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बाबू जगत सिंह: सारनाथ को इतिहास में वापस लाने वाला भारतीय; और वो वंशज जिसने उनका नाम दोबारा दर्ज कराया

हमारे इतिहास में एक बहुत बड़ी विडंबना छिपी है. शिलालेख दो हजार साल तक अपने अस्तित्व को बचाकर रख सकते हैं, लेकिन एक इंसान का नाम महज दो सौ साल में गुमनामी के अंधेरे में खो सकता है. वाराणसी के पास स्थित सारनाथ में पत्थर टिके रहे.

स्तूप बचे रहे. प्राचीन मठों के अवशेष बचे रहे. सम्राट अशोक के स्तंभ के टुकड़े भी सुरक्षित रहे. इसी पवित्र मिट्टी से अशोक का वो प्रसिद्ध ‘सिंह चतुर्मुख’ (Lion Capital) बाहर निकला – वही चार शेर, जो आगे चलकर स्वतंत्र भारत का राष्ट्रीय प्रतीक (State Emblem) बने.

लेकिन सारनाथ के आधुनिक पुरातात्विक इतिहास के शुरुआती दौर से जुड़े एक भारतीय का नाम समय के साथ धीरे-धीरे जनमानस की स्मृति से धुंधला होता चला गया.

बाबू जगत सिंह

पीढ़ियों तक सारनाथ आने वाले पर्यटकों और इतिहास के छात्रों को यही बताया गया कि इस महान पुरातात्विक स्थल की खोज का श्रेय मुख्य रूप से ब्रिटिश अधिकारियों और पुरातत्वविदों को जाता है – जैसे जोनाथन डंकन, कॉलिन मैकेंजी, अलेक्जेंडर कनिंघम और उनके बाद आए अन्य विद्वान.

वहीं, बाबू जगत सिंह का नाम अगर कहीं आया भी, तो एक नकारात्मक भूमिका में – उन पर प्राचीन धर्मराजिका स्तूप को इमारत बनाने वाली सामग्री (ईंट और पत्थर) के लिए ढहाने का आरोप लगा.

उस कहानी में एक तथ्य तो था, लेकिन वह पूरा सच नहीं था.

मार्च 2026 में, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया कि सारनाथ में सबसे पहली खुदाई बाबू जगत सिंह द्वारा की गई थी और इसी खुदाई के कारण इस ऐतिहासिक स्थल का महत्व दुनिया के सामने आया था.

ASI के महानिदेशक वाई. एस. रावत ने स्पष्ट किया कि यह निष्कर्ष संस्था को सौंपे गए ठोस दस्तावेजी साक्ष्यों की गहन समीक्षा के बाद निकाला गया है. इसके बाद सारनाथ में लगे सूचना पट्ट (Inscription) के विवरण में आधिकारिक रूप से संशोधन किया गया.

खुदाई शुरू होने के दो शताब्दियों से भी अधिक समय बाद, एक भारतीय नाम आखिरकार उसी स्थान पर ससम्मान लौट आया, जहां से यह पूरी कहानी शुरू हुई थी.

और इस ऐतिहासिक सुधार के पीछे एक और अद्भुत कहानी छिपी है: बाबू जगत सिंह की छठी पीढ़ी के वंशज प्रदीप नारायण सिंह की, जिन्होंने पारिवारिक यादों को केवल एक विरासत मानने के बजाय, इतिहास की कसौटी पर परखने का साहसी संकल्प लिया.

सवाल यह नहीं कि सारनाथ को ‘किसने खोजा’

एक लोकप्रिय सवाल हमेशा लोगों को आकर्षित करता है: सारनाथ की खोज किसने की?

लेकिन सच यह है कि यह सवाल ही थोड़ा भ्रामक है. सारनाथ कोई खोया हुआ शहर नहीं था जिसे अचानक किसी एक साहसी खोजकर्ता ने ढूँढ निकाला हो.

महान धमेख स्तूप हमेशा से दिखाई देता था. जगत सिंह से जुड़ी खुदाई से पहले भी यूरोपीय यात्रियों ने इस क्षेत्र में प्राचीन अवशेष देखे थे. इसके अलावा, सारनाथ की पवित्र स्मृतियां भारतीय जनमानस से कभी पूरी तरह गायब नहीं हुई थीं.

यूनेस्को (UNESCO) भी सारनाथ का वर्णन करते हुए लिखता है कि 12वीं सदी के बाद इस स्थल का पतन हुआ, यह गुमनामी में चला गया और 18वीं सदी में इसे पुनः उजागर किया गया.

इसलिए अधिक सटीक और कहीं अधिक रोचक सवाल यह है:

आधुनिक युग में उस खुदाई की शुरुआत किसने की जिसने सारनाथ के दबे हुए पुरातात्विक महत्व को पहली बार उजागर किया?

आज, ASI का आधिकारिक उत्तर बाबू जगत सिंह के नाम से शुरू होता है. और यह बदलाव बहुत मायने रखता है.

क्योंकि इतिहास तब अविश्वसनीय हो जाता है जब किसी जटिल और लंबी प्रक्रिया को किसी एक व्यक्ति के नाम पर समेट दिया जाता है. लेकिन इतिहास तब भी उतना ही अविश्वसनीय हो जाता है जब उस पूरी श्रृंखला की पहली कड़ी को ही भुला दिया जाए.

कनिंघम से पहले आए जगत सिंह

अठारहवीं सदी के अंतिम वर्षों के बनारस की कल्पना कीजिए.

उस समय भारत में कोई ‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण’ नहीं था. एक संस्थागत विषय के रूप में आधुनिक पुरातत्व का अस्तित्व ही नहीं था. प्राचीन संरचनाओं को अक्सर केवल ईंट और पत्थर निकालने के सुविधाजनक स्रोत के रूप में देखा जाता था. किसी प्राचीन स्मारक को ‘संरक्षित’ करने की आधुनिक अवधारणा उस दौर के विचारों से काफी दूर थी.

इसी दौर और माहौल में बाबू जगत सिंह का नाम सारनाथ में हुई खुदाई से जुड़ा.

ASI को सौंपे गए हालिया दस्तावेजी शोध के अनुसार, उनके द्वारा खुदाई का कार्य लगभग 1787-88 के दौरान शुरू किया गया था. प्रदीप नारायण सिंह द्वारा प्रस्तुत अभिलेखीय साक्ष्य दर्शाते हैं कि जगत सिंह ने इस अवधि में इस क्षेत्र में खुदाई करवाई थी.

वहीं, पुराने पुरातात्विक साहित्य में 1794 में धर्मराजिका स्तूप को खोलने और वहां से एक अस्थि-मंजूषा (Relic Deposit) मिलने का नाट्यकीय विवरण मिलता है.

इन दोनों तारीखों (1787-88 और 1794) को कभी-कभी विरोधाभासी माना गया, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है. इतिहास का अधिक सटीक पुनर्गठन यह बताता है कि खुदाई की गतिविधि पहले शुरू हो चुकी थी, जबकि वह प्रमुख खोज—यानी अवशेष कक्ष का खुलना—1794 में हुई, जिसका मजबूत समकालीन दस्तावेजी रिकॉर्ड उपलब्ध है.

यह केवल शब्दों या तिथियों का हेरफेर नहीं है. यह इतिहास को केवल दोहराने और उसे गहराई से समझने के बीच का अंतर है.

सतह से अठारह हाथ नीचे की खोज

धर्मराजिका स्तूप सारनाथ के सबसे महत्वपूर्ण प्राचीन स्मारकों में से एक था.

जगत सिंह से जुड़ी खुदाई के दौरान, मजदूर इस संरचना के काफी गहरे हिस्से तक पहुंचे.

पुराने पुरातात्विक विवरणों के अनुसार, लगभग 18 हाथ (Cubits) की गहराई पर मजदूरों को एक पत्थर का बक्सा मिला, जिसके भीतर हरे संगमरमर की एक छोटी मंजूषा (Reliquary) रखी हुई थी. इसके अंदर मानव अवशेष और बहुमूल्य वस्तुएं पाई गई थीं.

इस नाटकीय खोज ने बनारस के तत्कालीन ब्रिटिश रेजीडेंट जोनाथन डंकन का ध्यान आकर्षित किया.

डंकन ने इस खोज का दस्तावेजीकरण किया और इसका एक विस्तृत विवरण ऐतिहासिक पत्रिका ‘एशियाटिक रिसर्चेज’ (Asiatic Researches) में प्रकाशित हुआ.

दस्तावेजीकरण का वह कार्य ऐतिहासिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण था. लेकिन यहां एक बुनियादी अंतर है जिसे बाद के इतिहासकारों ने नजरअंदाज कर दिया: जो व्यक्ति किसी खोज का रिकॉर्ड लिखता है, जरूरी नहीं कि उसी के प्रयास से वह खोज हुई हो.

डंकन ने उस घटना को कागजों पर दर्ज करके अमर बना दिया. लेकिन खुदाई का वास्तविक कार्य पहले ही हो चुका था – और उस खुदाई का सीधा संबंध बाबू जगत सिंह से था.

यह उन सरल लगने वाले तथ्यों में से एक है जो पूरे ऐतिहासिक आख्यान (Narrative) के ढांचे को बदलकर रख देते हैं.

क्या जगत सिंह एक पेशेवर पुरातत्वविद थे? बिल्कुल नहीं!

जब इतिहास में हुए किसी अन्याय को सुधारा जाता है, तो अक्सर एक खतरा यह होता है कि हम अति-उत्साह में दूसरे छोर पर चले जाएं. हमें इससे बचना चाहिए.

बाबू जगत सिंह 21वीं सदी के संरक्षण मानकों के अनुसार वैज्ञानिक खुदाई करने वाले कोई आधुनिक पुरातत्वविद नहीं थे. न ही धर्मराजिका स्तूप को पहुंचे नुकसान को छिपाया जाना चाहिए.

उनकी खुदाई का उद्देश्य इमारती लकड़ी और पत्थरों की निकासी से जुड़ा था. इस प्रक्रिया में प्राचीन चिनाई को नुकसान पहुंचा. समकालीन मानकों के अनुसार, कोई भी गंभीर इतिहासकार इसे ‘पुरातात्विक संरक्षण’ नहीं कहेगा.

यह सच लंबे समय से जगत सिंह के खिलाफ तर्कों का हिस्सा रहा है. लेकिन सच्चे इतिहास को एक साथ दो विपरीत सच्चाइयों को स्वीकार करना पड़ता है:

उस गतिविधि से एक प्राचीन स्मारक को नुकसान पहुंचा.

उसी गतिविधि ने उन पुरातात्विक साक्ष्यों को बाहर निकाला जिसने सारनाथ के दबे हुए अतीत को दुनिया के सामने ला खड़ा किया.

एक सच दूसरे सच को मिटाता नहीं है. इतिहास शायद ही कभी हमें पूरी तरह से निष्कलंक नायक देता है; वह हमें इंसान, उनके फैसले, उनके परिणाम और साक्ष्य देता है.

ब्रिटिश पुरातत्वविद आए – और उनका योगदान भी वास्तविक था

बाबू जगत सिंह को उनका हक देने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि हम उनके बाद आने वाले पुरातात्विक दिग्गजों के योगदान को कम आंकें. ऐसा करना केवल एक विकृति की जगह दूसरी विकृति को जन्म देना होगा.

जोनाथन डंकन ने शुरुआती खोज का दस्तावेजीकरण किया.

कर्नल कॉलिन मैकेंजी ने बाद में इस स्थल का अन्वेषण किया.

अलेक्जेंडर कनिंघम ने 19वीं सदी में सारनाथ में व्यापक और व्यवस्थित जांच की.

मार्खम किटो ने पुरातात्विक कार्य को आगे बढ़ाया.

एफ. ओ. ओर्टेल द्वारा 1904-05 में की गई प्रमुख खुदाई ने असाधारण खोजें दीं, जिनमें सम्राट अशोक के स्तंभ के अवशेष और अद्भुत ‘सिंह चतुर्मुख’ (Lion Capital) शामिल थे.

बाद में जॉन मार्शल, एच. हरग्रीव्स, और दयाराम साहनी जैसे विद्वानों के काम ने सारनाथ को खंडर के ढेर से उठाकर भारत के सबसे सुव्यवस्थित बुद्ध स्थलों में बदल दिया.

कहानी में इन सभी का अपना एक अमूल्य स्थान है. संशोधन यह नहीं है कि “कनिंघम गलत थे और जगत सिंह सही”; संशोधन यह है कि “जगत सिंह का प्रयास कनिंघम से बहुत पहले हुआ था.”

यह एक कहीं अधिक परिपक्व दृष्टिकोण है, और इसी के साक्ष्यों ने अंततः भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को अपनी आधिकारिक पट्टिका बदलने पर मजबूर किया.

अभिलेखागारों में दर्ज था वो नाम, जिसे जनमानस भूल गया

इस पूरे मामले में एक और हैरान करने वाला तथ्य है: ऐतिहासिक रिकॉर्ड से जगत सिंह का नाम पूरी तरह कभी गायब नहीं हुआ था.

शोधकर्ताओं ने 19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत के उन संदर्भों की ओर इशारा किया है जिनमें धर्मराजिका स्तूप को ‘जगत सिंह का स्तूप’ (Jagat Singh’s Stupa) कहा गया था.

काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के पूर्व प्रोफेसर राणा पी. बी. सिंह और प्रियंका झा द्वारा 2025 में लिखे गए एक अकादमिक लेख में यह नोट किया गया कि मार्खम किटो और दयाराम साहनी जैसे दिग्गजों के पुरातात्विक लेखों में भी इस नाम का उल्लेख मिलता है.

उसी शोधपत्र में तर्क दिया गया कि बाद के आख्यानों में धीरे-धीरे जगत सिंह को एक ‘शुरुआती खोजकर्ता’ के रूप में दिखाने के बजाय मुख्य रूप से एक ‘विनाशक’ के रूप में चित्रित किया जाने लगा.

यह इतिहास का एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा करता है:

कोई नाम अभिलेखागार (Archives) में दर्ज रहने के बावजूद आम जनता की यादों से कैसे गायब हो जाता है?

इसका कोई एक उत्तर नहीं है. इतिहास केवल इस बात से तय नहीं होता कि क्या हुआ था, बल्कि इस बात से तय होता है कि क्या लिखा गया, क्या अनुवादित हुआ, क्या पढ़ाया गया, किसे बार-बार दोहराया गया और अंततः पट्टिकाओं (Plaques) पर क्या लिखा गया.

पुनरावृत्ति (Repetition) अधूरे बयानों को भी प्रामाणिकता दे देती है. एक बार जब कोई विवरण गाइडबुक में छप जाता है, तो दूसरा लेखक उसे ही उद्धृत करता है. फिर तीसरा. और एक पीढ़ी बाद, वह अधूरा तथ्य ही सर्वमान्य सत्य बन जाता है.

संस्थागत स्मृति ऐसे ही काम करती है – और इसीलिए संस्थागत सुधार का महत्व इतना बड़ा होता है.

जब एक वंशज ने ‘खतरनाक’ सवाल पूछने की हिम्मत की

प्रदीप नारायण सिंह के लिए यह मामला केवल एक अकादमिक बहस नहीं था. बाबू जगत सिंह उनके पूर्वज थे. लेकिन केवल पारिवारिक यादें या मौखिक दावे इतिहास नहीं लिख सकते.

यदि कोई वंशज कहे कि “मेरे पूर्वज को श्रेय मिलना चाहिए”, तो वह केवल एक दावा है. लेकिन जब वही वंशज प्रामाणिक अभिलेखों और ऐतिहासिक साक्ष्यों के साथ सामने आता है, तो वह ‘साक्ष्य’ बन जाता है. इसी अंतर ने इस पूरी कहानी का रुख मोड़ दिया.

2019 से 2023 तक चले पांच साल के गहन शोध परियोजना में भारत और विदेशों के विभिन्न अभिलेखागारों में रखे औपनिवेशिक पत्राचार और रिकॉर्ड्स की जांच की गई.

प्रदीप नारायण सिंह के संरक्षण में हुए इस शोध का परिणाम एक व्यापक शोध दस्तावेज और बाबू जगत सिंह के जीवन व उनकी ऐतिहासिक भूमिका पर प्रकाशित काम के रूप में सामने आया.

शोधकर्ताओं ने भारत और विदेशों के अभिलेखागारों में रखे दुर्लभ दस्तावेजों, औपनिवेशिक पत्राचार और पुराने पुरातात्विक संदर्भों का पुनर्मूल्यांकन किया. पारिवारिक कहानियों को ऐतिहासिक साक्ष्यों की कठोर कसौटी पर परखा गया.

क्योंकि इतिहास को चुनौती देने का सबसे शक्तिशाली तरीका आक्रोश नहीं, बल्कि अकाट्य साक्ष्य (Evidence) है.

एक छोटी सी पट्टिका (Plaque) का बड़ा संदेश

आखिरकार, ये सभी साक्ष्य भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के समक्ष प्रस्तुत किए गए. यह प्रक्रिया केवल भाषणों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका परिणाम एक बड़े संस्थागत बदलाव के रूप में सामने आया.

ASI के निर्देशों के बाद सारनाथ में लगे ‘सांस्कृतिक सूचना पट्ट’ (Cultural Notice Board) के पाठ को संशोधित किया गया. एक नई पट्टिका लगाई गई. इससे पहले धर्मराजिका स्तूप के पास लगी पट्टिका में भी संशोधन किया गया था. और मार्च 2026 में, ASI ने सार्वजनिक रूप से बाबू जगत सिंह की शुरुआती खुदाई की भूमिका को स्वीकार कर लिया.

किसी साधारण पर्यटक के लिए किसी स्मारक पर लगी पट्टिका की कुछ पंक्तियों को बदलना एक प्रशासनिक प्रक्रिया लग सकती है. लेकिन यह उससे कहीं अधिक है.

किसी स्मारक की पट्टिका एक लघु पाठ्यपुस्तक (Miniature Textbook) की तरह होती है. एक स्कूली बच्चा उसे पढ़ता है, एक पर्यटक उसकी फोटो खींचता है, एक गाइड उसे दोहराता है और मीडिया उसे उद्धृत करता है.

इसलिए जब कोई संस्था प्राथमिक साक्ष्यों के आधार पर अपनी पट्टिका को सुधारती है, तो वह केवल शब्द नहीं बदलती—वह आने वाली पीढ़ियों की यादों को सुधारती है.

प्रदीप नारायण सिंह की वास्तविक उपलब्धि

इसे केवल एक वंशज द्वारा अपने पूर्वज के सम्मान की रक्षा की भावुक कहानी मान लेना उनकी उपलब्धि को कम आंकना होगा. उनकी वास्तविक उपलब्धि पद्धतिगत (Methodological) है.

प्रदीप नारायण सिंह का यह प्रयास सांस्कृतिक स्मृति के बारे में एक महत्वपूर्ण बात सिखाता है: विरासत केवल पत्थरों को बचाने से संरक्षित नहीं होती; यह उन कहानियों की निरंतर जांच करने से भी संरक्षित होती है जो हम उन पत्थरों से जोड़ते हैं.

एक भूल चुके नाम को वापस लाने के लिए दूसरों के योगदान को मिटाने की जरूरत नहीं है. सही दृष्टिकोण समावेशी होना चाहिए:

डंकन को रखिए.

मैकेंजी को रखिए.

कनिंघम को रखिए.

ओर्टेल को भी रखिए.

और बाबू जगत सिंह को भी वहीं स्थान दीजिए जहां साक्ष्य उन्हें ले जाते हैं. यह इतिहास का राजनीतिकरण नहीं है; यह सच्चा विद्वत्तापूर्ण शोध (Scholarship) है.

18वीं सदी के बनारस का राजनीतिक प्रतिरोध

बाबू जगत सिंह का जीवन स्वयं इतिहास का एक और दरवाजा खोलता है.

शोध परियोजना के दौरान 18वीं सदी के अंत में बनारस की राजनीतिक उथल-पुथल और ईस्ट इंडिया कंपनी के बढ़ते अधिकार के खिलाफ उनके विरोध की भी जांच की गई है.

2025 के अकादमिक लेख में 1799 के नागरिक असंतोष (Civil Unrest), जगत सिंह के खिलाफ ब्रिटिश कार्रवाइयों और उन्हें दी गई सजा से संबंधित शोध का उल्लेख है.

लेख में एक महत्वपूर्ण चेतावनी भी दी गई है: जगत सिंह के आधुनिक पुनर्वास के कुछ पहलुओं का महिमामंडन करने के बजाय उन पर और अधिक आलोचनात्मक जांच की जानी चाहिए.

यह सावधानी शोध को और मजबूत बनाती है. इतिहास को औपनिवेशिक नायकगाथाओं के बदले केवल राष्ट्रवादी नायकगाथाओं में नहीं बदलना चाहिए; इसे अधूरे साक्ष्यों के स्थान पर बेहतर साक्ष्यों में बदला जाना चाहिए.

2026 में इतिहास का चक्र पूरा हुआ

जगत सिंह के योगदान को आधिकारिक मान्यता मिलने के कुछ ही महीनों बाद, सारनाथ के इतिहास में एक और स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया.

25 जुलाई 2026 को दक्षिण कोरिया के बुसान में आयोजित यूनेस्को विश्व धरोहर समिति के 48वें सत्र में, सारनाथ के प्राचीन बौद्ध स्थल को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची (UNESCO World Heritage List) में शामिल किया गया.

यह भारत की 45वीं विश्व धरोहर संपत्ति बनी.

यूनेस्को सारनाथ को किसी आधुनिक पुरातात्विक विवाद से कहीं बड़े कारणों से मान्यता देता है. यह वह पवित्र भूमि है जहां बौद्ध परंपरा के अनुसार गौतम बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना पहला उपदेश (धम्मचक्कप्पवत्तन) दिया था.

बुद्ध के प्रथम उपदेश से लेकर आधुनिक भारत के राष्ट्र चिह्न तक

सारनाथ का प्रतीकवाद अद्भुत है.

यहीं बौद्ध परंपरा बुद्ध के ‘धम्मचक्र’ के प्रथम प्रवर्तन को मानती है.

सदियों बाद, सम्राट अशोक ने उस नैतिक और राजनीतिक कल्पना को पत्थरों पर उकेरा.

और अशोक के दो हजार साल बाद, स्वतंत्र भारत ने सारनाथ के ‘सिंह चतुर्मुख’ को अपने राष्ट्र चिह्न (State Emblem) के रूप में चुना.

पीठ से पीठ सटाए खड़े चार शेर, चक्र, घोड़ा और बैल – यह ‘सिंह स्तंभ’ आज भारत गणराज्य की पहचान है. यह सरकारी दस्तावेजों, अदालतों, भारतीय पासपोर्ट और करेंसी पर सुशोभित है.

इसलिए, सारनाथ केवल अतीत को संभालकर रखने की जगह नहीं है; यह वह स्थान है जहां भारत का अतीत उसके वर्तमान के माध्यम से लगातार बोलता है.

इतिहास को दोबारा पढ़ा गया है, अधिक ध्यान से

सारनाथ की कहानी में दो तरह की खोजें हुई हैं:

पहली पुनर्खोज जमीन के नीचे हुई: जहां प्राचीन अवशेष बाहर निकले, स्तूप मिले और आधुनिक पुरातत्व की नींव पड़ी.

दूसरी पुनर्खोज अभिलेखागारों (Archives) में हुई: जहां धूल खाती फाइलों को खोला गया, पुराने पूर्वाग्रहों पर सवाल उठाए गए और एक भूले हुए नाम को उसका हक वापस मिला.

पहली पुनर्खोज ने सारनाथ को इतिहास में वापस लाया; दूसरी पुनर्खोज ने बाबू जगत सिंह को सारनाथ के इतिहास में वापस ला खड़ा किया.

और इन दोनों युगों के बीच शांत भाव से खड़े नजर आते हैं प्रदीप नारायण सिंह – जिन्होंने जमीन की खुदाई नहीं की, बल्कि अभिलेखों की खुदाई की.

उनकी यह यात्रा हमें सिखाती है कि किसी देश को अपनी विरासत का संरक्षण केवल इमारतों को बचाकर ही नहीं, बल्कि उसके इतिहास को पूरी सच्चाई और ईमानदारी के साथ दर्ज करके करना चाहिए.

बाबू जगत सिंह को किसी काल्पनिक महिमामंडन की जरूरत नहीं है. उनका प्रामाणिक इतिहास ही अपने आप में पर्याप्त है. इस पूरी गाथा का सबसे बड़ा संदेश यही है कि इतिहास बदला नहीं गया है – इतिहास को इस बार अधिक ध्यान से पढ़ा गया है.

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Prashant Kumar

CEO – Bharat Express Digital Chief Advisor to the Chairman & Managing Director and Editor-in-Chief Mr. Prashant Kumar is a digital, media and growth transformation leader with 18+ years of experience across strategy, technology, AI, marketing and business transformation, having worked with leading organisations including Amazon, IBM, Adidas and Tata Consumer Products. At Bharat Express, he leads digital transformation, audience growth, technology, partnerships, monetisation and new business initiatives to build a scalable, future-ready media ecosystem.

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