उन्होंने बाल विवाह के कारण लड़कियों की शिक्षा रुकने और उनके व्यक्तिगत जीवन पर पड़ने वाले असर की बात उठाई.
उस समय किसी भारतीय महिला का इस तरह सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखना अपने आप में असाधारण कदम था.
कानूनी लड़ाई कई साल चली. अंत में 1888 में दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया. दादाजी भिकाजी ने 2,000 रुपये स्वीकार किए और रुख्माबाई को अपने साथ रहने की मांग छोड़ दी.
इस मामले को बाद में भारत में विवाह और महिलाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े शुरुआती महत्वपूर्ण कानूनी संघर्षों में गिना गया. इसे कई बार भारत में तलाक जैसे समाधान की दिशा में एक शुरुआती ऐतिहासिक उदाहरण के तौर पर भी देखा गया है, हालांकि उस समय औपचारिक रूप से तलाक का कानून मौजूद नहीं था.
रुख्माबाई का मामला उस समय चल रही बाल विवाह और महिलाओं की सहमति से जुड़ी बहस को और तेज करने वाले प्रमुख घटनाक्रमों में शामिल था. इसके कुछ वर्षों बाद 1891 में एज ऑफ कंसेंट एक्ट लागू किया गया. इस कानून के तहत सहमति की कानूनी उम्र 10 से बढ़ाकर 12 साल की गई.
आज के नजरिए से यह उम्र बेहद कम लग सकती है, लेकिन उस समय यह बदलाव बाल विवाह और कम उम्र की लड़कियों के अधिकारों को लेकर चल रही बहस में एक महत्वपूर्ण कदम था.
रुख्माबाई की कहानी हालांकि सिर्फ अदालत और कानून तक सीमित नहीं रही.
रुख्माबाई की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्होंने अपनी जिंदगी को सिर्फ विरोध तक सीमित नहीं रखा. वह पढ़ाई जारी रखना चाहती थीं और चिकित्सा के क्षेत्र में जाना चाहती थीं.
अपने समर्थकों की मदद से, जिनमें महिला डॉक्टर और समाज सुधारक एडिथ पेची भी शामिल थीं, रुख्माबाई इंग्लैंड गईं. वहां उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ मेडिसिन फॉर वुमेन में पढ़ाई की और चिकित्सा की डिग्री हासिल की.
1895 में भारत लौटने के बाद उन्होंने सूरत के महिला अस्पताल में मुख्य चिकित्सा अधिकारी के रूप में काम किया. बाद में उन्होंने राजकोट के जेनाणा स्टेट हॉस्पिटल में भी सेवा दी.
इस तरह रुख्माबाई उन शुरुआती भारतीय महिलाओं में शामिल हो गईं जिन्होंने चिकित्सा के क्षेत्र में पेशेवर पहचान बनाई. उस दौर में जब महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा और पेशेवर करियर की राह बेहद कठिन थी, उनका डॉक्टर बनना उनकी शुरुआती लड़ाई का ही एक आगे का रूप था.
सेवानिवृत्ति के बाद भी रुख्माबाई सामाजिक मुद्दों से दूर नहीं हुईं. उन्होंने पर्दा प्रथा समेत महिलाओं की सामाजिक स्थिति से जुड़े विषयों पर लिखा और महिलाओं की शिक्षा तथा सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भागीदारी पर जोर दिया.
उनका जीवन इस बात का उदाहरण बना कि किसी सामाजिक परंपरा पर सवाल उठाना केवल विरोध करना नहीं है. उसके पीछे अपने जीवन को लेकर सोचने, सवाल पूछने और अपनी पसंद के लिए खड़े होने का साहस भी जरूरी है.
रुख्माबाई की कहानी को सिर्फ एक पुराने अदालत के मामले के तौर पर देखना शायद उनके संघर्ष को छोटा कर देना होगा. उनकी लड़ाई उस बुनियादी सवाल से जुड़ी थी कि किसी व्यक्ति की शादी, शिक्षा और जीवन के बारे में फैसला आखिर कौन करेगा.
उन्होंने ऐसे दौर में अपनी आवाज उठाई जब सामाजिक दबाव बहुत मजबूत था और महिलाओं के पास अपने फैसलों के लिए सार्वजनिक मंच बेहद कम थे.
उन्होंने अपनी शादी को स्वीकार करने से इनकार किया, अदालत का सामना किया, सार्वजनिक बहस में अपनी बात रखी और बाद में डॉक्टर बनकर हजारों महिलाओं की सेवा की.
ये भी पढ़ें- वकील के दफ्तर की तलाशी और एडवोकेट क्लाइंट प्रिविलेज से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जीएसटी अधिकारियों को दिया आदेश
Also Follow Bharat Express on Youtube
-भारत एक्सप्रेस
Adani Realty Stalled Projects: अटके हुए घरों की मुश्किल में अडानी रियल्टी एक बड़े समाधानकर्ता…
चंडीगढ़ में आयोजित WISE 4.0 (Women’s International Summit) कार्यक्रम में महिला अधिकारों पर जोर दिया…
दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ कथित डीपफेक तस्वीर सोशल मीडिया पर…
सुप्रीम कोर्ट ने वकील पुनीत बत्रा के दफ्तर में जीएसटी विभाग की तलाशी और एडवोकेट-क्लाइंट…
महिला पहलवानों ने बृज भूषण शरण सिंह और सह-आरोपी विनोद तोमर को बरी किए जाने…
New York Ice Cream: न्यूयॉर्क में परोसी जाने वाली करीब $1,000 की लग्जरी आइसक्रीम अपनी…