7 साल से बीएल संतोष के पास ही क्यों है कमान? फोटो क्रेडिट- भारत एक्सप्रेस
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17 अगस्त 2026 को बीजेपी के अध्यक्ष नितिन नवीन ने पार्टी के नए पदाधिकारियों का ऐलान किया. इसमें बीएल संतोष को राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) के पद पर बरकरार रखा गया. वह 2019 से इस पद पर हैं और यही वह पद है जो उन्हें बीजेपी और आरएसएस के बीच की सबसे अहम कड़ी बनाता है. हर किसी ने हेडलाइन तो पढ़ी, लेकिन लगभग किसी ने भी इस फैसले के असल मायने नहीं समझे.
एक लाइन जिस पर किसी का ध्यान नहीं गया
हर संस्थान में एक ऐसा पद होता है जिसका महत्व उसके पदनाम से कहीं ज्यादा होता है. वेटिकन में यह सेक्रेटरी ऑफ स्टेट का पद है. किसी कॉर्पोरेट कंपनी में यह सीईओ नहीं, बल्कि वह व्यक्ति होता है जो सीईओ का कैलेंडर संभालता है और पूरे ढांचे को नियंत्रित करता है. भारतीय जनता पार्टी में 2006 से ही यह पद महासचिव (संगठन) का है . पिछले सात सालों से यह जिम्मेदारी एक ही व्यक्ति के पास है और वह नाम बीएल संतोष का है.
इसलिए जब नितिन नवीन ने अपने कार्यकाल के सात महीने बाद 17 अगस्त 2026 को अपनी नई राष्ट्रीय टीम की घोषणा की तो मीडिया का ध्यान वहीं गया जहां हमेशा जाता है मतलब बड़े और दिखने वाले बदलावों पर. स्मृति ईरानी की वापसी, राम माधव का कद बढ़ना, सोशल मीडिया प्रभारी पद से अमित मालवीय की विदाई पर खासी चर्चा की गई. हालांकि, उसी सूची के भीतर एक पुष्ट करने वाली अकेली लाइन दबी रह गई कि बीएल संतोष महासचिव (संगठन) के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाते रहेंगे.
पार्टी के अंदरूनी लोगों के लिए यह कोई नई बात नहीं थी. नए विस्तार की पूरी प्रक्रिया का यह अकेला ऐसा फैसला था जिसका पहले से पूरी तरह अंदाजा था. यही तयशुदा बात इसे बारीकी से समझने लायक बनाती है. क्योंकि राजनीति में भी मैनेजमेंट की तरह, कोई संगठन जिसे न बदलने का फैसला करता है, वह उन चीजों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण होता है जिन्हें वह बदलता है. इस नजरिए से देखें तो संतोष को पद पर बनाए रखना महज एक सामान्य फैसला नहीं है. यह बीजेपी के काम करने के पूरे सिस्टम पर एक मुहर है.
कौन हैं बीएल संतोष?
बोम्माराबट्टू लक्ष्मीजनार्दन संतोष किसी वंशवाद, मीडिया की चमक-दमक या चुनावी जीत के सहारे दिल्ली नहीं पहुंचे. वे एक इंजीनियर हैं. इस बात को इसलिए भी बताया जा रहा है कि यह ऐसा पहलू है जिस पर गौर करना जरूरी है. आरएसएस ने विचार और सिद्धांत को समझने वाले प्रचारक तो बहुत तैयार किए हैं लेकिन ऐसे लोग बहुत कम दिए हैं जो पार्टी संगठन के काम में एक इंजीनियर जैसी समझ, सिस्टम की खामियों को पकड़ने और बैकअप तैयार रखने की सोच लेकर आते हों.
संतोष 2006 से बीजेपी में पूर्णकालिक आरएसएस प्रचारक के रूप में कार्यरत हैं. दिल्ली तक उनका नाम पहुंचने से पहले, उन्होंने अपने गृह राज्य कर्नाटक में पार्टी के महासचिव (संगठन) के रूप में आठ साल बिताए. कर्नाटक एक ऐसा राज्य जो नए चेहरों पर आसानी से भरोसा नहीं करता. 2014 में पार्टी उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त महासचिव (संगठन) बनाकर ले आई, जहां उन्होंने रामलाल के अंडर काम किया, जो इस पद पर 13 से अधिक वर्षों तक रहे थे. जब जुलाई 2019 में रामलाल वापस आरएसएस में लौटे तो तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने संतोष को पूरी जिम्मेदारी सौंप दी. उनके सात साल के काम को देखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए उस साल यह पदोन्नति बिल्कुल भी अप्रत्याशित नहीं थी.
एक लाइन में कहें तो बीएल संतोष जुलाई 2019 से लगातार बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) पद पर हैं, जिससे 2026 भारत के सबसे महत्वपूर्ण गैर-चुनावी राजनीतिक पद पर उनका लगातार सातवां साल बन जाता है.
यह पद किसी भी मंत्रालय से बड़ा क्यों है?
आरएसएस और बीजेपी के बीच यह आधिकारिक सेतु है. इस पद पर परंपरा के अनुसार हमेशा संघ का प्रचारक ही बैठता है, जिसे संघ पार्टी में पूर्णकालिक काम करने के लिए भेजता है. इसी वजह से राष्ट्रीय स्तर पर कार्यकर्ताओं को गढ़ने, चुनाव प्रबंधन और नेतृत्व चयन में इस पद का बड़ा प्रभाव होता है. यह तय करता है कि कौन लड़ेगा, सिर्फ यह नहीं कि कौन जीतेगा. टिकट बंटवारा, प्रदेश अध्यक्षों की नियुक्ति और चुनाव समितियों का गठन. ये सभी फैसले प्रेस कॉन्फ्रेंस तक पहुंचने से पहले इसी टेबल से होकर गुजरते हैं.
यह पद सरकारों के बदलने के बाद भी कायम रहता है. चुनाव के साथ मंत्री बदल जाते हैं. तय समय पर पार्टी अध्यक्ष बदल जाते हैं. लेकिन संगठन महासचिव के कार्यकाल को एक अलग और शांत पैमाने पर परखा जाता है. जब कोई नहीं देख रहा हो, तब भी क्या पार्टी की मशीनरी ठीक से काम कर रही है?
मार्केटिंग के दिग्गज फिलिप कोटलर के पूरे सिद्धांत को एक सीख में समझा जा सकता है. रणनीति वह प्लान नहीं है जिसका आप ऐलान करते हैं, बल्कि यह रणनीति वह जगह है जो आप किसी के दिमाग में तब बना लेते हैं जब उसने चुनना शुरू भी नहीं किया होता. पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति में बीजेपी का जो दबदबा रहा है, वह किसी एक चुनाव अभियान से ज्यादा इस बात पर निर्भर करता है कि उसकी संगठनात्मक तैयारी यानी बूथ स्तर की मजबूती, प्रत्याशियों का अनुशासन और कार्यकर्ताओं का मनोबल कैसी है. यह सब चुनाव शुरू होने से सालों पहले ही तय कर ली गई थी और सात सालों से इस पूरे तंत्र का संचालन काफी हद तक संतोष की टेबल से ही हो रहा है.
उनकी कार्यशैली का उदाहरण है 2019 का फैसला
संतोष का सबसे चर्चित प्रसंग 2019 का बेंगलुरु साउथ टिकट विवाद रहा है, जब पार्टी ने दिवंगत नेता अनंत कुमार की पत्नी तेजस्विनी अनंत कुमार को उनके पति के गढ़ से टिकट देने से इनकार कर दिया था. संतोष ने इस फैसले का सीधा बचाव करते हुए कहा था कि टिकट डीएनए और वंश के आधार पर नहीं दिए जा सकते. वह सीट तेजस्वी सूर्या को दी गई, जिन्होंने भारी अंतर से जीत दर्ज की.
चार दशकों तक भारत को कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार मार्क टली कहते हैं कि भारत को उसके नारों से मत समझिए, बल्कि उस पल से समझिए जब कोई कड़ा फैसला लिया जाता है और लोगों को उसके साथ जीना पड़ता है. 2019 का वह फैसला संतोष के काम करने के तरीके की सटीक मिसाल था जहां संगठन के तर्क को भावनाओं पर तरजीह दी गई और चुनावी नतीजों ने उस फैसले को सही साबित किया. पिछले सात सालों में टिकट वितरण और राज्य इकाइयों में अनुशासन तय करने में यही सोच लगातार दिखाई दी है.
2026 के फेरबदल की असली हकीकत क्या है?
नितिन नवीन की नई टीम को अगर समग्र रूप से देखें तो यह एक बड़ा बदलाव थी. विनोद तावड़े और सुनील बंसल ने महासचिव पद बरकरार रखा, वसुंधरा राजे को कोर लीडरशिप में बनाए रखा गया, अनिल बलूनी मीडिया प्रभारी बने रहे और अमित मालवीय को हटाए जाने के बाद दीपक म्हास्के नए आईटी सेल प्रमुख बने. इतने सारे फेरबदल और हलचल के बीच, सिर्फ एक पद ऐसा था जहां न कोई अटकल थी, न कोई शॉर्टलिस्ट और न ही सूत्रों के हवाले से कोई खबर और वह पद था बीएल संतोष का था.
नई टीम के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संदेश में भी संगठनात्मक अनुभव, ऊर्जा और जमीनी पकड़ की बात कही गई. ये ऐसे शब्द थे जो संतोष के काम और अनुभव पर पूरी तरह सटीक बैठते हैं. 2025 के अंत तक भी वे खुद जमीनी स्तर पर काम कर रहे थे. जैसे तमिलनाडु में चुनाव समितियां गठित करना, जो एक ऐसा दक्षिणी राज्य है जहां बीजेपी को शुरू से संगठन खड़ा करना पड़ रहा है. इसके लिए वे उसी जिले-वार तरीके का इस्तेमाल कर रहे थे जो उन्होंने दो दशक पहले कर्नाटक में आजमाया था.
संस्थाओं को समझने वालों के लिए बड़ा सबक
मैनेजमेंट गुरु पीटर ड्रकर की संगठनों को दी गई सबसे महत्वपूर्ण चेतावनी थी कि भागदौड़ या हलचल को उपलब्धि समझने की भूल न करें. दिल्ली की राजनीतिक चर्चा अक्सर हलचल को ही तवज्जो देती है. नई घोषणाएं, रैलियां, इस्तीफे और किसी की वापसी. यह चर्चा वास्तविक उपलब्धि को देखने में अक्सर चूक जाती है, जो बीजेपी जैसे विशाल संगठन में उस पद पर निरंतरता के रूप में दिखती है जिस पर सबकी नजर नहीं होती.
17 अगस्त 2026 की असली कहानी यही है. बात यह नहीं है कि कौन आगे बढ़ा. बात यह है कि किसे बदलने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई.
बीएल संतोष और बीजेपी संगठन पर पूछे जाने वाले सवाल
बीएल संतोष कौन हैं?
बीएल संतोष (बोम्माराबट्टू लक्ष्मीजनार्दन संतोष) बीजेपी के वरिष्ठ नेता और आरएसएस के प्रचारक हैं, जो जुलाई 2019 से पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) के रूप में कार्यरत हैं. इससे पहले वे आठ वर्षों तक कर्नाटक में संगठन का नेतृत्व कर चुके हैं.
बीएल संतोष को दोबारा इस पद पर कब बरकरार रखा गया?
17 अगस्त 2026 को जब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने पार्टी के नए राष्ट्रीय पदाधिकारियों की सूची जारी की, तब उन्हें इस पद पर बनाए रखा गया.
बीजेपी में महासचिव (संगठन) का क्या काम होता है?
यह पद आरएसएस और बीजेपी के बीच औपचारिक संगठनात्मक कड़ी है, जो राष्ट्रीय स्तर पर कैडर निर्माण, चुनाव प्रबंधन, अनुशासन और नेतृत्व चयन की निगरानी करता है. इस पद पर हमेशा संघ के पूर्णकालिक प्रचारक रहते हैं.
बीएल संतोष कितने समय से इस पद पर हैं?
वे जुलाई 2019 से लगातार इस पद पर हैं, जब तत्कालीन अध्यक्ष अमित शाह ने उन्हें संयुक्त महासचिव (संगठन) से प्रमोट किया था. 2026 इस पद पर उनका लगातार सातवां वर्ष है.
(यह एक ओपिनियन विश्लेषण है और 24 अगस्त 2026 तक की सार्वजनिक रिपोर्टों पर लेखक की समझ पर आधारित हैं.)
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