विवेक रंजन अग्निहोत्री, जिन्होंने द ताशकंद फाइल्स और द कश्मीर फाइल्स जैसी फिल्मों के माध्यम से इतिहास के दबाए गए पन्नों को जन-जन तक पहुंचाया, अब अपनी नई किताब Raktbodh: बंगाल की गाथा (अंग्रेजी संस्करण: The Blood Republic of Bengal) के साथ एक बार फिर बहस और चिंतन का विषय बन गए हैं. BluOne Ink द्वारा प्रकाशित ये पुस्तक (हिंदी अनुवाद: विश्वास तिवारी) वर्षों के गहन शोध पर आधारित है ये किताब विभाजन काल के बंगाल में हुए हिंदू नरसंहार, विश्वासघात और इतिहास की साजिशपूर्ण चुप्पी को बेनकाब करती है.
किताब डायरेक्ट एक्शन डे (16 अगस्त 1946) के खूनी दंगों से शुरू होती है और नोआखली नरसंहार तक जाती है. अग्निहोत्री येां सिर्फ तथ्य नहीं गिनाते, बल्कि आंखों देखी गवाहियों, दस्तावेजों और सिनेमाई शैली में बुनी मार्मिक घटनाओं को जीवंत कर देते हैं. एक नोआखली की महिला का दर्द, परिवारों का बिखरना, और सभ्यता के नाम पर हुई बर्बरता, ये दृश्य पढ़ते हुए आंखों के सामने घूमने लगते हैं. लेखक दिखाते हैं कि कैसे औपनिवेशिक शक्तियों की राजनीति, मुस्लिम लीग की उकसावे वाली रणनीति और बाद की सरकारों ने इन घटनाओं को जानबूझकर दफन कर दिया.
ये किताब अग्निहोत्री की त्रयी का तीसरा हिस्सा मानी जा रही है, लेकिन ये स्वतंत्र रूप से खड़ी है. जहां उनकी पिछली रचनाएं राजनीतिक साजिशों पर केंद्रित थीं, वहां रक्तबोध सभ्यतागत घाव और स्मृति के संकट पर ज्यादा जोर देती है.
बंगाल को हमेशा ‘सांस्कृतिक विरासत’, ‘बंगाली रिनेसां’ और ‘गौरव’ के रंग में रंगा गया. लेकिन उसके खून को, विशेषकर हिंदू समुदाय पर हुए अत्याचारों को, आधिकारिक इतिहास में लगभग गायब कर दिया गया. किताब इसी ‘आधे सच’ को चुनौती देती है. लेखक पूछते हैं- क्या हम इतने सहज हो गए हैं कि नरसंहार को भी ‘दोनों तरफ की हिंसा’ कहकर खारिज कर दें?
अग्निहोत्री फिल्मकार हैं, इसलिए किताब में दृश्यात्मकता बहुत मजबूत है. वाक्य छोटे-छोटे, प्रभावशाली और दिल में उतरने वाले हैं. शोध की गहराई स्पष्ट है, ये कोई सतही किताब नहीं, बल्कि दशकों की मेहनत का नतीजा लगती है.
प्रकाशन के बाद से ही रक्तबोध बहस का विषय बनी हुई है. कुछ इसे ‘साहसिक प्रयास’ मान रहे हैं, जो विभाजन की असुविधाजनक सच्चाई को सामने लाती है. वहीं कुछ इसे ‘एक तरफा’ बताकर खारिज करने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन येी तो किताब की ताकत है, ये सुविधाजनक कथा नहीं, बल्कि दबी हुई आवाजों को जगह देती है.
कई पाठक कह रहे हैं कि किताब पढ़ने के बाद सवाल उठता है कि स्कूल की किताबों में ये इतिहास क्यों नहीं पढ़ाया गया? बंगाल की कहानी को हमेशा रोमांटिक बनाया गया, जबकि उसके खूनी अध्याय छुपाए गए. ये पुस्तक सिर्फ अतीत नहीं, वर्तमान से भी जुड़ती है- जब इतिहास को फिर से लिखने या भुलाने की कोशिशें जारी हैं.
ये किताब उन युवाओं के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है जो सोशल मीडिया पर इतिहास की सतही बहसों से आगे जाना चाहते हैं. रक्तबोध आपको असहज करेगी, लेकिन येी असहजता सोचने पर मजबूर करती है.
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-भारत एक्सप्रेस
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